Zeenat [part 40]

नाज़िम और सैयद चाय की टपरी पर मिलते हैं ,जहाँ पहले से ही ख़ालिद बैठा हुआ था।  अब तक तो ख़ालिद ने उन पर कोई ध्यान नहीं दिया था किन्तु अब उनकी बातें गौर से सुनने लगा। तभी सैयद को , किसी का फोन आया और वो नाज़िम से बोला -मैं अभी आता हूँ ,फिर वापस आकर बोला -अब कहीं दिल  नहीं लगता ,जिधर भी देखता हूँ ,वो ही वो नज़र आती है। अच्छा, कल मिलते हैं, कहकर वहां से चला गया। 

नाज़िम वहीं बैठा रहा, उसने एक चाय और बनाने के लिए कह दिया। 

चायवाला नाज़िम को जानता था ,तब उसने,नाज़िम से पूछा - ये तुम्हारा दोस्त था। 

हाँ ,बेचारे को इश्क़ हो गया है ,कहकर मुस्कुराया। 


किससे हो गया है ?चायवाले ने पूछा -वो मोहतरमा कौन हैं ? किसकी साहबज़ादी हैं ?

सुना है, बड़े ऊँचे ख़ानदान से है , बेहद खूबसूरत ! किंतु लगता है ,बेचारे की क़िस्मत में नहीं ,उसका कहीं ओर निक़ाह होने जा रहा है। बस भाई इसीलिए उदास है। तब उदास होते हुए बोला -मैं ऐसा क्या करूं ?जो  उसकी शादी, उसके प्यार से हो जाये।

अब तो उसका निक़ाह होने वाला है ,अब क्या किया जा सकता है ?कोई और लड़की ढूंढ़ ले ,मेरी तो यही सलाह है ,उसे भूल जाये ,कहकर चायवाला अपने काम में व्यस्त हो गया।  

बड़े अफ़सोस की बात है ,उसका निकाह हो रहा है ,यह सुनकर ख़ालिद के भी'' कान खड़े हो गए ''वो जानना चाहता था कि आख़िर वो लड़की कौन है ? नाज़िम कुछ देर बैठा ,वहीं चाय के घूंट भरता रहा और तब उसने चायवाले से  कहा - पैसे खाते में लिख लेना ,कहकर आगे बढ़ गया।

 कुछ दूर आगे चलकर, उसे किसी ने आवाज लगाई -ओय ! ओ नीली कमीज़ वाले !

नाज़िम ने इधर-उधर देखा ,फिर अपने आपको, नीली कमीज तो उसने ही पहनी हुई है ,तब उसने देखा ,वही लड़का जो चाय की दुकान पर बैठा हुआ था ,वही  उसे पुकार रहा था ,तब उसने पूछा  - क्या तुम मुझे बुला रहे हो ?

हाँ ,तब तक वो, उसके नज़दीक आ गया था। तब वो बोला -मेरा नाम' ख़ालिद' है। 

तो मैं क्या करूं ?बेरुख़ी से नाज़िम बोला। 

जहाँ तुम और तुम्हारा दोस्त चाय पी रहे थे ,वहीं पर मैं भी था। 

अच्छा ,मेरा ध्यान नहीं गया ,तुम मुझे क्यों बुला रहे थे ?

मैं ये जानना चाहता हूँ ,जिससे तुम्हारा दोस्त इश्क़ फ़रमा रहा है ,वो लड़की कौन है ?

ये बात तो हमारे भाईजान ने हमें नहीं बताई ,यूँ तो उसका नाम तक अपनी जुबाँ पर नहीं लाते। परन्तु तुम्हें इससे क्या ? क्या उस लड़की से तुम्हारा निक़ाह तो नहीं हो रहा। 

मुझे, उसका नाम बताते,तो पता चलता किन्तु तुम तो उसके बारे कुछ भी नहीं जानते। केेसा दोस्त है ?जो तुम्हें कुछ भी नहीं बताता। 

भाई !वो उसकी, अपनी ज़िंदगी है ,मुझे उसकी ज़िंदगी में नहीं घुसना।  अच्छा,ये बताओ ! क्या ऐसा कुछ हो सकता है ? जो मैं अपने दोस्त की मदद कर सकूँ। दोस्ती तो इसी को कहते हैं , बिन कहे ही, उसकी मदद हो जाये। 

तुम उसके अच्छे और सच्चे दोस्त हो। 

 मैं सोच रहा हूं, किसी तरह से उसका रिश्ता टूट जाए और जब वह लड़की विवश हो जाए तब हमारे भाईजान, उससे ,अपने निक़ाह की बात रख सकें । कोई तो तरकीब लगाओ, इससे पहले कि मेरा भाई  उसकी मुहब्बत में फ़ना हो जाए।

बहुत देर से खालिद उसकी बातें सुनता रहा ,उसके बाद चुपचाप वहां से चला गया। 

  यार ! मैं,उसे छोड़ नहीं सकता ,वो बहुत ही खूबसूरत है,उसे देखकर  लगता है ,अल्लाह ने ,उसे मेरे लिए ही तराशा है। चाय की दुकान पर बैठकर ,रोज़ यही चर्चा करते और नई -नई तरक़ीबें सोचते।  वे लोग जानते थे कि ख़ालिद हर रोज, यहां पर चाय पीने के लिए आता है और वे भी  उसी समय जाने लगे और आपस में बातचीत करते और आपस में सलाह -मशवरा करते कि किस तरह से उस लड़की का रिश्ता तुड़वा दिया जाए। एक दिन चायवाले  ने उन्हें डांटा और बोला -मेरी दुकान पर बैठकर ऐसी बातें मत किया करो !कहीं और चले जाओ !

तब वे एक खली जगह पर बैठकर ,रोज नई-नई तरकीबें सोचते और चले जाते। कभी-कभी खालिद को भी भाई जान !भाई जान कहकर अपनी बातों में शामिल कर लेते।

उनकी दोस्ती बढ़ने लगी ,पहले तू' उस लड़की के दिल में अपनी जगह बना ले ,फिर तो वही अपने रिश्ते से इंकार कर देगी। 

ये क्या बचकानी हरक़त है ? उसका निक़ाह होने वाला है ,अब इस सबका वक़्त नहीं रहा। 

तब तू जाकर एक दिन ,सीना ठोककर उसके शौहर से बोल दे ! तू ,उससे इश्क करता है , वो  तेरी होने वाली महबूबा है। 

यह क्या बात हुई ? अगर उसके शौहर ने  उससे पूछा -क्या यह सही कह रहा है ? तो वह तो कह देगी है -'ये झूठ बोल रहा है।' मेरे पीछे उसके घरवाले पड़ जायेंगे,हो सकता है ,मुझे उनसे पिटना पड़ेगा। ख़ालिद रोज़ाना उनकी साज़िशों को सुनता रहता। वे आपस बातें करते -करते कभी दूर टहलने निकल जाते। ख़ालिद को अब उन पर विश्वास होने  लगा था ,उन्हें अपना दोस्त भी समझने लगा था।  

 तब एक दिन ख़ालिद  बोला - अरे क्यों परेशान हो रहे हो, उसे एक दिन अग़वा कर लो ! इस तरह से अगवा करना, उसे भी पता न चले और  किसी को' कानो कान खबर भी ना हो ''

उससे क्या होगा ? कुछ सोचते हुए सैयद ने पूछा। 

इश्क़ करने चला है ,इतना भी नहीं जानता ,' मुहब्बत और जंग में सब जायज़ है। ''जब तू उसे अग़वा कर लेगा ,एक रात उसके साथ बिताना और वापस छोड़ देना। 

भाई ! ये क्या बात कर रहे हो ? मैंने उससे सच्ची मुहब्बत की है ,उसे पता नहीं चल जायेगा कि उसे किसने अग़वा किया है ?

तुम दोनों निरे बेवकूफ़ हो ,अरे उसके पास जाना किन्तु न ही बोलना और न ही उस कमरे में रौशनी होनी चाहिए ,अपना चेहरा ढककर रखना। रातभर उसका दिल जीतना और छोड़ जाना ,अब ये बात जैसे ही लोगों को पता चलेगी ,उसका रिश्ता ही टूट जायेगा। ऐसी लड़की से कौन निक़ाह करेगा ?जो किसी और के साथ रात बिताकर आई हो। तब तुम हीरो बन जाना ,यदि उससे सच्ची मुहब्बत है तो' निक़ाह 'कर लेना। निक़ाह न भी हुआ तो ,तुम्हारी यादों के लिए उसके साथ बिताई एक रात ही काफी है। 

वाह !क्या बात बताई है ? मैं तो क़ायल हो गया ,अबसे तुम, हमारे उस्ताद ! 

उस्ताद !उनमें से एक लड़का बोला - यह तरकीब तो तुमने बहुत अच्छी बताई है।  अरे ! इतने दिनों से हम जुगाड़ लगा रहे थे, दिमाग में कोई  बात आ ही नहीं रही थी । क्या तुमने भी ,अपने जीवन में अपनी मुहब्बत को पाने के लिए ऐसा कुछ किया है ?

क्या बात करता है ?हमारे उस्ताद !इश्क़ ! मुहब्बत से दूर ही रहते हैं।

क्या बार कर रहा है ?कभी इश्क़ तो इन्हें  भी हुआ होगा  

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है , मैंने तुम्हें सबसे अच्छी तरक़ीब बताई है ,उसे आजमा कर देख लो !

नहीं, भाई ऐसा तो हो ही नहीं सकता जरूर आपने ऐसा कुछ किया है, कहीं ऐसा तो नहीं तुम्हारा जो यह निकाह हो रहा है, यह उसी का नतीजा हो।

 तुम कोई मेरे दोस्त नहीं हो मैं तुम्हें सारी बातें नहीं बता सकता। 

क्या तुम डरते हो? किसी को पता चल जाएगा,तो क्या होगा ? 

मैं, किसी से डरता नहीं हूं, मुझे कौन हाथ लगाएगा ?  मेरे खिलाफ किसी के पास कोई सबूत भी तो नहीं है। वह लड़की ही नहीं जानती है कि उसे, किसने अगवा किया था।

 इसका मतलब आपने सच में ही कोई कांड किया है।

किया है, तो क्या ? अब क्या मोहर लगाकर दूँ ,तुम्हें अपने काम से मतलब होना चाहिए। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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