Andhvishvas ya bhakti

मुझे एक जगह जाना है, आपको, मुझे वहां ले लेकर जाना होगा,सुगंधा ने अपने पति समीर से कहा  

तुम कहां जाना चाहती हो  ?

 अगर तुम्हें बताया तो तुम, नहीं ले जाओगे। सुगंधा जानती थी ,समीर को इन सब चीजों पर विश्वास नहीं है।   

ऐसी कौन सी जगह है ?जहां मैं नहीं ले जाऊंगा जा सकती हो।  


देखो !मना मत करना , कोई बहुत बड़ा 'भक्त 'है, उसके हाथों में जस है , लोग कहते हैं, जब वह हाथ लगाता है, तो सभी दर्द दूर हो जाते हैं। मैं भी उसे अपने दर्द का इलाज़ चाहती हूँ  दवाई लेने जाऊंगी , मेरी  कमर में,बहुत दिनों से बड़ा दर्द है। 

तुम इन सब बेकार के बातों में मत पडो, जिस डॉक्टर से तुम्हारी दवाई चल रही है, उस डॉक्टर को दिखा कर आओ !और व्यायाम करो !

इसीलिए मैं आपको बताना नहीं चाहती थी ,कहते हुए सुगंधा ने मुँह फुला लिया। मैंने अभी एक वीडियो देखी है ,कुछ महिलाएं वहां पर अपना इलाज कर रही थीं। मुझे भी वहां जाना है , सुगंधा ने ज़िद की।

 हालांकि समीर जाना नहीं चाहता था किंतु क्या करते ? पत्नी को पूर्ण विश्वास था ,वो वहां जाएगी तो अवश्य ही ठीक हो जाएगी।  उसकी ज़िद के सामने  झुकना पड़ा। दोनों गाड़ी में बैठकर, गुरु जी से आशीर्वाद लेने चल दिए                                                                                                                                                                                                                                                                                                                            । जब वो लोग वहां उन्हें  खोजते हुए वो उस स्थान पर पहुंचे, जिस स्थान का पता उसे दिया गया था। वहां पहुंचकर उन्होंने देखा, सड़क के किनारे एक गड्ढा पड़ा हुआ था। आसपास बहुत सारी भीड़ थी, यह अच्छा था कि उस जगह पर थोड़ी दूर पर ही एक पेड़ था और उस पेड़ की छाया वहां पर आ रही थी। पास में ही एक चाय वाला भी था। 

वो लोग, वहां खड़े हो गए , साथ ही वहां पर उद्घोषणा हो रही थी - कृपया, अपने सामान की सुरक्षा स्वयं करें ! समीर ने ,सुगंधा को लाकर एक टोकन दिया। टोकन क्या ?एक पर्ची पर नंबर लिखा था। गर्मी बहुत थी। वो जाकर अपनी गाड़ी में बैठ गया ।  उसे  वहां का वातावरण, उस  व्यक्ति का देखने का तरीका कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा था किंतु पत्नी के कारण रुकना पड़ा।

सुगंधा से भी कहा -तुम्हारा नंबर देर से आएगा तुम भी गाड़ी में बैठो ! किन्तु वो वहीँ खड़ी होकर देखने लगी, क्या यह इलाज सही हो रहा है ? किसी को इसके इलाज से आराम भी लगा है या नहीं। उसे किसी से पूछने की आवश्यकता भी नहीं पड़ी, एक महिला वहीं पर पास में खड़ी थी, वह बोली -इनके सिर पर शिवजी का हाथ है। ये शिव भक्त है।  

क्या आप आपने पहले भी कभी दिखाया है ,क्या आपको आराम लगा है ?

नहीं, मेरी जेठानी ने दिखाया था, उसको अब आराम है, इसीलिए मैं अपनी बहू के साथ आई हूं। तब वह बड़ा अपनापन दिखलाते हुए सुगंधा से बोली -इनको तो हम बहुत पहले से जानते हैं, यह बताते  हुए उसे गर्व हो रहा था, यह पहले साइकिल में पंचर लगाता  था।अभी एक माह से ही ये काम शुरू किया।  यह सुनकर सुगंधा आश्चर्य चकित रह गई कि साइकिल में पंचर लगाने वाला, कैसे इतना ज्ञानी हो सकता है ? तब वह स्वयं ही बोली -मेरे पति भी वैद्य  हैं  और मेरा बेटा भी वैद्य है। 

सुगंधा ने पूछा- तब तुमने उनसे दवाई क्यों नहीं ली ? यहां क्यों आई ?

 इसके हाथ की बात है, इनके हाथों में जादू है।

 सुगंध को लगा,ये अवश्य ही कोई चमत्कारी पुरुष है, देखने से तो नहीं लग रहा था। कि ऐसा कुछ हो सकता है।

 तब वो महिला  स्वयं ही बोली - बताओ ! यहां सड़क पर हम लोग खड़े हैं, यहां पर बैठने के लिए कुर्सियां भी नहीं हैं। परसों जब मैं आई थी, तो यहां कम से कम 200 लोग थे आज तो इतनी ज्यादा भी नहीं है। 100 रूपये एक आदमी से  लिए तो कम से कम 200 के 20,000 बन जाते हैं। कम से कम इन्हें अपने मरीजों  के लिए उचित इंतजाम तो करना चाहिए।

 सुगंधा को आश्चर्य हुआ, कितने लोग आ रहे हैं ? इसमें कुछ बात तो होगी मैंने तो खैर इंस्टाग्राम पर देखा था। ऐसे ही लोगों को जानकारी हो रही होगी किन्तु उन वीडियो में किस -किसको इलाज से असर हुआ है ,उनका कुछ पता नहीं। 

आज मैं अपना इलाज कराने आई हूं। तभी हमारे देखते ही देखते , उन्होंने एक महिला को इतनी जोर से झटका दिया कि उसकी बहुत तेज चीख निकल गयी। 

समीर ने अपनी गाड़ी से बाहर आकर सुगंधा से कहा ,अभी भी समय है ,वापस चलते हैं। ''नीम- हक़ीम ख़तरा- ए -जान '' वह महिला शरीर से थोड़ी भारी थी जैसे ही उन्होंने, उसकी पीठ पर बैठकर उसे झटका दिया वो चीख निकलने के साथ ही साथ घबरा भी गयी। उसे पानी पिलाया गया, वो दर्द को बर्दाश्त नहीं कर पा रही थी, बहुत देर तक ऐसे ही बैठी रही। तब वह बोली-अब मुझे कुछ नहीं करवाना है।

 इतने लोगों के , होने से उसे अच्छा नहीं लगा। तब वह कहने लगा - सब ठीक हो जाएगा और कहते हुए उनके पैरों को झटका दिया पैरों को झटका देते ही उसकी हालत खराब हो गई और फिर उससे कहा -तुम पैदल दौड़ लगाओ ! 

 लेकिन उससे तो चला भी नहीं जा रहा था, उसके पति उसको पकड़ कर गाड़ी तक लेकर गए।

 उसे दृश्य को देखकर सुगंधा की हालत  खराब हो गई और सोचने लगी,ये कैसा इलाज़ है ?मुझे करवाना चाहिए या नहीं। किन्तु उसकी जिज्ञासा अपनी बीमारी को लेकर थी। इतना तो उसे अंदाजा हो गया था ,मान लो !सौ लोग आते हैं ,किसी को लाभ होता है ,उसके लिए अच्छा ,किसी को लाभ नहीं ,उसके लिए बुरा ! हो सकता है ,मैं ठीक हो जाऊँ !इसी उम्मीद से वहीँ डटी रही। 

सुगंधा की जब बारी आई ,उसने उसके पैर को झटका दिया और उठकर चला गया ,तब उसे महसूस हुआ ,इतने लोग आने के पश्चात अब इसका ध्यान रोगी पर नहीं ,अपनी प्रसिद्धि पर है ,जितने ज्यादा से ज़्यादा लोग आएंगे उतना ही ठीक !

बेचारा ! मरीज़ दर्द से बेहाल सोचता है ,कैसे भी ,किसी भी तरह उसको आराम मिल जाये इसलिए कहीं भी दर्द का निवारण होता देखते हैं, दौड़ पड़ते हैं। इसी बात कुछ लोग लाभ उठा रहे हैं ,जिसको लाभ नहीं, वो दुबारा  नहीं आएगा। 

इतना सब देखते हुए, इस बात का तो एहसास हुआ ,वहां कितने पति ,बेटे ,खड़े हुए थे ,जो इस गर्मी में अपनी पत्नियों के साथ खड़े दिखलाई दे रहे थे। उन्हें फ़िक्र थी ,अपने लोगों की ,अपनों की ,बेचारे कहीं भी इलाज़ के लिए दौड़ पड़ते हैं। 

अरे !इस सबमें मैं ये तो बताना भूल ही गयी मेरी सखी सुगंधा का क्या हुआ ? वो तो उसके जाने के पश्चात अपने आप उठ खड़ी हुई। वहां खड़े सभी को लगा- अरे !ये तो चमत्कार हो गया ,ये तो अपने आप खड़ी हो गयी। इससे पहले मरीजों को वो हाथ पकड़कर उठा तरह था। तब एक व्यक्ति ने पूछा -आप तो ठीक लग रहीं हैं आपको असर हुआ। एकदम से खड़ी हो गयी। 

तब सुगंधा बोली -मैं पहले से ही योग व्यायाम करती हूँ ,मेरी हालत इतनी खराब नहीं थी ,हल्का दर्द था सोचा ,बाबा जी !के आशीर्वाद से ये भी न रहेगा। घर आकर सुगंधा ने बताया -मेरी कमर का दर्द और बढ़ गया है। कोई 'भक्ति नहीं ,अन्धविश्वास है। ''इतने साधु -संतों ने इतनी तपस्या की ,सालों ज्ञान की ख़ोज की। ईश्वर की कृपा उन पर हुई या नहीं, किन्तु इनको साईकिल में पंचर लगाते हुए शिव का आर्शीवाद मिल गया, कहते हुए हंसने लगी। शिव महिमा अपरम्पार 🙏

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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