उम्मीदों के दिए जला, मैंने एक दुनिया बसा ली है।
मेरी कल्पना की बगिया में शब्द, रंग, भाव माली हैं।
दिल में किसी के न दुर्भावना, घृणा और न ईर्ष्या है।
यथार्थ से परिपूर्ण ,कुछ कल्पना से जुडी भावनाएं हैं।
न ग़म कोई ,न बंदिशें ,प्रेम पूर्ण जहां में खुला आसमान था।
उड़ती रही ,बिन पंख मैं , प्रेम का इक ख़ूबसूरत पैग़ाम था।
हक़ीकत से परे , मेरी कल्पनाओं की अद्भुत सी शान थी।
कल्पना थी ,इक ख़ूबसूरत जहाँ की, ख़्वाबों की ताबीर थी।
कुछ दिल से जुड़ी, कुछ भावनाओं से जुड़ी,अपनी सी
कुछ आसमानी, कुछ अतरंगी सी, मासूम कल्पनाएं !
कल्पना के रंगों में उड़ान भरती , वो अद्भुत जहाँ था ।
जीती थी उसमें, ठहर जाता वो पल ! मेरा आसमान था।
पलकों में सजाये सपने, प्रीत की राह' मैं' खोजती रही।
हकीकत में रहकर भी, सपनों को पालती-पोषती रही।
कविताओं में ,कभी लेखों में ,कल्पनाएं परोसती रही।
हक़ीकत को कल्पना के रंगों से भिगोती -तौलती रही।
खुली आँखों से देखा,जो मेरा अपना था ,एक सपना था।
कल्पना का वो रंगीन ,प्रेम भरा सपना , मेरा अपना था।
अपनापन, अपने लोग, वो प्रीत भरी बातें .....
कर आती कल्पना में, अपनों से ही प्यार भरी मुलाकातें !
