ललित ने कुछ दिनों तक ही नौकरी की थी, किंतु एक दुर्घटना में ,उसके पैर की हड्डी टूट जाने के कारण उसको नौकरी से भी हाथ धोना पड़ा और वह घर में बैठ गया। तीन महीने तक उसके प्लास्टर चढ़ा रहा। तीन महीने के पश्चात तब उसने सोचा - कि अब मुझे कोई दूसरी नौकरी ढूंढने जाना है। एक -दो जगह उसने नौकरी के लिए आवेदन भी किया था और साक्षात्कार भी दिया था किंतु अभी तक उधर से कोई जबाब नहीं आया था। नौकरी की तलाश में इधर-उधर हाथ-पांव चला ही रहा था कि कोरोना की बीमारी के कारण 'लॉकडाउन' लगा दिया गया।
इधर वो नौकरी की तलाश में था ,उधर मौत अपना तांडव दिखा रही थी। इक्कीस दिन का' लॉकडाउन' ललित के लिए परेशानी का सबब बन गया। अब कहीं भी कोशिश नहीं कर सकता था।एक उम्मीद थी ,वो भी इक्कीस दिनों के लिए टल गयी ,उसके बाद भी उम्मीद नहीं, नौकरी मिलती भी है या नहीं। इन दिनों कुछ लोगों की तो नौकरी भी छूट गई थी। ललित भी परेशान हालत में ,घर में बैठा हुआ था। इतनी परेशानियों के कारण उसका स्वभाव भी चिड़चिड़ा सा हो गया था। महीनों से घर में बैठा था, सोच रहा था - फ्रैक्चर ठीक होगा तो नौकरी पर जाऊंगा किंतु अब यह परेशानी और बढ़ गई। ,'लॉकडाउन में घर में कब तक 'बैठा रहेगा ?
जाए भी तो जाए कहां? जिन्हें नौकरी मिली हुई है , लॉकडाउन में उनकी नौकरी भी छूट गई है। कुछ लोग 'वर्क फ्रॉम होम' कर रहे हैं किंतु वह तो खाली बैठा है ,माता-पिता की उम्मीद भरी नजरें उसे घूरती नजर आ रही थी। हालांकि वे लोग उससे कुछ कहते नहीं थे ,फिर भी उसे अपनी जिम्मेदारियों का एहसास होता था ।
ऐसे ही एक दिन लैपटॉप पर कुछ काम कर रहा था, तभी उसने फेसबुक भी चलाया, कभी इंस्टाग्राम चलाता , इस तरह से अपना समय व्यतीत कर रहा था। समय काटे नहीं कट रहा था। तब एक दिन, एक बहुत खूबसूरत अंदाज़ में एक तस्वीर उसके नजरों के सामने आई। वह एक लड़की की तस्वीर थी। उसने, उस तस्वीर को देखा ,वो उस तस्वीर को देर तक देखता रहा उसके विषय में जानने की जिज्ञाषा हुई। तब उसे खोजते हुए उसकी आईडी पर गया ,वहां उसकी अन्य तस्वीरें भी थीं। हर तस्वीर में वो प्यारी लग रही थी।
तब ललित ने उसकी तस्वीर को लाइक किया और संदेश भी भेजा - बुरा न मानें ,तो एक बात कहूं ,आप बहुत खूबसूरत हैं।
अब वह उसके जवाब की प्रतीक्षा में था, उसके जबाब की प्रतीक्षा में ,बार -बार फोन देखता। सोच रहा था -न जाने कहाँ व्यस्त है ? जहाँ कुछ घरों में ,मौत का सा सन्नाटा छाया था ,वहीं ललित के मन में उमंगें जाग रहीं थीं। प्रेम का बीज अंकुरित होने को तत्पर था।
अगले ही दिन उसका जबाब आया - हेेलो ! इसमें बुरा क्या मानना ?खूबसूरती की प्रशंसा न हो ,ये तो सुंदरता की तौहीन है, लिखकर उसने 😀 की इमोजी डाली।
साथ ही पूछा -तुम कहां रहते हो ? इस तरह से बातों का सिलसिला आरंभ हो गया और तब ललित को पता चला कि यह लड़की पढ़ने के लिए कनाडा गई हुई थी और वहां पर नौकरी की तलाश में थी और जैसे ही 'कोरोना 'फैला उसके पापा ने उसे अपने देश में वापस बुला लिया।
वह भी परेशान है, नौकरी की तलाश में है। दिल से दिल को राहत होती है। ऐसा ही कुछ ललित के साथ भी हुआ। कविता से उसकी अनेक बातें होने लगीं और धीरे-धीरे उनकी बातें, प्रेम भरी बातों में बदलती चली गईं । वो कभी हताश होता ,कविता उसका मनोबल बढ़ाती ,हिम्मत देती।
अब तो ललित ने सोच लिया था -मुझे, विवाह करना है तो इस लड़की से ही करूंगा किंतु उससे पहले उसे नौकरी की तलाश करनी होगी। अपने ह्रदय के उद्गार उसे भी बता दिए , तब उस लड़की ने उससे कहा - यदि मुझे ,तुमसे पहले नौकरी मिलती है तब भी हम शादी कर लेंगे। यदि तुम्हें पहले नौकरी मिलती है हम तब भी शादी कर लेंगे।
ललित की मम्मी ने देखा ,अब बेटे के व्यवहार में बदलाव आ रहा है ,थोड़ा शांत भी रहने लगा है।
तब त्रिशा ने पूछा - क्या कोई कोर्स कर रहे हो या कोई नौकरी मिल गई है ?
नहीं, ऐसी तो कोई बात नहीं है,अभी नौकरी कैसे मिल जाएगी ? हाँ ,नौकरी करनी तो है ही, कुछ तैयारी कर रहा हूँ।
हंसते हुए ललित के पिता ने कहा -नौकरी तो नहीं,किन्तु मुझे तो लगता है इसे छोकरी मिल गई है कहते हुए हंसने लगे। उनका अंदाजा सही था उनके बेटे को नौकरी तो नहीं मिली थी 'लॉकडाउन' में उसे अपना 'हमदर्द' अपना' हमसफर' अवश्य मिल गया था।
इक्कीस दिन कैसे बीत गए ?पता ही नहीं चला। एक -एक पल जो ललित को युगों के बराबर लग रहा था ,वो कविता की प्यार भरी बातों में इक्कीस दिन पूरे होने के बाद भी लग रहा था ,अभी और ढेर सारी बातें करनी हैं। व्यवस्था ज्यादा सुधरी नहीं थी किंतु लोग' सुरक्षा करते हुए आने- जाने लगे थे।
ललित और कविता दोनों ही नौकरी की तलाश में निकल गए ,उससे पहले एक दिन दोनों मिले और कहा -अब हमारी अगली मुलाक़ात नौकरी मिलने पर होगी। संयोग की बात देखिये ! कविता को पहले नौकरी मिल गई। ललित उसके लिए उसके लिए दिल से खुश था किंतु वह चाहता था, कि उसे, पहले नौकरी मिलती किंतु कविता ने उसका साहस बढ़ाया और बोली -कोई बात नहीं ,हम दोनों में से एक को तो नौकरी मिल ही गई है ,अब तुम अपने घर वालों से बात कर सकते हो। अब हम दोनों साथ रहेंगे ।
ललित ने यह बात अपने घर वालों को बताइ, तो उसके पिता मुस्कुरा दिए किंतु उसकी मम्मी को कोई खुशी नहीं हुई क्योंकि वो चाहती थीं कि उसके बेटे की नौकरी लग जाए। उन्होंने कहा - लड़की नौकरी करती है और तुम बेरोज़गार ! वो हमारी जाति की भी नहीं है। मैं कहीं दूसरी जगह तुम्हारे लिए लड़की देखती हूं किंतु अब कविता, ललित को इतनी अच्छी लगने लगी थी ,उसने अपनी मम्मी से कह दिया - शादी करूंगा तो कविता से ही वरना मैं शादी नहीं करूंगा।
उसकी मम्मी भी जिद पर आ गई और बोलीं -तेरा कोई आत्मसम्मान भी है या नहीं ,अब अपनी पत्नी की कमाई खायेगा। मैं ,तेरी शादी अपनी ही बिरादरी में कहीं देख कर करूंगी। कई लड़की वाले ललित को देखने आए किंतु ललित की तो नौकरी ही नहीं लगी थी, देखकर चले जाते।
तब उसकी मम्मी को लगा -शायद यह नौकरी करना ही नहीं चाहता ,तब त्रिशा ने उससे पूछा -तेरे मन में क्या चल रहा है ?
मुझे नौकरी ही नहीं करनी है, उसकी मम्मी के कारण ही ललित को यह विचार मन में आ गया था क्योंकि उसे लगा, यदि मैं नौकरी करता हूं और मैं किसी दूसरी जगह पर नौकरी करता हूं तो फिर कविता और मैं साथ में नहीं रह पाएंगे।
एक दिन कविता ,ललित के घर पहुंच गयी और बोली -आंटीजी ! आप हमारी शादी क्यों नहीं करवा रही हैं ? हमारी शादी के लिए ,मेरे पापा तो मान गए ,आप क्यों नहीं मान रहीं हैं ? रही ललित की नौकरी की बात ,कभी न कभी तो इनकी नौकरी लग ही जाएगी। अभी मैं इतना कमा लेती हूँ ,हम दोनों अपना खर्चा अच्छे से चला सकते हैं। आपका आशीर्वाद होगा तो इनकी नौकरी भी लग ही जाएगी।
कविता की बातें सुनकर त्रिशा आश्चर्य से उसे देखती रही ,कैसी लड़की है ?अपने विवाह की बात करने स्वयं ही आ गयी।
तब ललित के पापा बोले - इसकी मम्मी ने एक लड़की देखी हुई है। वे लोग, इससे शादी करने के लिए तैयार हो गए हैं।
मुझमें ही, क्या कमी है ?अच्छी नौकरी है ,हम दोनों एक -दूसरे से प्यार करते हैं ,तब ललित से बोली -तुम कुछ नहीं कहोगे।
तब ललित ने कहा शादी करूंगा ,तो कविता से ही ,उस समय पर मेरे हालात ऐसे थे , मैं कुछ भी कर सकता था। मैं परेशान था, इसने ही मुझे हिम्मत दी थी।
तब ललित के पापा ने त्रिशा को समझाया - जवान बेटा है , हमें तो शादी से मतलब है ,कविता से करें या किसी और से... इसका घर बस जाए हमारे बेटे को इतनी अच्छी लड़की और कहां मिलेगी जो स्वयं नौकरी करती है और हमारी बेटे से भी प्यार करती है। उसे कोई परवाह नहीं है कि वह नौकरी करता है या नहीं।
आप समझ नहीं रहे हैं, यह कुछ दिनों का प्यार है, जब इसके प्यार का भूत उतर जाएगा तब इसको एहसास होगा। बेरोजगार लड़के से विवाह हुआ है, तब इसे ही सुनाइएगी ।
ऐसा नहीं है ,वो क्या बेरोजग़ार ही रहेगा ?नौकरी तो ढूंढ़ ही रहा है ,नहीं लगेगी तो कोई कारोबार कर लेगा ये बात तो ये भी जानती है।
ललित भी अपनी ज़िद पर अड़ा रहा ,तब कोई अच्छा सा मुहूर्त देखकर लॉकडाउन के पश्चात ,पूरी सुरक्षा के साथ , कुछ निजी रिश्तेदारों को ले जाकर, उन्होंने ,उन दोनों की शादी करवा दी। उन दिनों में ज्यादा मेहमान तो नहीं आए थे, किंतु ललित और कविता दोनों की खुश थे क्योंकि यह 'लॉकडाउन ' उनकी जिंदगी में एक नया मोड़ दे गया था और एक सच्चे प्यार को उससे मिलवा दिया था। वो यादगार दिन उनके भुलाये भी नहीं भूलेंगे क्योंकि 'लॉकडाउन' का समय और उनका वो प्यार उन्हें हमेशा याद रहेगा।
