Ek rupye ke sikke

गिनती की शुरुआत तो एक से ही होती है और फिर चाहे वह एक अंक हो या फिर एक रुपया आज के समय में देखा जाए तो एक रूपये की कोई कीमत नहीं रह गई है। किन्तु  बहुत समय पहले एक रुपए की बहुत कीमत थी। एक रूपये की दस टॉफियां आ जाती थीं ,उसके पश्चात चार आने की चार टॉफियां आने लगीं।

 उम्र की तरह ही महंगाई भी हमारे संग ही बढ़ रही थी। आठ आने की दो और अब तो एक रूपये की एक ही आती है। ज्यादा कुछ कहने की आवश्यकता नहीं है , 'मेलोडी 'खाओ ! खुद जान जाओ ! आज के समय एक रूपये की'' मेलोडी'' कहाँ से कहाँ पहुंच गयी है ? क़िस्मत की बुलंद है। अब तो कोई सामान लेने जाओ ! तो दुकानदार एक रुपया वापिस नहीं करता ,बदले में टॉफी थमा देता है।

 एक रूपये के  छुट्टे न होने पर  ग्राहक को भी  कोई कष्ट नहीं होता , वो भी एक रुपया न मिलने पर कोई बात नहीं ,कहकर चला जाता है। अब उनको कौन समझाये ?'बूँद -बूँद से ही तो सागर भरता है।'' 


भिखारियों को भीख में लोग एक रुपया ही उनकी झोली में डालते थे ,आज के समय में बहुत से ऐसे भिखारी करोड़पति बने बैठे हैं। यह सब तो आपने समाचार -पत्रों में पढ़ा ही होगा। एक भिखारी के पास से इतना धन प्राप्त हुआ। उसके अपने फ्लैट भी थे। 

आप कहेंगे -'हमारी कहानी तो टॉफियों पर ही आकर अटक गयी। ऐसा नहीं है ,चार आने की पचास ग्राम मूंगफलियां भी खाई हैं और आज उनके दाम देख लोगे ,तो तब एहसास होगा ,जो चीज एक रूपये में आती थी। आज उसकी कीमत सौ रूपये के बराबर हो गयी है। यानि की आज के सौ रूपये पुराने समय के एक रूपये के बराबर है। 

 आजकल एक रुपया कम ही दिखलाई देता है, वैसे तो अब एक रुपया तो जैसे अपनी आखिरी सांसे ले रहा है। '' डिजिटल रुपए'' जो आ रहे हैं। अब ''ऑनलाइन'' ही पेमेंट हो जाती है। ऑनलाइन ही सारे काम हो जाते हैं।

 लोगों की जेबों में अब रुपया कम ही दिखलाई देता है। बात भी सही है ,अब बीवी या चोर द्वारा, न ही जेब कटने का ख़तरा और न ही कपड़ों में पैसे धुल जाने का भय !

 किंतु अभी भी पैसा दिख जाता है। आज भी विवाह के  लिफाफे में शगुन का एक रुपया पहले से ही चिपका  रहता है। बाकी के उस व्यक्ति की आपसदारी और उसकी जेब पर निर्भर करते हैं कि उसे ,उस लिफाफे में कितने पैसे डालने हैं ?

 देखा जाए तो एक और एक मिलकर दो भी हो जाते हैं, दो में एक और मिलेगा तो तीन हो जाएंगे संख्या एक से ही शुरू होकर बढ़ती चली जाती है। जैसे कि'' बूंद बूंद से सागर ही नहीं घड़ा भी भरता है।'' इस तरीके से एक -एक रुपया  मिलकर , हजारों और हजारों मिलकर लाखों में परिवर्तित हो जाते हैं। किंतु लोग उस छोटी संख्या को भूल जाते हैं, जो एक बूंद की तरह उस सागर में मिल चुकी होती है। 

देखा जाए तो, अब तो 500  और हज़ार के नोट का भी कोई मूल्य नहीं रहा है। किन्तु ५०० का नोट अपने परिवर्तित रूप में आ गया है। उसको बदलने के लिए लोग भी बहुत लाइन में लगे थे। भारतीय पैसा नीचे गिरता जा रहा है। 

एक और एक मिलकर 11 भी दिखने लगते हैं। हर जीरो के बाद एक जरूर आता है जैसे की 10 के बाद  एक मिला दें तो ११ बन जानते हैं।  20 के बाद एक और मिलने पर 21 , वैसे ही है। एक रुपया  दिखता नहीं है किन्तु आज भी उसका महत्व कम नहीं हुआ है।

 पहले समय में एक रुपया दानपात्र या भिक्षा के पात्र में ड़ालकर ,अपने को बड़े दानवीर समझते थे। पहले  समय में शादी- विवाह में एक-एक के सिक्के घुड़चढ़ी के समय ,बन्ने पर वार फेर करके उछाले जाते थे। लड़की की विदाई के समय में भी पैसे डालते थे। किंतु आज तो बड़े-बड़े नोट लगते हैं। उस समय एक सिक्का, एक रुपया भी कीमती होता था।  आज के समय में एक रुपए का जैसे महत्व ही खत्म होता जा रहा  है। महंगाई जो इतनी बढ़ गयी है। 

भगवान जी पर मंदिर में, अक्सर एक का सिक्का ही चढ़ता था। जो कभी कागज़ के नोट के रूप में जाने जाते थे ,आज वे भी सिक्के को श्रेणी में आ गए हैं। ₹5 का नोट ₹10 का नोट अब यह भी चिल्लर की तरह ही बन गए हैं। उनकी ऐसी हालत देखकर तो लगता है ,एक रुपया अब बुरा नहीं मानेगा, जब बड़े-बड़े नोटों  को भी  अब चिल्लर के रूप में प्रयोग किया जा रहा हैं।

 कपड़ों की धुलाई करते समय पहले कभी जेब से 10 का नोट भी हाथ में आ जाता था, तो बहुत खुशी होती थी, कि पैसे मिले हैं और कई बार तो पानी में भीग जाने के कारण ,गल जाते थे और फिर उन्हें प्यार और सहजता से धूप में सुखाया जाता था , ताकि वह नोट सही सलामत रहे। किंतु अब यह बेचारे चिल्लर के रूप में, एक रूपये के सिक्के की तरह दराज़ में पड़े रहते हैं।

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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