लॉकडाउन का वह समय जब लोग सब अपने घरों में बैठे थे। सभी के अच्छे स्वास्थ्य की कामना करते। दूर रहने वाले अपने परिवार के लोगों के लिए चिंतित थे। सब चाहते थे, यह समय किसी तरह शांतिपूर्वक बीत जाए। किंतु जो लोग, घर से बाहर जाकर काम करते थे। अब अपने घरों में बंद होकर रह गए थे। वह बंधन उन्हें कचोट रहा था। सुबह तैयार होकर, जल्दी-जल्दी घर से निकलना, जिसकी उन्हें आदत पड़ चुकी थी। अपने ही घर की चार दिवारी में कैद होकर रह गए थे। उन्हें इस तरह रहना पसंद नहीं आ रहा था। बैचेनी से इधर -उधर टहलते समय पर भोजन करके फोन पर व्यस्त हो जाते। या फिर किसी को फोन करके उनका हाल -चाल जानना चाहते।ज़िंदगी जैसे थम सी गयी थी।
कोई' कोरोना' से पीड़ित होता तो अफ़सोस ज़ाहिर करते या फिर उसके लिए दुआएं करते।कैसा समय आ गया है ? कैसी दुविधा है ?किसी अपने को ही, मरने के लिए अकेला छोड़ देना पड़ रहा है। उसके दुःख में भी साथ खड़े नहीं हो सकते।
किन्तु उस एकांत में भी उन्होंने कभी सोचा नहीं ,जो तुम्हारे साथ है ,उसकी परवाह के लिए तुम्हारे पास अब समय ही समय है।दूर रहने वाली की फ़िक्र है जिसके लिए कुछ नहीं कर सकते। तुम्हारी पत्नी जो तुम्हें समय पर भोजन दे रही है। घर के कार्य करते हुए, उनके इर्द -गिर्द मंडराती नजर आती है। कभी बच्चों की ख़्वाहिशें तो कभी पति देव की इच्छा पूर्ति में लगी रहती है, किन्तु उनमें से किसी ने भी ,उसको समझने का प्रयास नहीं किया। सभी की छुट्टी थी। उनकी मज़बूरी थी, किन्तु उसकी क्या मजबूरी थी ? वो तो बिन 'कोरोना' के ही इसी तरह घर में कैद अपने काम में व्यस्त थी बल्कि अब तो उसका काम और बढ़ गया था। फोन भी कब तक देखें ? समय काटे नहीं कट रहा था।
नवीन ने अपनी व्यस्तता के दिनों में कभी इस ओर ध्यान ही नहीं दिया,किन्तु अब अपने उन एकांत क्षणों में ,जब नंदिनी को लगातार काम करते देखता ,तब उसे ''एक नया एहसास ''हुआ। मैं अपने दफ्तर में काम करता हूँ ,दोस्तों से मिलता, बातचीत करता हूँ। थकहार कर घर आता हूँ तो उम्मीद करता हूँ -' नंदिनी, मुझे तुरंत भोजन दे ! मैं आराम करूं !
आज नवीन सोच रहा था ,कभी -कभी तो इसे' मैं' गुस्से में कह देता था -तुमसे ये काम भी नहीं हुआ ,तुम दिनभर करती ही क्या हो ? जब पापा -मम्मी थे, उनके काम में लगी रहती थी। अब वे नहीं रहे किन्तु बच्चे तो हैं। उन्हें पढ़ाना ,उनकी पसंद का नाश्ता बनाना ,कपड़ों पर प्रेस करना।छुटपुट के कितने काम हो जाते हैं जो गिनती में ही नहीं आते।
हमें लगता है ,नौकरी करना ही काम है ,महिलाएं नौकरी करती हैं , वे तो दोहरी ज़िंदगी जीती हैं ,बाहर जाकर अपने मित्रों ,भाई -बंधु से मिल लेती हैं ,अपनी व्यथा का समाधान ढूंढती हैं , उनकी समस्या तो उनका पति भी सुन लेगा ,वो नहीं तो कोई न कोई तो सुन ही लेगा क्योंकि वो कमाती हैं ,क्योंकि वो आत्मनिर्भर है। किन्तु ये गृहणी सारा दिन के लिए घर में बंधकर रह जाती हैं। घर में क्या बनेगा ?किसके लिए कपड़े बनेंगे ?किसकी फ़ीस अभी जमा नहीं हुई। सारा दिन यही चलता रहता है।
नंदिनी को देखते हुए नवीन सोच रहा था -इसको' मैं' कब घुमाने ले गया था ?बरसों हो गए ,हमें कोई नई फ़िल्म एक साथ देखे हुए।शुरू -शुरू में तो कहती थी ,ये भी ध्यान रखती थी, कौन सी फ़िल्म कहाँ लगी है ? अब इसने ये कहना भी छोड़ दिया। हमें बस अपनी परेशानी और व्यस्तता नजर आती है। ये विवाह करके मेरे साथ चली ,न कोई इच्छा ,न ही कोई शर्त ! थक जाती है , तो दवाई खाती है ,अगले दिन के लिए फिर तैयार हो, काम में जुट जाती है।
इसे भी तो जीवन में कुछ नये बदलाव की इच्छा होती होगी ,हमारे विवाह को बीस वर्ष हो गए और ये इस घर से बंधी लगातार अपनी जिम्मेदारियों को निभा रही है। इसके मन में भी कुछ बातें आती होंगी ,ये भी तो कुछ कहना चाहती होगी। कुछ बातें ,जो' अनकही' रह गयी होंगी। कुछ सपने जो अधूरे रह गए होंगे। नवीन को अब ख़ाली समय में कुछ' नए एहसास' हो रहे थे। अपने लिए ही नहीं ,वह सबके लिए सोचने लगा था विशेषकर नंदिनी के विषय में सोचता ,जब उसको काम करते देखता।
अगले दिन जब नंदिनी उठी , प्रतिदिन की तरह नवीन के लिए नीबू पानी बनाने गयी तो देखा ,नवीन स्वयं ही नीबू -पानी बनाकर पी रहा है। तब नवीन ने नंदिनी से पूछा -तुम्हारे लिए चाय बनाऊं क्योंकि वो जानता था ,नंदिनी को सुबह चाय पीना अच्छा लगता है।
नंदिनी ने सोचा ,शायद नवीन मेरी किसी बात से नाराज है ,वो उसका चेहरा देखने लगी ,और पूछा -क्या हुआ ?
कुछ नहीं ,अब हमें इतने दिन बैठे हुए हो गए ,हमारी छुट्टी हो गयी ,अब थोड़ी छुट्टियों का आनंद तुम भी तो लो !आज बच्चे और मैं मिलकर नाश्ता बनाएंगे !आज तुम बताओ !नाश्ते में हम क्या बनायें ?इन छुट्टियों ने हमें अपनों के लिए सोचने का, करने का ,साथ में समय बिताने का समय दिया है तो क्यों न, हम सभी मिलजुलकर इन छुट्टियों का खुलकर आनंद उठाएं ।
