क्या कहूं ,कैसे कहूं ? कहते -कहते ,
लब तक आते -आते ठहर जाती हैं ,कुछ 'अनकही बातें '!
कहने को बहुत कुछ था,संकोचवश कह सकी न,कुछ अनकही बातें !
चाहती थी ','मैं ! विश्वास था ,मुझको !तुम ही सुनोगे ,मेरी अनकही बातें !
हर लोगे मेरे मन की पीड़ा ,सुलझाओगे, मेरी व्यथा की हर गांठ को,
कुछ ख़्वाहिशें थीं ,कहना था तुमसे, किन्तु समय की परिधि में बंधे तुम !
झिझकती मैं , तुम्हारी ओर उम्मीदों से तकती , क्या समझोगे ?मेरे मन को !
उत्तरदायित्वों के बोझ तले मैं ,दबती चली गयी ,कह सकी न अनकही बातें !
देख तुम्हारी वो बेरुखी ,लगा मुझे ,मेरी बात सुनना,क्या बनी तुम्हारी लाचारी !
लापरवाही तुम्हारी, ह्रदय को कचोटती, मेरी बातों का मर्म ,क्या तुम ?समझोगे !
लब तक आते -आते कुछ अधूरी सी ,दफ़्न कर दीं सीने में, वो कुछ अनकही बातें !
मौन हो गए, शब्द ! चुप्पी साध ,लगता जीवन से ताल मिला सकें न.... मेरी बातें !
पलकों पर मोती थरथराये ,ज़बरन थाम लीं मैंने,ह्रदय की घुटन बनी वो, अनकही बातें !
न तुमने सुनी ,न दिलचस्पी ही दिखलाई ,ख़ामोशी की क़ब्र में दफ़्न कर दीं ,वो अनकही बातें !
