Ankahi baaten

क्या कहूं ,कैसे कहूं ? कहते -कहते ,

लब तक आते -आते ठहर जाती हैं ,कुछ 'अनकही बातें '!

कहने को बहुत कुछ था,संकोचवश कह सकी न,कुछ अनकही बातें !

चाहती थी ','मैं ! विश्वास था ,मुझको !तुम ही सुनोगे ,मेरी अनकही बातें !


हर लोगे मेरे मन की पीड़ा ,सुलझाओगे, मेरी व्यथा की हर गांठ को,  

कुछ ख़्वाहिशें थीं ,कहना था तुमसे, किन्तु समय की परिधि में बंधे तुम !

झिझकती मैं , तुम्हारी ओर उम्मीदों से तकती , क्या समझोगे ?मेरे मन को !

उत्तरदायित्वों के बोझ तले मैं ,दबती चली गयी ,कह सकी न अनकही बातें !

देख तुम्हारी वो बेरुखी ,लगा मुझे ,मेरी बात सुनना,क्या बनी तुम्हारी लाचारी !

लापरवाही तुम्हारी, ह्रदय को कचोटती, मेरी बातों का मर्म ,क्या तुम ?समझोगे ! 

लब तक आते -आते कुछ अधूरी सी ,दफ़्न कर दीं सीने में, वो कुछ अनकही बातें !

मौन हो गए, शब्द ! चुप्पी साध ,लगता जीवन से ताल मिला सकें न.... मेरी बातें !

पलकों पर मोती थरथराये ,ज़बरन थाम लीं मैंने,ह्रदय की घुटन बनी वो, अनकही बातें !

न तुमने सुनी ,न दिलचस्पी ही दिखलाई ,ख़ामोशी की क़ब्र में दफ़्न कर दीं ,वो अनकही बातें !

 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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