Mera ghar hi meri duniya

मम्मी ! मैंने आपसे कितनी बार कहा है ? अब आपको हमारे साथ चलना चाहिए। अब पापा भी नहीं रहे , यहां अकेले रहकर क्या करोगी ? आस -पास के पड़ोसी और रिश्तेदार तो हमें ही कहेंगे -'' इस उम्र में अपनी माँ को अकेला छोड़कर चले गए ,कुणाल अपनी मम्मी से कह रहा था। 

मुझे, अपने साथ क्यों ले जाना चाहते हो ? रिश्तेदारों के तानों के कारण, क्या तुम्हें, मुझे साथ ले जाने की इच्छा नहीं है ?

आप कैसी बातें कर रहीं हैं ? आप अकेले इस घर में क्या करेंगी ? 


इस घर का क्या होगा ? तुम्हारे पापा ने, इतने परिश्रम से यह घर बनाया है , उनके जीवन भर की पूंजी इसमें लगी है। अब उम्र के इस पड़ाव में इस घर को छोड़कर कैसे जा सकती हूं ? इसमें उनकी यादें जुड़ी है। तुम्हारा बचपन खेला है। 

मम्मी' इमोशनल' होने की जरूरत नहीं है, जब मैं वहां नौकरी करता हूं , तो इस घर की देखभाल कौन करेगा ? इस घर को बेच देंगे। 

क्या तुम्हें इस घर से थोड़ा भी लगाव नहीं है, अपनापन नहीं है, इस घर में तुम्हारा बचपन बीता है तुम यहीं पर खेले -कूदे और बड़े हुए हो। बड़ी उम्मीदों के साथ, मैंने इस घर में' गृह प्रवेश' किया था। तेरे पापा के और मेरे सपने इस घर से जुड़े थे।  मैं इस घर को छोड़कर कैसे जा सकती हूं ? और तुम बेचने की बात कर रहे हो। 

और क्या कर सकते हैं ?क्या आप यहाँ अकेली रहेंगी ?

अकेलेपन की तो तुम बात ही न करो !कई बार अपने लोगों के बीच रहकर भी अकेला रह जाता है।  मैं तुम्हारे साथ जा सकती थी, अब तुम ही सोचो ! तुम जीवन भर मेहनत करके अपने लिए ,अपने परिवार के लिए घर बनाते हो , उसमें अपनी जीवन भर की पूंजी ही नहीं, उससे तुम्हारे सपने जुड़े होते हैं।वो घर नहीं तुम्हारा सपना है। तब  तुम सोचते हो,-  हमारे बुढ़ापे में यह घर हमारी यादों को ताजा करेगा, इसमें हम अपना बाकी का जीवन खुशी -खुशी व्यतीत करेंगे। 

 किंतु ऐसा नहीं होता है, तब तुम क्या करोगे ? जब तुम्हारे बच्चे कहेंगे - इस घर को छोड़कर, चले जाओ ! जीवन भर की पूंजी, तुम्हारा सपना उसे बेच दो ! तो तुम पर क्या बीतेगी ?तुम्हारे पापा के और मेरे सपने इस घर से जुड़े थे। मैं भी सोचती थी -'घर में बहू आएगी, उसके पायल की झंकार मेरे घर के आंगन में गूंजेगी। और मैं खुशी-खुशी अपने इस घर में, अपने वंश को आगे बढ़ते हुए देखूंगी।'' किंतु तुमने तो जैसे मेरे उस सपना की जड़ें ही काट दीं। 

तुम यह भी तो कह सकते थे - मम्मी ! हम अपने त्यौहार मनाने के लिए यहीं पर आया करेंगे। हम  मिलजुल कर यही रहेंगे। माना  कि नौकरी के कारण, तुम बाहर जा रहे हो किंतु छुट्टियों में तो आ सकते हो। अभी मैं मरी नहीं हूं, अभी मैं जिंदा हूं। हमने ये घर तुम्हारे लिए ही बनवाया था ,आंगन में तुम्हारे बच्चों को खेलते देखूंगी। मेरे मरने के बाद तुम कुछ भी करना, किंतु जब तक मैं जिंदा हूं ,तुम्हारे पापा की यादों के सहारे, तुम्हारे बचपन के सहारे, मैं इस घर में जी लूंगी। 'अब यही घर मेरी दुनिया है।' मैं इसे छोड़कर कहीं नहीं जाऊंगी, उन्होंने अपना अंतिम निर्णय सुना दिया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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