हाथों की लक़ीरों में छुपे राज़ कई ,
' उसने 'बनाया पर समझा न कोई।
कहने और समझने वाले कहते,लोग कई।
आडी- तिरछी रेखाओं में जन्म- मरण का खेल है।
नक्शा ऐसा, खिंचा हुआ है।
अब तक बांच सका न कोई।
मानव जीवन के,' राज़' कई !
कब, क्या, किससे, कैसे हो बिछुड़ना ?
कब, किस मोड़ पर मिल जाये, कोई ?
ये आती- जाती माया की, दिखती लम्बी रेल है।
मिलना हो उनसे ,चाहा मैंने ,
कब, किससे मिलना होगा ?
रेखाचित्र बना, इन लक़ीरों में।
न जाने, भाग्य में, क्या बदा है ?
जीवन बना रहस्य, जान सका न कोई !
पहेली, इस जीवन की कैसे बूझें ?
क्या नक्शा छिपा ?इन लक़ीरों में ?
'कर्म रेखा' भी बनी, इन लक़ीरों में।
जान पायेगा न रहस्य !उसकी माया का।
उसने खेल रचाया ,'हाथ की लकीरों' का।
कैसी ये पहेली ? गूढ़ रहस्य ये जीवन !
कर्म द्वारा सुलझा तू , रहस्य लक़ीरों का।
