'ख़बर ' तो जैसे पंख लगाकर उड़ रही थी ,इस कान से उस कान ,इस मुँह से ,उस मुँह होते हुए ,इस गली से होते हुए, पूरे मोहल्ले की 'ज़ीनत 'बन गयी थी किन्तु जहाँ की उसकी पैदाइश थी ,वहीं किसी को मालूम नहीं था कि उनके घर की खबर नमक -मिर्च के साथ, चटपटी बन, गली -कूचों से होते हुए रिश्तेदारियों तक घूम आई है। कोई कितनी भी ख़बर छुपा ले , खबर छुपाए कहां छुपती है ? जिसमें कि 'सोहेल की खाला' जैसी ख़ातून खबर को उड़ने में मदद कर रही थी।
मोहल्ले पर तो इतना फर्क नहीं पड़ा, किंतु यह खबर न जाने कैसे, ज़ीनत की फूफी के पास पहुंच गई। वह तो तुरंत ही दौड़ी चली आई और अपने भाईजान से पूछा -भाई जान ! मैं यह क्या सुन रही हूं ? क्या अपनी ज़ीनत कहीं चली गयी थी ?या फिर उसे कोई उठा कर ले गया था।
हैरत से उन्होंने पूछा - यह तुमसे, किसने कहा ? युसूफ मियां बात को संभालने की कोशिश करते हैं , कहते हुए बोले -लोग भी, कुछ का कुछ कर देते हैं। हमारे रहते, भला उसे कौन उठाकर ले जा सकता है ?जिसने तुम्हें ये ख़बर दी ,उससे पूछतीं -''कौन उठाकर ले गया और उसको छोड़ भी गया।'
मैं किससे क्या कहूँगी ? मैंने तो जिससे भी सुना ,सब यही कह रहे हैं - ज़ीनत को कोई उठा कर ले गया था और रातभर उसे रखा और सुबह छोड़ गया।
न जाने कौन ,हमारा दुश्मन बना बैठा है ? जो इस तरह की ख़बरें फैला रहा है ,नहीं, ऐसा कुछ भी नहीं हुआ है, सलमा अंदर से आते हुए बोली - लोगों को आग लगी हुई है। यूसुफ़ मियां की इतनी खूबसूरत साहिबज़ादी हैं ,अपने डॉक्टर साहब से रिश्ता भी तय हो गया इसीलिए जलन हो रही है ,तब सोचा ,इसे कैसे बदनाम किया जाये ?
ऐसी जलन किसे होगी ?कौन है ,जो अपनी ज़ीनत से जलता है ?
अरे ! जलनेवाले क्या मुँह पर आकर कहेंगे ?उनका इरादा तो यही होगा किसी तरह इसकी ज़िंदगी बर्बाद करे ,और कुछ नहीं मिला तो इसे बदनाम ही कर दें ! अपना ख़ालिद क्या ??? इससे पहले कि सलमा अपनी बात पूरी कर पाती यूसुफ़ मियां ने अपनी बेग़म की तरफ आँखें निकाली और इशारे से उसकी बात छेड़ने को मना किया।
तब सलमा बोली - यह तो अपने मामू के साथ घूमने चली गई थी। तुम्हें तो पता है ही, लोगों को'' बात का बतंगड़ बनाते देर नहीं लगती।'' ऐसा कुछ भी नहीं हुआ था। सारी गलती तो हमारी है ,हमारी ज़ीनत हमारी नजरों से पल भर के लिए भी दूर हो जाये तो इसके अब्बू की तो जैसे इसमें जान बसती है ,अब ये नजरों से ओझल हुई और हमने एक -दो घरों में जाकर क्या पूछ लिया ?लोगों को लगा, ज़ीनत गायब हो गयी कोई उसे उठाकर ले गया।
रुकैया ने दोनों की तरफ देखा ,इनके चेहरों में आज उतनी चमक नहीं ,थोड़ा घबराये हुए हैं। मन ही मन सोच रही थी, मुझे इनकी बातों पर विश्वास करना चाहिए या नहीं ,अभी वह यही सोच रही थी।
तभी सलमा धीरे से क़रीब आई ,यूसुफ़ साहब तो अंदर चले गए तब वो रुकैया से बोली -मुझे तो लगता है ,यह अफ़वाह ख़ालिद की फैलाई हुई है ,तुम्हारे भाईजान तो मुझे ये बात बताने से इंकार कर रहे थे किन्तु जब अपनी बेटी का मामला है तो मैं चुप न बैठुंगी।
क्या हुआ ?ख़ालिद ने क्या किया ,मुझे तफ़्सील से समझाइये !
दरअसल हुआ यूँ था, ख़ालिद ने, हमारी ज़ीनत को एक दिन बाज़ार में देख लिया था ,उसे हमारी बेहद ज़ीनत पसंद आई और उसने ,घर जाते ही अगले दिन' ज़ीनत 'के लिए रिश्ता भिजवाया ,तब हमने अपने अहमद मियां के कारण उसके रिश्ते को इन्कार जो कर दिया इसीलिए हमारी बेटी को बदनाम कर रहा है।
वो भला ,इसे क्यों बदनाम करेगा ,इसकी बदनामी से क्या उससे, इसका रिश्ता हो जायेगा ? इस तरह बदनाम लड़की को तो कोई भी अपने घर की 'ज़ीनत' न बनाएगा।
दोपहर के खाने के बाद ,रुकैया बोली -अब मैं अपने घर जा रही हूँ।
रुकैया को रुख़सत करते समय यूसुफ़ साहब बोले -रुकैया ! देखो ! लोगों का क्या है ?लोग तो कुछ का कुछ बोलते हैं। तुम्हारा अपना घर और परिवार है ,तुम भी यहाँ के तौर -तरीक़ों से वाकिफ़ हो। किसी की भी कही -सुनी बातों में नहीं आना चाहिए।
वापस ,तख़्त पर बैठते हुए रुकैया बोली - भाईजान ! ये आपकी बेटी ज़ीनत की ही ज़िंदगी का सवाल नहीं है ,यह मेरे बेटे अहमद की जिंदगी का सवाल भी है ,वो तो इतना सीधा है ,उसने सब मुझ पर ही छोड़ा हुआ है।तभी उसे जैसे कुछ याद आया बोली -अपनी ज़ीनत है ,कहाँ ? फूफी से मिलने भी नहीं आई और अब रुख़सत करने भी नहीं आई।
क्या मैं एक बार अपनी ज़ीनत से मिल सकती हूँ ,वो कहाँ है ? अब तक तो वो दौड़ते हुए मेरे पास आ जाती।
उसे पता ही नहीं चला होगा, कि उसकी फूफी जान आईं हैं ,जबकि सलमा ने ही ज़ीनत को अपने कमरे में बैठकर ,कुछ भी काम करते रहने के लिए कहा था ,उसे डांटते हुए बोली - अब तुम बच्ची नहीं रही हो ,फूफी को कुछ भी पता नहीं चलना चाहिए ,अब ज़ीनत भी पहले की तरह उछलती -कूदती नहीं थी। उसके दर्द को किसी ने कहाँ समझा ? ऐसे में तो उसके अपने माता -पिता भी दुश्मनों की तरह पेश आ रहे थे।
अब तो वो यही सोच रहे थे ,किसी तरह 'निक़ाह' करके इसकी अहमद के साथ रुख़सती हो और हम चैन की साँस ले सकें। इसने बहुत बदनामी कराई है।
किन्तु किसी ने ज़ीनत से यह नहीं पूछा,' उस पर क्या बीत रही है ? इतनी कम उम्र में ,किसी अनजान शख़्स ने उसकी रूह को तार -तार किया है। उसे ज़िंदगी भर का जख़्म दिया है और अब उस जख़्म पर मरहम लगाने वाला कोई नहीं। जिन अब्बू -अम्मी की वो ''आँखों का तारा बनी हुई थी ,अब शूल बन गयी है।''कोई उनसे या फिर इन दुनियावालों से पूछे - इसमें, ज़ीनत की क्या गलती है ?बल्कि उसे तो और सज़ा मिल रही है ,उसे अपने ही घर में कैद कर दिया गया है। अब एक कमरे बैठी ,वो घर के काम सीखने पर मजबूर हो गयी है। ताकि निक़ाह के बाद अहमद मियां को खुश रख सके ,उसकी ख़ुशी से किसी का कोई वास्ता नहीं।
बार -बार उस शख़्स के बारे में सोचती ,न जाने वो कौन था ?क्या उसे मेरे शरीर की ही चाहत थी ? उसने ये सब इतनी एहतियात से किया ,ज़ीनत समझ ही नहीं पाई ये कौन इंसान था ?
अब्बू ने कई बार पूछा -उसकी क़द -काठी ,उसकी महक़ ,उसकी आवाज़ कैसी थी ?किन्तु ज़ीनत को कुछ भी याद नहीं।
इतने दिनों में जीनत भी, उस हादसे से थोड़ा उबर गयी थी। मन ही मन उसके अम्मी -अब्बू सोच रहे थे ,इतनी एहतियात बरतने पर भी न जाने ये बात कैसे फैल गयी ?
सलमा ने ,ज़ीनत को अच्छे से समझाया था-' जो हो गया उसे भूल जाओ ! फूफी को जरा भी पता नहीं चलना चाहिए . कि तुम्हें कोई उठा कर ले गया था और तुम एक रात वहां रही हो। यदि ये बात उसे पता चल गयी तो वो रिश्ता तोड़ देगी और एक बार रिश्ता टूट गया तो यहीं बैठी -बैठी बूढी हो जाना ,कोई रिश्ता लेकर आने वाला नहीं है।
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