सोहेल की खाला , सलमा के घर से निकलकर, नादिरा के घर में घुस गईं। जब तक दिन में दो-चार बातें, इधर की उधर, उधर की इधर कर लें , उन्हें चैन नहीं पड़ता। नादिरा के घर में घुसकर बोलीं - क्या कर रही हो ? नादिरा !
आइये !आइये !खाला !कैसे आना हुआ ?
अरे ! ये क्या कह रही हो ? नादिरा ! मैं तुम्हारी खाला थोड़े ही हूँ ,'सोहेल की खाला' हूँ ,क्या तुम्हें,' मैं 'तुम्हारी खाला नज़र आती हूँ। तुमसे दो -एक साल छोटी ही हूँगी,अपनी ही भारत पर मुस्कुरा दीं।
हँसते हुए ,नादिरा बोली - मैंने कब कहा ?आप मेरी' खाला' हैं ,जल्दबाज़ी में सोहेल की खाला न कहकर ,सीधे'' खाला कह दिया। अब कोई इतना लम्बा नाम तो नहीं बोलेगा -'सोहेल की खाला ''इसीलिए छोटा कर दिया। अब तो छोटे नामों का ही फ़ैशन चल रहा है।
फ़ैशन को मारो ! गोली !ये फ़ैशन ! न जाने इस दुनिया को कहाँ ले जाकर छोड़ेगा ?पीढ़े पर बैठते हुए बोलीं।
नादिरा समझ गयी थी, इन्हें अभी न रोका गया तो फ़ैशन पर ही लम्बा भाषण सुना डालेंगी ,तब नादिरा बोली - 'खाला 'अब तो आपको मोहल्ले में सभी 'खाला 'के नाम से जानते हैं और पुकारते भी हैं ,अब मैंने कह दिया तो कौन सा'' पहाड़ टूट पड़ा ?'' ख़ैर !ये सब छोड़िये ! ये बताइये ! सब खैरियत से तो है।
खैरियत ही, तो पूछने गयी थी ,वहीं से आ रही हूँ ,तब तक नादिरा ने उनके सामने पान लाकर रख दिया, मुँह में पान दबाते हुए बोलीं -' ज़ीनत' की खैर खबर लेने गई थी।
'ज़ीनत 'नादिरा को सोचते देखकर ,खाला बोली -अरे !वो जो बड़े घर वाले यूसुफ़ मियां हैं ,उनकी साहबज़ादी ! का नाम ही तो 'ज़ीनत 'है।
अच्छा ,एक बार तो उसे देखा था ,पर नाम याद नहीं रहा। क्यों ? ज़ीनत को क्या हुआ ? सब खैरियत से तो है।
यह क्या कह रही हो ? क्या तुम्हें कुछ भी मालूम नहीं है ? हाथों को नचकाते हुए खाला ने पूछा - क्या तुम्हें पता है ? कल सारा दिन' ज़ीनत' अपने घर से गायब थी।
कहां चली गई थी ? नादिरा सहजता से पूछती है।
लो, दुनिया को खबर हो गई, लेकिन अभी ये न जाने किस दुनिया में खोई हुई है। अरे, कल उसके अब्बू सारे मोहल्ले में उसे ढूंढ रहे थे।
चली गई होगी, किसी के साथ,हो सकता है ,अपनी किसी सहेली के साथ गयी हो, नादिरा ने लापरवाही से कहा।
यह बात तो उसकी अम्मी सलमा भी कह रही है - कि अपने मामू के साथ चली गई थी , पर मुझे नहीं लगता, कि वह अपने मामू के साथ गई होगी , मुझे तो लगता है, किसी लौंडे के साथ घूम रही होगी,भोंहे मटकाते हुए वो बोलीं।
नादिरा को खाला का वो अंदाज़ पसंद नहीं आया ,किसी की बहु -बेटी को इस तरह बदनाम करना अच्छा नहीं ,किन्तु वो खाला की आदत जानती थी ,तब उसने पूछा - क्या वो, मिली या नहीं ?
अब उसके घरवाले, उसे ढूंढ कर तो ले आए हैं लेकिन बातों को छुपा रहे हैं, धीरे से और रहस्य्मयी तरीक़े से सोहेल की खाला ने कहा।
उसकी आवाज रहस्यमई और हो गई थी, तब वह बोली -उसी से तो मैं मिलने गई थी किंतु उसकी अम्मी ने मिलने ही नहीं दिया। कह रही थी -'बच्ची सो रही है। ' अब तुम ही बताओ ! दिन में भला इस वक्त कौन सोता है ? मुझे तो लग रहा है, वो ,मुझसे उसे छुपाना चाहती थी , इसीलिए उससे मिलने नहीं दिया।
क्या छुपाना चाहती होगी ? नादिरा ने पूछा।
अब यह मैं कैसे कह सकती हूं ,कल को कोई बात हो गई, तो सब मेरे ही नाम लगा देंगे ,' सोहेल की खाला ' कह रही थी। अगर तुम कुछ ना कहो, तो मैं तुम्हें बताती हूं - मुझे तो लगता है, या तो उसे कोई उठा कर ले गया और या फिर वह किसी के साथ भाग गई थी।
तब उसके घर वालों ने, उसकी ढुंढेर मचाई और जब मिल गई तो... उसे मारा -पीटा होगा , इसीलिए उसे छुपा कर रखा है। हो सकता है, उसे कमरे बंद भी किया हुआ हो। वैसे मुझे किसी के बारे में कहना तो नहीं चाहिए किंतु तुम तो अपनी हो, इसीलिए तुमसे यह बात कह रही हूं ,यह बात घर से बाहर नहीं जानी चाहिए। हमारी आपस की बात है।
बेचारी, बच्ची ! को क्यों बदनाम करना ? अच्छा अब मैं चलती हूं। बहुत देर हो गई घर में बहुत काम भी पड़ा है। तुम तो जानती ही हो , आजकल की बहुएं कहां काम करती हैं ? कहते हुए वहां से उठकर चली गईं ।
अभी दो घर आगे ही गई थीं ,साज़िया की अम्मी ,उन्हें दालान में बैठी नज़र आईं ,वो क्रोशिये से कुछ बुन रही थी। दालान में झाँकते हुए ,खाला ने पूछा -ए ,बीबी ! क्या कर रही हो ?
साज़िया के लिए एक क्रोशिये की जाखट बना रही हूँ ,आओ ! बैठो !
मकान में अंदर घुसते हुए खाला बोलीं -अब क्या आऊं ?बहुत देर हो गयी ,तुम्हें काम करते देखा तो दिल खुश हो गया, तेरे जैसी मेहनती औरत इस मोहल्ले में कहीं नहीं दिखती, सारा दिन किसी न किसी काम में लगी ही रहती है। कहते हुए बगल में पड़ी मुड्ढी पर बैठ गयी और बोली - साज़िया के बाप की तो'' क़िस्मत खुल गयी ''जो तेरे जैसी बीवी उसे मिली।
साज़िया ! और साज़िया !देख' खाला' आई हैं ,इनके लिए खाने को कुछ ले आ !
अभी आई, अम्मी !उसकी आवाज़ गूंजी ,कुछ देर बाद वो भी तश्तरी में खाने के लिए कुछ ले आई ,आदाब !खाला !
आदाब !आदाब ! कितनी ज़हीन बच्ची है ,अपने बड़ों का आदर करती है ,अल्लाह !ऐसी बच्ची सभी को दे।
साज़िया की अम्मी मुस्कुराई और पूछा -कहाँ से आ रहीं हैं ?
अब तुम्हें क्या बताऊँ ?वो अपने' यूसुफ मियां 'हैं ,न... जिनका बड़ा घर है ,मोहल्ले में एक ही तो बड़ा घर है।
हाँ ,उनके घर को क्या हुआ ?
नहीं री ,घर को कुछ नहीं हुआ ,उनकी साहिबज़ादी ! ज़ीनत ! ज़ीनत का नाम सुनते ही 'साज़िया ' जाते -जाते वहीं खड़ी रह गयी, और उनकी बातें ध्यान से सुनने लगी।
'ज़ीनत 'उसे क्या हुआ ?खाला !नज़दीक आकर साज़िया ने पूछा।
क्या, तू उसे जानती है ?आँखें घुमाते हुए खाला ने पूछा।
हाँ ,वो तो मेरी बड़ी अच्छी सहेली है। खाला !बताइये ! ज़ीनत 'को क्या हुआ ?
अच्छा !उसी की खैरियत पूछने गयी थी ,बेचारी, बच्ची !अपने मामू के साथ घूमने गयी थी ,घर में किसी को बताया नहीं ,यहाँ घरवाले सभी परेशान उसे खोज रहे थे। तभी मुझे पता चला ,'ज़ीनत 'कहीं चली गयी है इसलिए आज उसकी ख़ैरियत पूछने गयी थी।
' ज़ीनत' मिल गयी या नहीं ,साज़िया ने पूछा।
आजकल के बच्चे भी न... अपने अम्मी और अब्बू को बताकर जाती तो वे इस कदर परेशान तो न होते। वैसे बड़ी ही प्यारी बच्ची है।
'खाला' !क्या वो घर आ गयी ?परेशान होते हुए साज़िया ने पूछा।
और क्या ?बताया तो अपने मामू से साथ घूमने निकल गयी थी ,अब घर में ही है। अच्छा ,अब मैं चलती हूँ ,कहते हुए खाला ने, घर से बाहर निकलकर गहरी साँस ली। आज तो बच गयी ,वो तो पता चल गया 'साज़िया 'उसकी सहेली है वरना ये तो मेरी चुगली कर देती, कि ख़बर खाला ने फैलाई है। खाला ,तो ख्वामहखाँ बदनाम है कि बातें इधर की उधर करती है। मुझे क्या ?मुँह बनाते हुए बुदबुदाई - किसी की बच्ची !कोई घूमे या फिर भागे ,कहते हुए उन्होंने अपने घर की तरफ कदम बढ़ा दिए।
