Khoobsurat [part 138]

 सब इंस्पेक्टर चांदनी के प्रश्नों से परेशान होकर, तब कल्याणी जी कहती है - सच्चाई यह नहीं है, सच्चाई मैं तुम्हें बताती हूं। 

अब हमें कुछ नहीं सुनना ,तुम्हारी बेटी ने सब  स्वीकार कर लिया है ,उन्हें डराते हुए चांदनी कहती है।

 तब कल्याणी जी  परेशान होकर रोने लगती हैं और कहती है -मेरी बेटी ऐसी नहीं है ,वह तो बहुत ही मासूम है सुंदर चित्रकारी करती है, किंतु लोगों ने उसके दिल को कभी समझा ही नहीं बल्कि उसकी सूरत  को देखा, जिसके कारण वह कई बार हताश भी हुई है ,रोई है।


 

मैं, अपनी बेटी को पल-पल टूटते हुए देख रही थी। मैं जानती थी -उसके जीवन में एक लड़का आया है , नित्या और वो दोनों उसके विषय में जानना चाहती हैं। दिल ही दिल में मेरी बेटी  उससे प्रेम करने लगी थी। वह लड़का भी उसकी चित्रकारी को ही चाहने वाला निकला।

 जब उसे पता चला कि उन पेंटिंग्स को  शिल्पा के द्वारा ही बनाया गया है। तब  उसने, शिल्पा की सहेली  मधुलिका से ही , विवाह कर लिया जबकि वो जान गया था कि उसे, मेरी बेटी पसंद करती है। मधुलिका मेरी बेटी की सहेली होकर, उससे कैसे विवाह कर सकती थी ?उत्तेजित होते हुए कल्याणी जी ने कहा। 

ये क्या जबरदस्ती है ? ये जरूरी तो नहीं,  जिसे तुम्हारी बेटी पसंद करे ,वो भी तुम्हारी बेटी को पसंद करे। क्या उसने, तुम्हारी बेटी से कहा था ?कि वो उससे प्रेम करता है ,उससे विवाह करेगा। 

नहीं, उसने ऐसा कोई वायदा तो नहीं किया किन्तु कुछ चीजें समझने की होती हैं ,कही नहीं जाती। आपको पता है, उसके इस व्यवहार के कारण मेरी बेटी अंदर ही अंदर टूट रही थी। अपने कमरे में बैठकर रोती रहती थी। 

दिखने से तो लगता था, जैसे -मैं अपनी बेटी के विषय में कुछ जानती ही नहीं ,किन्तु मुझे उसके एक -एक पल की ख़बर रहती थी।  नित्या  को मैंने उसको समझाने के लिए ही छोड़ा हुआ था।मेरी एक ही तो बेटी है ,उसे मैं तिल -तिल मरते कैसे देख सकती थी ?

तब तुम्हारी बेटी ने, उससे बदला लिया। 

नहीं, मेरी बेटी ने ऐसा कुछ भी नहीं किया।  इस बीच उसकी जिंदगी में रंजन आ गया -रंजन के आने से जैसे वह मुरझाती कली फिर से खिल उठी थी, अपने दुखों को भूलने का प्रयास कर रही थी और धीरे-धीरे उसकी जिंदगी फिर से पटरी पर आ गई।

 मुझे भी ,रंजन में अपना दामाद नजर आने लगा था।  क्या आप जानती हैं - वह रिक्शा चलाता था, गरीब परिवार से नहीं था किंतु उनकी मुलाकात उस समय ही हुई थी ,जब वह रिक्शा चलाता था। अपनी  पढ़ाई का खर्चा स्वयं करता था मैंने उसमें एक जिम्मेदार, स्वाभिमानी लड़का देखा था। 

सबसे बड़ी बात ,वो मेरी बेटी को ख़ुश रखने का हर सम्भव प्रयास करता था।  मुझे भी उससे उम्मीदें हो गयीं थीं  .तब लगा, यह मेरी बेटी को खुश रखेगा किंतु मुझे क्या मालूम था ? वह मेरी बेटी के लिए नहीं मेरी भतीजी के लिए आता था , उससे मिलने का बहाना ढूंढ रहा था ,इसके लिए उसने मेरी बेटी को मोहरा बनाया। 

जब मुझे यह पता चला, इसकी सोच में खोट है तो मुझे बहुत क्रोध आया। उसे क्या मोहरा बनाने के लिए ,मेरी ही बेटी मिली थी ? किन्तु मैंने भी सोच लिया था ,अब इसकी अच्छाई का किसी को भी लाभ उठाने नहीं दूंगी। 

 मेरी भतीजी बहुत खूबसूरत है ,उसे तो कोई भी मिल जायेगा ,पहले मैंने, नित्या का रवैया देखा किन्तु तब मुझे लगा ,नित्या को उसमें कोई दिलचस्पी नहीं है इसीलिए  तब मैंने, अपने भाई पर दबाव बनाया -'कि वह अपनी बेटी का विवाह कर दे !' मैं चाहती थी, कि शिल्पा का रास्ता साफ हो जाए।

 जब नित्या का विवाह हो जाएगा, तब वह मेरी बेटी को सहर्ष से स्वीकार कर लेगा किन्तु उसकी क़िस्मत तो देखो ! नित्या का जिससे विवाह हुआ वो रंजन का बॉस निकला। 

और तब असली कहानी की शुरुआत हुई ,तुम दोनों माँ -बेटी को नित्या से, और उसके परिवार से ईर्ष्या होने लगी,चांदनी ने अपनी बात पूरी भी नहीं की।  

तब कल्याणी जी बोलीं - यह आप कैसे कह सकती हैं ?

आपकी बेटी का व्यवहार ही बता रहा था ,उसका व्यवहार अपनी बहन नित्या  के प्रति भी सही नहीं था ,वो उससे चिढ़ने लगी थी।

 यह आप किसके कहने पर कह रहीं है ? 

मुझसे कौन कहेगा ? जब हम छानबीन कर रहे थे ,तभी हमें ये जानकारी मिली ,आपकी बेटी को अपनी बहन नित्या से इतनी ईर्ष्या हुई ,उसे फोन करना ,उससे बातें करना ही बंद कर दिया। 

आप ही सोचिये ,इंस्पेक्टर साहिबा ! ये तो इंसानी फ़ितरत है ,दो लड़कियों में इस तरह की ईर्ष्या होना स्वाभाविक है। 

अब आपको इंसानी फितरत नजर आने लगी ,आपकी बेटी तो बड़ी मासूम है ,अभी थोड़ी देर पहले ही आप कह रहीं थीं।

 उसके मामा आर्थिक रूप से हमसे कमजोर थे ,रंजन की नौकरी अच्छी थी किन्तु जब अचानक पता चले ,नित्या का पति तो उसका बॉस है। अचानक धक्का सा तो लगता ही है। 

तुम्हारी बेटी के पास पैसे वाले माँ -बाप थे ,तो नित्या के पास सुंदरता थी। क्या एक खूबसूरत ,सुशिक्षित पति नित्या को नहीं मिलना चाहिए था ? मुझे तो लगता है ,आपकी बेटी ही नहीं ,उसके रहन -सहन से ,उसके पति से आप भी जल उठीं। कोई तुम्हारी बेटी से, उसके पति से बेहतर कैसे हो सकता है ?क्यों सही कह रही हूँ ,न मैं !

 किन्तु उस जलन से तुम्हारी बेटी ने 'अपने घर में ही आग लगा ली 'ये बात कुछ समझ नहीं आई। जरा मुझे समझाएंगीं । 

मेरी बेटी ने, रंजन के लिए, क्या-क्या नहीं किया ? वो उसे नौकर से, मालिक बना देना चाहती थी। भले ही नित्या के पति के कारण ही वो ऐसा कर रही हो किन्तु वो भी तो अपने पति को ऊँचा देखना चाहती थी।

 वो  एक मामूली नौकरी ही तो करता था, उसके लिए कारोबार करने लगी और उसमें ,उसका सहयोग देने के लिए उसे प्रोत्साहित करती किंतु उसके मन पर  तो जैसे नित्या छाई हुई थी और वह अक्सर नित्या  से मिलने और बातें करने के बहाने ढूंढता।

 मेरी बेटी उसकी उन्नति के लिए अभी तक कारोबार में लगी हुई थी ताकि वह और रंजन दोनों मिलकर उस कारोबार को संभाले किंतु उसे तो जैसे उस कारोबार में कोई दिलचस्पी ही नहीं थी। ये तो मैंने भी महसूस किया ,उसकी मेरी बेटी में भी  कोई दिलचस्पी नहीं रह गयी थी। 

मेरी बेटी ब्याहता  होने के बावजूद भी, फिर से उदास रहने लगी थी।  तब मैंने  उन दोनों को, यहां से दूर एक अलग स्थान पर भेज दिया। मेरा मतलब है, कोठी नंबर 308 में...ताकि वहां पर दोनों एक दूसरे को समझ सकें , एक दूसरे के साथ समय बिता सके।

 मैंने नित्या से भी, फोन करके मना कर दिया था -'कि वह रंजन से कोई संबंध न रखें, और नित्या ने ऐसा किया भी, उसके मन में  रंजन के प्रति कोई भावना नहीं थी। वो अपने पति के साथ खुश थी किन्तु रंजन गाहे -बगाहे उससे मिलने के बहाने खोजता ,उससे फोन पर बातें करता। जिसके कारण मेरी बेटी और दामाद के रिश्ते में कड़वाहट बढ़ती चली गयी। एक छत के नीचे रहकर भी वो अजनबी बन गए थे। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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