रुकैया ,ज़ीनत से मिलने उसके कमरे में जाती है ,उनको देखकर ज़ीनत को कोई ख़ुशी नहीं हुई , ये भी उस ख़बर की तहक़ीकात करने ही आईं हैं। इन्हें, मुझसे कोई वास्ता नहीं ,उम्र से पहले ही ,ज़िंदगी ने ज़ीनत को लोगों को परखना सिखा दिया। जब अपने माँ -बाप ने ही उसे नहीं समझा तो फिर ये कैसे समझेंगी ?ये तो उस ख़बर पर मोहर लगाने आई हैं कि वो ख़बर सच्ची थी या फिर झूठी !
' ज़ीनत' झूठ ही सही,उन्हें देखकर मुस्कुराई , उसे जैसे रुकैया के आने से बेहद ख़ुशी हुई है। आदाब !फूफी जान !
आदाब ! कैसी हो ?अपनी फूफी से मिलने भी नहीं आ सकीं,उसके सिर पर हाथ फेरते हुए पूछा - तब रुकैया ने उससे पूछा -क्या कर रही हो ?क्या तुम्हें अपनी फूफी के आने का पता नहीं चला ?
नहीं ,मुझे पता ही नहीं चला ,वरना मैं जरूर आती , अम्मी ने ये कुछ कपड़े दिए हैं ,इन पर सिलाई सीख़ रही हूँ ,कहते हुए उसने छोटी -छोटी कतरनें उसे दिखाई।
सलमा !उसके चेहरे को देख रही थी ,ज़ीनत ने नजरें झुका लीं ,वो उसकी आँखों का दर्द तो नहीं किन्तु उसकी आँखों में सच्चाई ढूंढने की कोशिश कर रही थी। उसने महसूस किया ,अब इसकी आँखों में वो चमक नहीं है ,ये झूठे ही मुस्कुराने की कोशिश कर रही है। तब उसने बड़े प्यार से पूछा -तुम अपने मामू के साथ कहां चली गई थीं ,मेला कहाँ लगा था ? रुकैया ने तो सीधे यही सवाल किया।
जबकि सलमा ने, उसे समझाया था, कि फूफी से कहना -' मामू के साथ गई थी, किंतु यह नहीं बताया था कि कहाँ और किस मेले में गई थी ?
जीनत सोच में में पड़ गई , अब फूफी से क्या कहे ? तब बोली -ऐसे ही मेला देखने चली गई थी ,
कौन से मेले में गई थी ? रुकैया भी कम नहीं थी , उसने भी दुनिया देखी है ,बोली -इन दिनों में कौन सा मेला लगता है , तेरे मामू ,तुझे कहां लेकर गए थे ?
मुझे जगह का नहीं पता , रुकैया समझ गई , बात तो कुछ और ही है किंतु मुझसे छुपाई जा रही है। बोली -अब तुम इतनी बच्ची भी नहीं रहीं। वह चुपचाप उठी और बोली -भाई जान ! मैं अब अपने घर जा रही हूं, अपना ख़्याल रखना।
एक-दो दिन ठहरकर जातीं, सलमा ने उससे कहा।
किंतु रुकैया नहीं रुकी ,मन ही मन सोच रही थी ,अबकि बार तो बड़ा पूछ रही है ,ज़बान में बड़ा शहद घुला है।
अगले बरस तो उसका बेटा अहमद ही आने वाला है। युसूफ मियां और सलमा के मन में परेशानी थी रुकैया ने पता नहीं, क्या समझा होगा ?क्या अर्थ लगाया होगा ?
इस घर से निकलकर, तब रुकैया अपने दूसरे भाई वाहिद के पास गई और उससे पूछा - क्या घर में कुछ हुआ है ?
क्यों, तुम ऐसा क्यों पूछ रही हो ? वाहिद ने पूछा।
मैंने सुना है, लोग कह रहे हैं - कि ' ज़ीनत' एक रात के लिए कहीं चली गई थी, या कोई उठा कर ले गया था ।
ख़ालिद के तो तन- बदन में पहले से ही आग लगी थी कि फूफी के बेटे अहमद के कारण ही तो, मेरा रिश्ता ज़ीनत से नहीं हो पाया। इससे पहले कि वाहिद कुछ कहते ,ख़ालिद बोल उठा - उन्होंने ,ज़ीनत को बहुत सर चढ़ा रखा है।वो घर -परिवार में रहने लायक लड़की नहीं है, वो ! मैंने तो कई बार उसे, सड़कों में, मेले में घूमते देखा है।
चली गयी होगी ,किसी के साथ.... ख़ालिद की बातें सुनकर, रुकैया को लगा , शायद ज़ीनत का चाल -चलन अब ठीक नहीं रहा है। जवान होती लड़की का' पैर फिसल रहा है।'
रुकैया चुपचाप अपने घर चली गई , छह महीने बाद ही , छुट्टियों में' अहमद' आया था। ये ख़बर ज़ीनत के घरवालों को भी पता चली।
जब ज़ीनत के अम्मी -अब्बू को पता चला, तो बड़े खुश हुए और अब सलमा और यूसुफ मियां चाहते थे। लड़का -लड़की दोनों एक दूसरे को देख लें , पसंद कर लें और जब लड़के की पढ़ाई पूरी हो जाएगी, तो दोनों का' निकाह'भी कर देंगे। यही अच्छा मौका है ,दोनों को मिलवा देते हैं। यही बात सोचकर उन्होंने रुकैया के घर पैग़ाम भिजवाया।
किन्तु कई दिनों तक रुकैया के यहाँ से कोई जबाब नहीं आया और जब उससे कहा गया कि उसने हमारे पैग़ाम का जबाब क्यों नहीं दिया ?
वह उनकी बातों को नजरअंदाज करने लगी और बोली -मैंने तो यही सोचा था ,दोनों ही अपने बच्चे हैं ,ज़ीनत ,अपने घर आ जाएगी ,मेरा घर तो 'गुलज़ार ' हो जायेगा किन्तु जबसे अहमद के अब्बू को पता चला है। वो तो मुझसे भी नाराज़ रहने लगे हैं। कह रहे थे - तुम्हें रिश्ता करने की इतनी जल्दी क्या थी ? अभी अहमद की डॉक्टरी पूरी होने में भी समय है और अब उसकी नौकरी में भी समय लग जायेगा। जब तक वो कमाने न लगेगा ,निकाह को तो भूल जाओ !
यह आप क्या कह रहीं हैं ?बरसों से हम इसी इंतज़ार में थे ,ज़ीनत तो अहमद को अपना सब कुछ माने बैठी है,ऐसी बातें न कहो !बेचारी ,बच्ची !का दिल टूट जायेगा।
मैंने भी, क्या बुरा सोचा था ? घर में मेरी तो चलती नहीं है ,इसके अब्बू की चलती है ,उनसे ऊपर तो नहीं हो सकती ,ये औलाद मेरी ही नहीं ,उनकी भी तो है।
सलमा और यूसुफ़ मियां समझ रहे थे कि ये रिश्ता तोड़ने की बातें कर रही है किन्तु'' दिल पर पत्थर रखकर उन्होंने पूछा - क्या हम तुम्हारे ख़ाविंद से बात करें ?
देख लो !मुझे तो नहीं लगता वो मान जायेंगे ,कोशिश करके देख लो ! परसों को हम तुम्हारे घर आ रहे हैं,सलमा ने कहा।
वैसे तो सलमा को रुकैया कतई पसंद नहीं थी किन्तु उसके बेटे के कारण उसे पसंद करने लगी थी ,फोन पर अपने आने का वक़्त देकर ,सलमा अपने शौहर से कहती है -देखा !कितनी चालाक बन रही है ,कहती है ,घर में मेरी नहीं चलती। अब बेटा क़ाबिल होने जा रहा है ,तो अब नख़रे दिखला रही है।
शौकत अली, तो ऐसे नहीं हैं ,वो तो हमारी बात का भी मान रखते हैं ,ये सब चालें रुकैया ही खेल रही होगी दहेज़ का लालच आ गया होगा।
मुझे तो लगता है ,ये उसी ख़बर की वज़ह से पीछे हट रही है ,परेशानी उनके चेहरे से साफ झलक रही थी।
अब उनसे मिलकर ही पता चलेगा ,आख़िर उनके मन में क्या चल रहा है ?
फोन कट जाने पर रुकैया अपने शौहर से कहती है -परसों सलमा और भाईजान आ रहे हैं।
ये तो अच्छी बात है ,मिलने आ रहे हैं, या किसी और कारण से आ रहे हैं ,ख़ुश होते हुए शौकत अली ने पूछा।
अपने अहमद को देखने और रिश्ते की बात करने आएंगे और तुम ज्यादा खुश मत होना ,वो सलमा आपको अपनी मीठी बातों में बहला -फुसला लेगी इसीलिए आपको पहले ही समझा रही हूँ। इस रिश्ते से मना कर देना।
क्यों ?तुम्हीं तो रिश्ता लेकर गयीं थीं और अब मना कर रही हो ,ऐसा क्या हो गया ?
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