तुम्हारी रेशमी डोर सी यादें, अकेले में, अक़्सर मुझे घेर लेती हैं।
जब तुम मेरी, यादों के घेरे में समाते हो ,आते हो ,आते ही जाते हो।
बुने थे ,कभी ख़्वाब हमने संग -संग ,अब जाने क्यों दूर हो गए इतने ,
अब क्यों ?मेरी यादों के झरोखे से झांक ,मुझको इतना सताते हो।
तन्हाइयों की गहराई में डूब ,
कुछ पुरानी परछाइयां, मुझमें सिमट जाती हैं।
लिपट जाती हैं,जब तुम मेरी यादों में आते हो।
कुसुम सी नाजुक़ मैं ,मुरझा जाती हूँ।
तेरी यादों में,फूल की पंखुड़ी सी बिख़र जाती हूँ।
जब तेरी यादों के कुछ पल ,मेरे दिल को दुखाते हैं।
अभी भी तेरी प्रीत की डोर संग खींचती चली आती हूं।
देखती हूं ,उस द्वार को,जिस द्वार से तुम मुस्कुराते हो।
जब तुम मेरी खामोशियों पर, हावी होते हो।
आ जाती हैं , कुछ सुनहरी यादों की तस्वीरें,
टूटने लगती हूँ ,जब वो महल बिखरने लगते हैं।
तुझे यादों में याद कर ,अक़्सर मैं रोती हूँ।
कभी ,चले आते हो हौले से ,मेरे कानों में गुनगुनाते हो।
जब मैं तेरी यादों में खोती हूँ , अपने आपको भूल जाती हूँ।
कभी हंसती ,कभी रोती मैं तेरी यादों को संजोती हूँ।
तेरी यादों की डोर से बंधी आज भी ,मैं तेरी यादों को जीती हूँ।
