Zeenat [part 37]

जब ख़ालिद ,ज़ीनत से मिलने गया। तब अचानक ही न जाने ज़ीनत को क्या हुआ ? वो बेहोश हो गयी, अचानक ज़ीनत की ऐसी हालत देखकर ,रेशमा की चीख़ निकल गयी। वो झट से उसके क़रीब आकर ,उसे पुकारती है -ज़ीनत !ज़ीनत ! तुझे क्या हुआ ?

उनकी आवाज सुनकर ,ख़ालिद पेड़ के पीछे से बाहर आता है ,तब रेशमा उससे कहती है - ख़ालिद अब तुम जाओ ! मैं इसके घरवालों को बुलाती हूँ। 

  नहीं, मैं इसे इस तरह यहां छोड़कर नहीं जा सकता,कहते हुए ज़ीनत को गोद में उठाता है और घर के अंदर की तरफ ले जाता है।


 बाहर शोर सुनकर सलमा भी बाहर आती है और ख़ालिद को इस तरह ,ज़ीनत को लाते हुए देख घबरा जाती है और पूछती है -इसे क्या हुआ ?

पता नहीं ,अचानक बेहोश हो गयी , कहते हुए वो उसे लिटाने के लिए जगह खोजता है। 

तब सलमा उसे एक कमरे की तरफ इशारा करके कहती है - वहां लिटा दो ! शायद ,गर्मी या घबराहट से बेहोश हो गयी आज तो इसने ठीक से खाना भी नहीं खाया था। 

कोई बात नहीं आप डॉक्टर को बुलाइये !तभी न जाने सलमा को क्या अंदेशा हुआ ?और बोली -  ख़ालिद !अब तुम जाओ ! इसे हम संभाल लेंगे। इसके अब्बू अभी हक़ीम साहब को लेकर आते ही होंगे। रेशमा और ख़ालिद वहीं रुकना चाहते थे किन्तु सलमा के बार -बार कहने पर वहां से निकल गए। उनके जाते ही ,सलमा ने ज़ीनत के मुँह पर पानी से झींटे मारे ,और बोली -ज़ीनत ,उठ ! मुझे बता तुझे क्या हुआ है ? कहते हुए उसके गाल थपथपाये ,कुछ ही देर में ज़ीनत उठ बैठी। 

अब तुझे क्या हुआ ? तू इस तरह बेहोश क्यों हो गयी ? सलमा को ज़ीनत पर क्रोध आ रहा था। 

कुछ नहीं अम्मी !मुझे चक्कर सा आया और बेहोश हो गयी ,घबराते हुए ज़ीनत पूछा -मैं यहाँ कैसे आई ? 

रेशमा और ख़ालिद तुझे छोड़कर गए ,किन्तु उन्हें इस बात में कोई दिलचस्पी नहीं थी ,तब बोलीं -क्या तुझे अबकी बार महिना आया था ,सलमा की बात सुनकर ज़ीनत चुप हो गयी। 

बोलती क्यों नहीं ? कहीं उस रात की कालिख़ तेरे पेट में तो नहीं पल रही ,उसे झिड़कते हुए सलमा ने पूछा।

ज़ीनत देख रही थी ,और सोच रही थी -ये वही माता -पिता हैं ,जो अपनी बेटी से कितना प्यार करते थे ? उसके एक ही बार कहने  पर , उसके लिए वही चीज़ मुहैया हो जाती थी और आज तो लगता है ,इन्हें मेरी  दुःख और तकलीफ़  से कोई मतलब नहीं है। अब तो शायद इन्हें  मेरी शक़्ल भी अच्छी नहीं लगती होगी। एक हादसे ने ही मेरे जीवन में कितना बड़ा बदलाव ला दिया। 

 अम्मी !आप गलत समझ रही हैं ,कहते हुए वो अपने कमरे की तरफ बढ़ चली किन्तु अभी भी उसका शरीर काँप रहा था। 

बात ये नहीं है , मानसिक रूप से वह बहुत परेशान थी, उसके ख्वाबों ,खयालों में तो अहमद ही छाया हुआ था, जिसे उसने कभी देखा ही नहीं। उसके ज़हन में एक साया  सा था  ,उसने उस साये को अपने विचारों से एक अक्श दे दिया था,जो अहमद का रूप था , वो उस साये को अहमद समझ वो उसी से मुहब्बत कर बैठी थी। अहमद को देखा तो नहीं फूफी के बताने पर अपने जहन में एक तस्वीर बनाई थी ,जो उसके दिल के कोने समाई थी।

  रिश्ता  टूटने पर अब उसे लगा -अम्मी -अब्बू जो कह रहे हैं, या कर रहे हैं। वही  सही होगा किन्तु आज ख़ालिद को देखकर उसके दिल में जो तस्वीर थी ,उसे लगा जैसे वो उसे खो देगी और  वो इत्र की ख़ुश्बू जो उसकी स्वांसों में भर गयी थी ,जब ख़ालिद उसके सामने ,उसके क़रीब आया था।

 अचानक उसके, नथुनों में एक खुशबू भर गई , उस खुशबू को लेकर वह परेशान हो गई और सोचने लगी -ऐसी खुशबू मैंने  कहां देखी है, कहां महसूस की है ? उसे याद नहीं आ रहा था। सोचते -सोचते काफी समय हो गया। कुछ समझ नहीं आ रहा था। 

ज़ीनत ,क्या सोच रही है ?अँधेरा होता जा रहा है ,कमरे में रौशनी कर ले। उसे तो ध्यान ही नहीं रहा  कि बाहर अँधेरा होने लगा  है। उसने बल्ब जलाना चाहा किन्तु लाइट गयी हुई थी। उसने माचिस उठाई और मोमबत्ती जलाने लगी किन्तु मोमबत्ती जलाते समय उसके हाथ पर मोम टपक गया ,उसने जल्दी से अपना हाथ खींचा और उस जले स्थान को फूंक मारकर अपने को शांत करने लगी। तभी उसे याद आया ,ख़ालिद  उसका हाथ पकड़ना चाहता था , किंतु वो उससे अपना हाथ छुड़ा लेती है ? वही सूखे और सख़्त हाथ !

उस अँधेरे  कमरे में वो अचानक से चिल्लाने लगी - ये वो ही है ,ये वो ही है ,जिसने मेरी ज़िंदगी बर्बाद की। 

सलमा पहले से ही परेशानी में घूम रही थी,अंदर आते हुए बोली -इस लड़की ने न, हमारा जीना मुहाल कर रक्खा है ,अब क्या हो गया ?

अम्मी ! ये वो ही है ,जो उस दिन मुझे उठाकर ले गया था।

 कौन ?कहते हुए वो खिड़की की तरफ दौड़ी ,उसे लगा शायद कोई बाहर जा  रहा है ,उसे जाते हुए देखकर ज़ीनत चिल्लाई है। कहाँ है ? इस अंधेरे में तो अब कोई दिखेगा भी नहीं। 

नहीं ,अम्मी बाहर कोई नहीं है ,परेशान होते हुए ज़ीनत बोली। 

तब तू किसकी बात कर रही है ? वो नामर्द कौन है ? मुझे उसका नाम बता दे !क्या तुझे कुछ याद आया। 

हाँ अम्मी ! उसने जो इत्र लगाया था ,ये उसी इत्र की खुशबू थी ,वैसे ही भारी ,मोटे ,खुरदुरे हाथ जैसे ख़ालिद के थे। 

ये तू क्या कह रही है ? अचंभे से  सलमा ने माथा पकड़ लिया ,और माथा पीटते हुए बोली -क्या तुझे पूरा यकीन है ?वो ख़ालिद ही था। आज जब उसने मेरा हाथ पकड़ना चाहा ,तब मुझे वही एहसास हुआ , वो  यहां भी मुझे पकड़ना चाहता था , कांपते हुए ज़ीनत ने बताया किन्तु मैंने अपने हाथ खींच लिए ,उस इत्र की खुशबू और वो अँधेरे में उसके हाथों की छुअन अम्मी ! मैं कभी भूल नहीं सकती। 

हाय ,अल्लाह !ये क्या हो रहा है ? इसकी ज़िंदगी को न जाने किसकी नजर लग गयी ?अभी मन को थोड़ा सुकून हुआ था। अब ये नई बात.... 

अम्मी ! मैं बात नहीं बना रही हूँ ,ये वो ही है। तब सलमा हिसाब लगाने लगी ,ख़ालिद ने रिश्ते के लिए कब अपने अब्बू को भेजा था ? और कब ज़ीनत को कोई,  उठाकर ले गया था ? हाय अल्लाह !ये तो उसके बाद दो दिनों की ही बात है। क्या उसने हमसे बदला लिया ?क्या ये सब कारस्तानी उसी की है ,ताकि  तेरा रिश्ता टूट जाये। यक़ीन तो नहीं हो रहा किन्तु करना पड़ रहा है। 

जब तक ठीक तरह से निक़ाह नहीं हो जाता ,यूसुफ साहब परेशान थे ,कैसे तैयारियां करनी हैं ? वो अपने  काम पर थे ,तब वाहिद के घर से पैगाम आ गया था कि खालिद को नए फैशन की मोटरसाइकिल चाहिए। जोया की तरफ से भी कुछ फरमाइशें थीं, हालांकि ज़ोया और सलमा की पटती नहीं थी किंतु अब इस रिश्ते के कारण दोनों, अंदर ही अंदर एक दूसरे की काट कर रही थीं  और एक दूसरे की मजबूरी का फायदा भी उठा रहीं थीं । 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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