Hum kab ameer the ?

मोहित को, अब अपना घर अच्छा नहीं लगता था, दरअसल हुआ यह था, कि जब मोहित अपने मामा के यहां कुछ दिनों के लिए रहने के लिए गया था, तो उनका रहन-सहन, वहां का वातावरण  उसे बहुत ही पसंद आया था। गांव से आकर उसे  शहरी वातावरण  बहुत पसंद आया। अपने घर आकर उसे अपने रहन -सहन पर  हीनभावना महसूस होने लगी।

 हम गांव में सबकुछ होते हुए भी गरीबों की तरह से रहते हैं किंतु यह बात उसने अपने मन तक ही सीमित रखी उसने अपने विचार किसी को नहीं बताएं। जबकि उसके पिता का सोचना था -'सादा जीवन ,उच्च विचार ''इसीलिए उसने अपने मन की सोच किसी से नहीं कही।  वह कोशिश करने लगा, कि मैं भी एक दिन इसी तरह बड़ा आदमी बनूंगा और शहर में रहूंगा।  उसने पढ़ाई की, अच्छी डिग्री हासिल करने के लिए उसके पिता ने उसे शहर में भी भेज दिया। शहर में वह अभी हॉस्टल में रहता था। खेती-बाड़ी से ही उसके पिता उसका सारा खर्चा और अपने परिवार का भरण -पोषण करते थे। शिक्षा प्राप्त होने के पश्चात धीरे-धीरे मोहित की नौकरी शहर में ही एक कंपनी में लग गई। 


मोहित इस बात से अत्यंत खुश था कि अब मैं भी उस गांव से निकलकर शहरी हो गया हूं और यहीं पर अपना घर बनाऊंगा,उसके सपने ऊँचे थे , किंतु जब उसकी नौकरी लगी तो उसका मासिक वेतन बारह हज़ार था। उसे अभी कोई अनुभव भी नहीं था ,इससे कोई ज्यादा नहीं दे रहा था।

 शहर की महंगाई और उसके ख़र्चे अब उसे एहसास  दिला रहे थी, कि किस तरह से पैसा कमाया जाता है ? और उन्नति के लिए इंसान को क्या-क्या करना पड़ता है ? वो ऊंचे सपने देख रहा था लेकिन उनको पूरा करने के लिए ,अभी उसे धैर्य और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता है। वह समझ नहीं पा रहा था ,शीघ्र से शीघ्र वो अपने सपनों को कैसे पूर्ण करे ?

 तब उसने अपने पिता से कहा -''इस गांव में रखा ही क्या है ?मुझे मेरी जमीन का हिस्सा दे दीजिए ताकि मैं शहर में रहकर अपने लिए एक मकान बनवा सकूं।''सुकून से अपना जीवन बसर कर सकूँ।  

यह बात सुनकर उनको बहुत दुःख पहुंचा ,उनका बेटा अपने सपनों के पीछे इस कदर दौड़ रहा है ,वो अपने पुरखों की जमीन पर नजर गड़ाए है ,न ही उसे माता -पिता की फ़िक्र है।

 तब उसके पिता ने कहा -मैंने तुम्हें पढ़ा- लिखा कर अपने'' पैरों पर खड़ा कर'' दिया है। अब तुम अपने दम पर उस शहर में रहकर दिखाओ !एक तरह से देखा जाए तो उन्होंने मोहित को चुनौती दी थी । 

मोहित एक कमरे में रहकर पैसों की बचत कर रहा था ताकि वह अपने पिता को दिखा सके कि वह भी अपने दम पर कुछ  कर सकता है। उस वेतन में उसके कमरे का किराया, उसका खान -पान ही हो पाता था जबकि कुछ सामान तो उसकी मां उसे बांधकर दे देती थी और कभी-कभी तो चुपचाप पैसे भी दे देती थी।

 किंतु शहर में एक मकान लेना, उसके लिए बड़ा ही कठिन महसूस हो रहा था।  समय व्यतीत हुआ और उसकी एक और अच्छी कंपनी में नौकरी लगी।
 तब वह अपनी उन्नति को देख सोचने लगा अब वह दिन दूर नहीं, जब मैं एक अच्छी जगह पर आलीशान मकान लूंगा। 

अब उसके पिता चाहते थे कि उसका घर बस जाये किन्तु उसने अपने सपनों के आगे ,विवाह से भी इंकार कर दिया किन्तु जब पिता ने उसे समझाया ,इस जीवन से अकेले कब तक लड़ते रहोगे ? पत्नी होगी, तो सुख -दुःख में साथ होगी और कामकाज़ी लड़की तो कमाकर भी लाएगी दो के कमाने से आमदनी बढ़ेगी। इसी उम्मीद के सहारे वह विवाह के लिए तैयार हो जाता है। 

 तब  उसके माता-पिता  अपना कर्तव्य समझते हुए एक संस्कारी लड़की से उसका विवाह भी करा देते हैं । खर्च बढ़ रहे थे तब उसने उस लड़की से भी कहा -तुम्हें भी कमाना चाहिए ,लड़की पढ़ी -लिखी थी, वह भी नौकरी करने लगी। दोनों पति-पत्नी दिन में परिश्रम करते रात्रि में थककर आकर सो जाते और अपने घर  का सपना देखते।

 कुछ दिनों के पश्चात मोहित के दोस्त ने, उसे बताया -कि वह ऋण  लेकर एक घर ले सकता है और उसकी क़िस्त धीरे -धीरे चुकाते रहना। 

यह बात मोहित को भी उचित लगी , कब तक वह सपने देखता रहेगा ? पूरा करने का समय कब आएगा ? उम्र तो दिन पर दिन ढलती जा रही है 35 वर्ष का हो गया था अब उसने बड़ा जोखिम उठाने का निर्णय लिया और उसने ऋण  पर घर ,गाड़ी  सब कुछ ले लिया।

 दिन रात दोनों पति-पत्नी कमाते थे इस बीच उनके दो बच्चे भी हो गए, उनकी पढ़ाई का भार भी उन पर  था। माता-पिता को भी अच्छा लगा बेटा उन्नति कर रहा है अपने पैरों पर खड़ा हो रहा है। एक दिन उसके पिता उससे मिलने आए और उससे पूछा - बेटे ! कैसे हो ?

प्रसन्न होते हुए मोहित बोला -पापा ! देख लीजिए !उस गरीबों जैसी  जिंदगी से मैं अब कहां से कहां तक आ पहुंचा हूं ?मैंने  कितनी उन्नति की है ?मेरा रहन-सहन देखिये ! वहां गांव में हम गरीबों की तरह पड़े  रहते थे। आज मैं यहां रहकर अपने सपने पूरे करके बहुत खुश हूं। 

मोहित के पिता को उसके सपने खोखले नजर आए और वह बोले -यह तो अच्छी बात है कि हमारा बेटा, उन्नति कर रहा है ,हमारे लिए गर्व की बात है। किंतु'' गांव में हम जीवन जीते थे ,वहां हमारा परिवार, रिश्तेदार सभी होते थे। सुख -दुःख में हम सभी साथ होते थे। कोई भी रिश्तेदार आ जाये ,कभी बोझ नहीं लगता था ,कभी उसे एहसास नहीं  दिलाया कि उसने हमारे घर आकर गलती कर दी है।'' 

मैं देख रहा हूं ,बहू के चेहरे पर भी रौनक नहीं है। मेरे आने से वो परेशानी महसूस कर रही है ,तुम भी थोड़े कमजोर हो गए हो। 

 नहीं, पापा !आपको ही ऐसा लगता है, हमारा रात -दिन काम में ही चला जाता है शनिवार -इतवार की छुट्टी में ही हमें थोड़ा समय मिलता है। उसमें घर के कार्य निपटा लेते हैं। 

मेरे विचार से तो तुम 'रोबोट' हो गए हो, तुम्हारी अपनी कोई जिंदगी ही नहीं रह गई है। बच्चों को तुम समय नहीं दे पाते हो ,तुम्हारे बच्चे क्या कर रहे हैं ? तुम्हें कुछ पता नहीं है। तुम्हारी पत्नी थकी -थकी  सी रहती है। क्या इसे तुम जिंदगी कहते हो ?

यह सब तो पापा करना ही पड़ेगा, जब तक इस घर का लोन उतर नहीं जाता, गाड़ी की क़िस्तें भी अभी बाक़ी हैं , बच्चों की पढ़ाई भी है। 

मैं तुमसे एक बात कहना चाहता हूं ,ये सब पाकर तूने अपना सुख -चैन सब कुछ खो दिया है। तेरे पास अपने लिए भी समय नहीं है। तू अपने को अमीर किस बात से कहता है ?और तब हम गरीब कैसे थे ? 

वह घर जिसमें हम रहते थे, वह हमारा अपना था, और वो भी इतना बड़ा दस -पंद्रह आदमी एक साथ रह सकते थे।  हम उसकी क़िस्तें नहीं चुकाते  थे। हमारे जानवर ,हमारी खेती-बाड़ी सब हमारी अपनी थी। हम मेहनत करते थे ,अपने लिए मेहनत करते थे। अपने खेतों में मेहनत करते हैं ।

 जब इच्छा होती तब काम करते  वरना कोई मजबूरी नहीं है । तुझे अच्छे से पढ़ाया- लिखाया किसी चीज की कमी तो नहीं छोड़ी ,आज तू जिस  जगह पर है।  उसी  गरीब गांव से पढ़कर निकला है। मैं मानता हूं, तेरे कुछ सपने थे, किंतु तूने उन सपनों की चाहत में अपना सुख -चैन सब गंवा दिया है। इन किस्तों को चुकाते -चुकाते  तुझे बुढ़ापा आ जाएगा, तू कभी अपने लिए नहीं जी पाएगा। सारी उम्र तो तू यूं ही निकाल देगा,  ''जिएगा कब ?''

 तेरी किस्तों की जिंदगी को तू अमीर होना कहता है। कभी ध्यान से बैठकर सोचना,'' हम कब अमीर थे ?'' पहले जहां हमारी अपनी जिंदगी थी, हम किसी के लिए काम नहीं करते थे ,हम अपने लिए काम करते थे।  हमारा घर अपना था, सादगी से जीने को तू गरीबी कहता है। यहां रहकर  तुझे एक पल को भी चैन नहीं है और अपने को अमीर कहता है। किस्तों पर जिंदगी जी रहा है।

 कभी अपने पिता की जरूरत पड़े तो आ जाना , इस गरीब के घर ,कह कर पिता अपने गांव चले गए। मोहित सोच रहा था - सच ही तो कहा है, इस किस्तों की जिंदगी को मैं, अपनी अमीरी समझ बैठा हूं अमीर तो हम तभी थे जहां चैन था, सुकून था, मां का स्पर्श था ,घर का खाना था सोचते हुए  किस्तों के उस सोफे पर सिर टिक कर बैठ गया। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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