शाम को जब यूसुफ़ साहब अपने घर आये ,तो मन ही मन प्रसन्न भी थे और काम बढ़ जाने से थोड़े परेशान भी थे। जैसे ही घर के अंदर प्रवेश करते हैं ,घर बहुत ख़ामोश था। एक अज़ीब सी ख़ामोशी छाई थी। घर में रौशनी थी, किन्तु ऐसा लग रहा था ,यहाँ इंसान न रहते हों। इतना सूनापन देख वो घबरा गए और बोले - सलमा ! कहाँ हो ? अरे ! सब लोग कहां चले गए ?तभी उनका छोटा बेटा याकूब बाहर निकलकर आया और बोला -अम्मी और ज़ीनत ऊपरवाले कमरे में हैं।
क्या कुछ हुआ है ? उन्हें कुछ गलत होने का अंदेशा हुआ।
पता नहीं ,दो घंटे से ज़ीनत के साथ हैं ,कहकर उसने, अपनी अम्मी को आवाज लगाई -अम्मी ! अब्बू आ गए।
कुछ देर के बाद' जीने' [सीढ़ियों ]से उतरते हुए सलमा दिखलाई दी, मुस्कुराने की कोशिश करते हुए बोली - अरे !आप कब आये ?आपके लिए खाना लगवाती हूँ।
खाना खाते हुए उन्होंने पूछा -क्या कुछ हुआ है ?आज तुम ऊपर कैसे थीं ? जबाब के इंतजार के बग़ैर खुश होते हुए वो आगे बोले -आज मैंने एक मोटरसाइकिल बुक कर दी है । लाल रंग की मोटरसाइकिल बुक की है ,हमारी ज़ीनत को यही रंग पसंद है।
इससे पता चलता है ,भले ही ज़ीनत के अम्मी -अब्बू उससे कठोर बनकर पेश आ रहे हों परन्तु आज भी उन्हें अपनी बेटी की पसंद -नापसंद का ख़्याल है। जब ख़ालिद के पीछे उस मोटरसाइकिल पर बैठकर घूमने जाएगी ,तो हमारी बच्ची कितनी अच्छी लगेगी ? उस रंग की मोटरसाइकिल बुक कराते वक़्त शायद यही कुछ ख़्याल उनके मन में आये होंगे।
उनके सवाल को सुनकर सलमा का चेहरा कठोर हो गया और बोली - न जाने, हमारी ज़ीनत की ज़िन्दगी में क्या लिखा है ?
अब जो भी होगा अच्छा ही होगा ,तुम ऐसा क्यों कह रही हो ?उन्होंने सोचा ,अब ये कोई नई कहानी लेकर न बैठ जाये तब बोले -तुम पान लगवाओ ! खाना खाने के बाद जब वो अपने कमरे में आये तब उन्होंने तसल्ली से पूछा -क्या तुम किसी बात को लेकर परेशान हो ?
हाँ ,आज ज़ीनत से ख़ालिद मिलने के लिए आया था, दोनों पीछे के बग़ीचे में थे।
क्या तुमने उसे अकेले ही , उससे मिलने भेज दिया ?वो घूरते हुए बोले।
नहीं ,उनके साथ रेशमा भी थी ,किन्तु बात कुछ अलग है , जब वो वहां मिले ,हमारी ज़ीनत अचानक बेहोश हो गयी।
कैसे ?
मैं तो घबरा ही गयी थी,' कि कहीं उस रात के साये का अंश उसकी कोख़ में न पल रहा हो।' तड़ाक !की आवाज़ के संग ,अचानक ही सलमा के नरम गालों पर तमाचा पड़ा।
ऐसी बात बोलने की भी तुम्हारी हिम्मत कैसे हुई ? क्या तुम नहीं जानती हो ? हम किस तरह से इस मुसीबत से बाहर आ रहे थे ? अब ये क्या नई मुसीबत आन पड़ी ? क्या हम कभी परेशानियों से बाहर आएंगे भी या नहीं।
अपने गालों को सहलाते हुए , सलमा बोली - इसमें मेरी क्या गलती है ?
क्या तुमने, उसे वो दवाइयां खिलाई थीं या नहीं ? गुस्से से यूसुफ साहब ,सलमा को घूरते हुए बोले।
अपको कोई गलतफ़हमी हुई है ,सलमा बोली -पहले आप मेरी पूरी बात तो सुन लीजिये ! आप नाहक़ ही नाराज हो रहे हैं ,कहते हुए ,उसके गालों का दर्द आँखों के रस्ते बाहर आ गया।
नाराज न होऊं तो क्या करूं ? एक मुसीबत खत्म होती नहीं, दूसरी आ जाती है ,तुम जानती नहीं हो बेग़म !हमें, हमेशा एक ड़र बना रहता है। निक़ाह से पहले ये बात कहीं फैल न जाये ,निक़ाह से पहले क्या निक़ाह के बाद भी किसी को पता नहीं चलना चाहिए वरना इसकी ज़िंदगी बर्बाद होने से कोई नहीं बचा सकता।सलमा की आँख के आंसू देखकर , अब वो थोड़ा नरम लहज़े में बोले।
अपने माथे में हाथ मारते हुए सलमा बोली - इसकी ज़िंदगी तो बर्बाद हो ही चुकी है ,आज कह रही थी - उसकी ज़िंदगी बर्बाद करने वाला और कोई नहीं ,ख़ालिद ही है।
क्या ?? कहकर वो जैसे अपने पलंग से उछल पड़े ,जब हमने उससे पूछा था ,तो उसे तो कुछ भी याद नहीं था। अब अचानक सब कैसे याद आ गया ? कहीं ऐसा तो नहीं ,वो ख़ालिद से निक़ाह न करना चाहती हो।
ऐसा नहीं है ,उस बेचारी बच्ची ने तो अपनी सब ख़्वाहिशें दफ़्न कर दी हैं ,उस मनहूस रात ने ,उसका जीना मुहाल कर दिया है। हम भी, अपनी बच्ची से अब ठीक तरीक़े से कहाँ बात करते हैं ? मामला अब थोड़ा शांत हुआ।
उसने अब कैसे बताया ,कि उसका गुनहगार वही है ,उन्हें उस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था।
उसके इत्र की खुशबू और यहाँ भी उसे ,उस नामाकूल खालिद ने छूने की कोशिश की। तब उसके हाथों से उसे पता चला ,उस अँधेरे कमरे में ,उसके यही सबूत थे। उस कमज़र्फ की हिम्मत तो देखिये ! यहाँ भी उसने हमारी बच्ची को छूने की कोशिश की। मुझे तो लगता है , जब उसके रिश्ते के लिए हमने मना कर दिया ,तभी उसने यह क़दम उठाया ताकि ज़ीनत का रिश्ता टूट जाये और हम, उससे अपनी बच्ची की शादी करने के लिए मजबूर हो जाएँ।
अब शादी हो तो रही है ,मजबूरी में ही सही.... उसके मन की मुराद पूरी हो रही है।
क्या आप यह पता न लगाएंगे ,इस बात में कितनी सच्चाई है ? उस नामुराद ने ,हमारी बच्ची का रिश्ता तुड़वा दिया और हमें, उससे ज़ीनत का निक़ाह करने के लिए मज़बूर कर दिया। अब दहेज़ के बहाने अपनी ख़्वाहिशें पूरी कर रहा है ,उसने हमारी बच्ची की ज़िंदगी बर्बाद कर दी। सलमा की ज़बान,ख़ालिद के ख़िलाफ '' अंगारे उगलने लगी'' हो सकता है ,निक़ाह के बाद उसे सुकून से रहने ही न दे ! जैसी माँ, ऐसी औलाद !वो ज़ोया भी क्या कम है ? वो हमारी बच्ची को परेशान करने में कोई कसर नहीं छोड़ेगी।
यूसुफ़ मियां उसकी बातें सुनकर सोच में पड़ गए ,कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या सही है ?क्या ग़लत है ?अब ऐसे में हम ये रिश्ता कैसे तोड़ दें ? यदि रिश्ता तोड़ भी दिया, तो लोगों को क्या बताएंगे ? उसी ने हमारी बच्ची को अग़वा किया और उसको रातभर अपने साथ रखा। तब तो ज़ीनत का रिश्ता किसी से भी नहीं हो पायेगा। सच्चाई पता लगने के बाद तो कोई इससे शादी नहीं करेगा।
क्या सोच रहे हैं ?
कुछ नहीं, बेग़म ! हम तो बड़ी मुसीबत में पड़ गए। बेटी पर यक़ीन करते हैं ,तब कैसे पता लगाएं ?वही उसका गुनहगार है।
गुनहगार भी हुआ तो क्या रिश्ता तोडना, हमारी बेटी की ज़िंदगी के लिए सही होगा ? यदि रिश्ता तोड़ भी दिया ,तब कौन उसका हाथ थामेगा।
मैंने भी बहुत सोचा ,तब मुझे लगा इस सच्चाई का पता लगाना ही होगा ,इस निक़ाह के पीछे उसका क्या मक़सद है ?पता लगाना होगा। हो सकता है निक़ाह के बाद वो हमारी बेटी का जीवन जहन्नुम बना दे !तब हम क्या करेंगे ? इसकी पहले ही छानबीन कर लेनी चाहिए।
सलमा की बात ,सुनकर यूसुफ़ साहब को भी लगा ,कहीं ऐसा न हो दहेज़ के लिए शादी के लिए मान गया हो। इस बात का तो पता लगाना ही होगा ,हमारी बच्ची का गुनहगार कौन है ?
