रोते हुए ,गर्वित अपनी मम्मी का पत्र पढ़ता है और कहता है - मम्मी ! ने ये सब आपने क्यों किया ?और अब उन्होंने अपनी इच्छा भी रख दी है, ऐसा कैसे संभव है ? कुछ दिनों के लिए बच्चों का ध्यान भी भटक गया था। मेहमान जो आ जा रहे थे। पूजा -पाठ, हवन इत्यादि हो रहे थे।
सभी कार्यक्रम पूर्ण हो जाने के पश्चात ,तब ज्वाला सिंह जी बोले -अब इस हवेली में बड़ा मैं ही बचा हूं। तुम्हारी मां और मेरे भाई भी नहीं रहे। मेरी आज्ञा है ,'जो हो चुका, सो हो चुका 'तुम्हारी मां की भी यही 'आख़िरी इच्छा' थी। अब तुम बहु को वापस घर ले आओ ! ताकि वह अपने बच्चों की ठीक से देखरेख कर सके। आकर इस हवेली को संभाल ले !
कई बार जीवन में, हम ऐसे कार्य कर जाते हैं, उस समय तो हमें यही लगता है, कि हम सही हैं किंतु वह बात ''कमान के तीर'' की तरह निकल जाती है और वापस नहीं आती। बाद में एहसास होता है ,हम कहाँ गलत थे ? जो गलतियां हो चुकीं ,उन्हें लौटाया तो नहीं जा सकता। कुछ रस्मों के कारण भी ऐसा कार्य हमसे हो गया , कुछ पैसे की शानो - शौकत और कुछ जवानी का जोश था, जिसके कारण हमारे परिवार का शिखा के साथ ऐसा व्यवहार रहा।
उसने हमें सच्चाई बताई है ,वह झूठ के सहारे भी रह सकती थी। उसकी सच्चाई को स्वीकारते हुए ,अब हमें उसे वापस हवेली में लाना होगा। तुम अपने बच्चों को साथ ले जाकर उसे, इस हवेली में अब वापस ले आओ ! और उसे घर की बड़ी बहू का दर्जा संभालने दो ! यही हमारा पश्चाताप भी होगा।
गर्वित, अब तक मन ही मन सोच रहा था कि अपने बच्चों के लिए रूही को वापस लेकर आएगा किन्तु अब माँ की मौत का कारण भी उसे, रूही लगी। तब उसे, रूही पर क्रोध आता है । इसके कारण मेरा घर एक -एक कर बिखर गया। अब वो यहां आकर क्या करेगी ?उसे इस हवेली में लाना होता तो मम्मी भी ला सकती थीं किन्तु उन्होंने उसे अपने बच्चों की हत्या के लिए माफ नहीं किया इसीलिए स्वयं ही चली गयीं। गर्वित बहुत बड़ी दुविधा में था किन्तु मम्मी की अंतिम इच्छा तो यही थी। यह बात सोचकर वो बच्चों को साथ लेकर उसे लाने के लिए निकल पड़ा।
आश्रम में पहुंचकर गर्वित, रूही को ढूंढता है। रूही तो सामने ही खड़ी थी ,जब वो ,उसकी तरफ देखता है उसे देखकर वह , पहचान ही नहीं पा रहा था। कितनी कमजोर हो गई है ? इसने अपनी क्या हालत बना ली है ? उसे देखकर वो सभी बातें भूल गया। वो भूल गया ,वो उससे नाराज है।
गुरुजी भी न जाने किस स्थान पर चले गए हैं ? अब इस आश्रम में वह और कुछ सेविकाएं रहती हैं। गांव के लोग कभी -कभी आश्रम में गुरूजी का आशीर्वाद लेने आ जाते हैं। गुरूजी ने शिखा को बहुत समझाया था ,यहाँ रहकर भी तुम्हारे मन को शांति नहीं है। तुम्हारा मन अपने बच्चों में भटका हुआ है। अपने पति और बच्चों के साथ रहो !
कई बार रूही का दिल भी किया ,अपना सब क्रोध ,मान छोड़कर वो वापस चली जाये , तब सोचती ,वो अपनी ही नजरों में गिर जाएगी। गर्वित की नजरों में तो उसकी कोई क़द्र ही नहीं रह जाएगी। कहेगा भी नहीं, किन्तु सोचेगा अवश्य !यदि उसे मुझे अपने साथ रखना होता तो ,मुझे यहाँ से ले जाने में इतना समय न लगाता।
अपने पति गर्वित और अपने दोनों बच्चों को सामने देखकर, उसके हृदय से हिलोर सी उठने लगी। बरसों से बंधा बांध जैसे टूटकर बहने को आतुर था। उसने अपने को नियंत्रित करना चाहा किंतु झर -झर करते हुए आंसू उसकी आंखों से बहने लगे। मन ही मन सोच रही थी, बहुत प्रतिक्षा कराई , एक बार भी मिलने नहीं आए। सोचा भी नहीं ,मैं यहां कैसे रह रही होउंगी ?
हवेली से निकलते समय गर्वित के मन में कोई विशेष विचार ही नहीं थे ,बस एक चुभन सी थी। वो तो माँ की 'अंतिम इच्छा ''पूर्ण करने जा रहा है किन्तु रूही के हालात देखकर गर्वित का ह्रदय विषाद से भर उठा ।
बच्चे आश्रम में कदम रखते ही, रूही से लिपट गए और बोले - मम्मी ! हम आपको लेने आए हैं, बड़ा ही अजीब दृश्य था , एक तरफ रूही की आंखों से आंसू बह रहे थे। दूसरी तरफ उसके कदम कठोर हो गए थे ऐसा लग रहा था धरती से वहीं चिपक गए हैं।
मम्मी आप तैसी हो दयी हो ?छोटे ने कहा।
चुप कर, देख नहीं रहा ,मम्मी कितनी रो रहीं हैं ?बड़े ने उसे डांटा।
तभी छोटा अपनी माँ के करीब आकर उसकी गोद में बैठकर ,अपनी माँ के आंसू पोंछता है और अपनी मम्मी से पूछता है -मम्मी आपतो तिसने मारा ?पापा तो बता दो ! वो उछे बहुत मालेंगे।
अपने बच्चों की प्यारी और मासूम बातें सुनकर रूही के चेहरे पर मुस्कुराहट आई। देथो !भइया !मम्मी हंसी।
तब रूही ने ,गर्वित की तरफ देखा , इतने दिनों के पश्चात, इन्हें मेरी याद आई, उसकी कुछ शिकायतें हैं , जो उसके कानों में शोर मचाने लगीं । एक बार भी नहीं सोचा, कि मैं यहां कैसे रह रही हूं ? बड़ा प्यार का दम भरते थे ,प्यार निभाना नहीं आया। प्यार था भी या.... तभी उसे गर्वित पर क्रोध आया और उसने मन ही मन निश्चय किया'-'अब मैं, उस हवेली में वापस कभी नहीं जाऊंगी।'' जिस हवेली को मैंने त्याग दिया ,उसे फिर से अपनाना क्यों है ?
उसी हवेली में मेरा जीवन बर्बाद हुआ। उस हवेली की दीवारों ने मेरी चीख़ें सुनी है। मेरी चीखों से वो थर्राई नहीं ,अपने जीवन की नई शुरुआत करने के लिए मैं फिर भी उस हवेली में गयी थी किंतु इस हवेली की, दीवारें इतनी कठोर हैं। वो सब कुछ अपने अंदर समा लेती है। सच्चाई को स्वीकारना ही नहीं चाहती अब मैं कभी उस हवेली में कदम नहीं रखूंगी।
तभी गर्वित का स्वर उभरा ,वो बोला -शिखा ! मुझे माफ कर दो ! मुझे, तुम्हें ले जाने में देरी हो गई , जब तुमने मुझे सच्चाई बताई ,उसे मैं सहन ही नहीं कर पाया ,मैं बहुत परेशानी में था। इस बात को समझने के लिए मुझे थोड़ा समय चाहिए था।
कितना , चार बरस !
फिर तो जो कुछ भी हुआ अच्छा ही हुआ। कम से कम मैं तुम्हारे महत्व को समझ तो सका इसीलिए अब मुझे क्षमा कर दो ! मैं तुमसे माफी मांगता हूं मेरे लिए और मेरे इन बच्चों के लिए अब वापस हवेली में चलो ! हम तुम्हें लेने आए हैं।
सभी सेवक- सेविका वहां खड़े होकर उस दृश्य को देख रहे थे वे जानते थे , रूही ने एक-एक दिन कैसे इंतजार में काटा है। आज देखना चाहते थे ,क्या रूही उनके साथ जाएगी। अपने उस परिवार के साथ खुश होगी। होना तो चाहिए, इतने दिनों से इनकी प्रतीक्षा में जो थी और आज वो प्रतीक्षा पूर्ण होने जो जा रही है।
