जब रूही को इस बात का पता चला कि अब उसकी सास, इस दुनिया में नहीं रहीं ,उसको, इस बात से ज्यादा कोई फ़र्क नहीं पड़ा। वैसे वो, उन्हें अपनी सास मानती ही नहीं थी किन्तु रिश्ता तो रिश्ता है ,जिसे झुठलाया नहीं जा सकता था। बल्कि वो उनके क़िरदार के विषय में सोचने लगी - उसके साथ, उस परिवार में जो कुछ भी घटित हुआ ,उसकी ज़िम्मेदार कहीं हद तक वो भी थीं। वो अनपढ़ होती तो कहा जा सकता था कि माँ तो कुछ भी नहीं जानती थी। वो तो पढ़ी -लिखी थी और सब जानती थी , हवेली में उन्हीं की तो चलती थी। तभी तो सच्चाई सुनकर, चुपचाप यहाँ से चली गयी।
इतना भी नहीं हुआ, सच्चाई को स्वीकार करती और मुझसे आगे बढ़ने का आग्रह करती , कैसे करती ?अभी तक तो उसके बेटे को ही, सच्चाई हज़म नहीं हुई।किन्तु ये भी सच्चाई है, किसी को दुःख देना चाहो !तो स्वयं भी सुकून से नहीं रह सकते।
कहाँ मैं, अपने गांव में स्वतंत्र खेलती -कूदती थी। जब हवेली से मेरे लिए रिश्ता आया मेरी सहेलियों को तो मुझसे ईर्ष्या होने लगी। कितना सुंदर दामाद है ? कितने पैसे वाले लोग हैं ?माता -पिता तो यही सोच उसकी बलाएँ ले रहे थे ,किन्तु जो दिखता है ,क्या ऐसा कुछ होता है ? जब उसके जीवन में कष्ट लिखे थे ,तो केेसा भी परिवार हो ?क्या फ़र्क पड़ता है ? मुझे कष्ट उठाने थे ,उठाये ।
उसे क्या मालूम था ? उसकी ये खुशियां, उसे गम के अंधेरों में ले जा रहीं हैं। जैसी भी स्थिति उसके सामने आई, उसने स्वीकार किया किंतु उनकी, उस रस्म ने तो मुझे जैसे नर्क की आग़ में ही झोंक दिया । तब से आज तक उस नर्क की अग्नि में झुलस रही हूं। वह तो अच्छा हुआ, कुछ समय के लिए मैं, अपनी स्मृतियां खो चुकी थी।
मेरी जिंदगी कहां से कहां तक आ गई ? क्या इसे ही 'सुख' कहते हैं ? बड़े घरों का सुख ! इससे तो मैं किसी अपनी बराबरी के घर में चली जाती, दोनों मिलकर, आपस में एक दूसरे का सुख-दुख बांट लेते। एक -दूसरे को समझते , एक- दूसरे के साथ प्यार से रहते। शायद मेरी जिंदगी में यही सब लिखा था। अनायास ही उसे बच्चों का स्मरण हो आया। ' पार्वती न जाने, मेरे बच्चों को संभाल भी पाएगी या नहीं। कहीं ऐसा न हो, मेरे बच्चों को, किसी हॉस्टल में डाल दे !
हो सकता है, गर्वित दूसरा विवाह कर ले ! इन ठाकुरों का क्या है ? इनके लिए औरत एक वस्तु ही तो है इन लोगों का प्यार से क्या लेना देना ? वे तो स्त्री तन को रौंदना जानते हैं। उसके मन को तो क्या समझेंगे ? रूही ,यही सब सोच रही थी।
दमयंती जी के 'दाह संस्कार' के पश्चात , उनके कक्ष को स्वच्छ किया जा रहा था। सबकी जुबान पर एक ही सवाल था -क्या बड़ी बहु को पता नहीं चला ? किसी ने उसे बताया नहीं या फिर बुलाया नहीं। ऐसे समय में तो उसको आना ही चाहिए था।
उनके कक्ष की सफाई में ,तब एक किताब के अंदर दबा ,जो थोड़ा बाहर निकला हुआ था, उन्होंने एक पर्चा फड़फड़ाता हुआ देखा। पारो ने झट से वह पर्चा उठा लिया और उसे पढ़ने लगी।
मेरे प्यारे बच्चों ! मैं तुम सब की गुनहगार हूं , मैं जानती हूं, मैंने जीवन में बहुत गलत कदम भी उठाए हैं और गलत कार्य भी किए हैं। उस समय मुझे जो उचित लगा मैंने वह किया किंतु मेरे कुछ गलत निर्णय के कारण , तुम लोगों की जिंदगी में बहुत परेशानियां भी आई।
मैं नहीं जानती थी, कि मेरे बच्चे, अभी भी परेशानी से जूझ रहे हैं। मैं अब प्रसन्न थी कि मेरा परिवार अब ठीक चल रहा है हालांकि मैंने अपने दो जवान पुत्रों को खोया है, पति को खोया है किंतु मैं संतुष्ट थी। कम से कम जो अब है, वे प्रसन्न हैं, हवेली को उनके वारिस मिले हैं। दोनों बहुएं बहुत अच्छी हैं किंतु न जाने कैसे फिर से उनकी जिंदगी में टकराव आने आरंभ हो गए ?
गर्वित के बच्चे जब मुझसे कहते थे- कि दादी, हमारी मां को लेकर आओ ! मेरे पास कोई जवाब नहीं होता था। कभी गर्वित ने मुझे बताया ही नहीं, उसकी जिंदगी में क्या चल रहा है ? मैं भी जानना चाहती थी आखिर रूही घर वापस क्यों नहीं आ रही है ? इसलिए मैं अपने पोते के लिए, आश्रम में रूही को लेने चली गई किंतु उसने आने से इनकार किया और जब मैंने उसका कारण जानना चाहा, कि वह क्यों नहीं आना चाहती है ? तब उसने मुझे संपूर्ण सच्चाई बतला दी।
उसकी नाराजगी अपनी जगह सही है , उसने बहुत कुछ खोया है , बहुत सा दर्द सहा है किन्तु उसे, मुझे अपनी सच्चाई नहीं बतानी चाहिए थी। अब तक भी तो वह इस हवेली में रह रही थी। सच्चाई बताने के पीछे उसका उद्देश्य क्या था ?मैं समझ नहीं पाई किन्तु सच्चाई जानकर मुझे यह बर्दाश्त नहीं हुआ, कि वह रूही नहीं बल्कि शिखा है। यह सब तो मैं झेल जाती , किंतु कोई माँ ये कैसे सहन कर सकती है ? कि उसके सामने जो औरत बैठी है , वो मेरे पुत्रों की हत्यारिन है।
मैं यह स्वीकार नहीं कर पाई कि उसने, मेरे दो बेटों को मार दिया। इस तरह तो वह कभी भी, मेरे उन दो बेटों को भी मार सकती है जो आज मेरे सामने हैं।
वह अपनी तरफ से सच कहकर अपने मन का बोझ हल्का कर लेना चाहती थी , उस बोझ को उतारकर फेंक देना चाहती है और यह भी चाहती है कि उसे क्षमा मिले किंतु मेरे लिए यह संभव नहीं था, जिसने मेरे दो बच्चों की जान ली है ,मैं उसे कैसे क्षमा कर सकती हूँ ?
मैं उसे, हवेली में वापस लाने के लिए गई थी किंतु जब मुझे संपूर्ण सच्चाई की जानकारी मिली तो मैं यह सब सहन नहीं कर पाई। मैं, अपने पोते के लिए उसे वापस हवेली लाना चाहती थी किंतु ला ना सकी। इसके लिए मुझे बेहद अफसोस है। मेरे जीते जी तो वह हवेली में कभी प्रवेश नहीं कर पाएगी इसीलिए अब मैं इस दुनिया से जा रही हूं ताकि उन बच्चों को, उनकी मां वापस मिल जाए।
इस हवेली ने बहुत सुख-दुख और मौत देखी है , अब मैं चाहती हूं, कुछ दिन यह शांति से जिए, सुकून की सांस ले इसीलिए अब मैं तो नहीं रहूंगी। बच्चों के लिए उनकी मां को वापस ले आना। अब यही मेरी अंतिम इच्छा है।
उस पर्चे को पढ़ते हुए देखकर, तुम सुमित ने पूछा - क्या पढ़ रही हो ?
पारो ने वह पर्चा सुमित को दिखा दिया। कुछ देर बाद वह चिट्ठी गर्वित के सामने पहुंच गई। वह समझ गया मम्मी को संपूर्ण सच्चाई पता चल गई थी इसीलिए तो मैंने उन्हें यह बात नहीं बताई थी ,उन्हें क्या आवश्यकता थी, कि वे वहां जाकर उसे वापस लेकर आए ?
शिखा तो, यही चाहती है कि हम सबको उस सच्चाई का आभास हो और पश्चाताप हो ,ताकि हम आत्मग्लानि के कारण उससे ,अपने किये की क्षमा याचना करें।
