गर्वित के माफी मांगने पर ,सभी प्रतीक्षा में थे कि रूही वापस हवेली जाएगी या नहीं। तब रूही गर्वित से कहती है - कानून भले ही हत्या को अपराध माने, लेकिन नैतिक रूप से अपराधी वह समाज और वह परिवार है ,जो नारी के सम्मान की रक्षा भी नहीं कर सकता। मैं चाहती तो कानून का सहारा भी ले सकती थी किंतु' मैं' स्वयं दोषियों को दंड देकर, न्याय करने में विश्वास करती हूं , न्याय के लिए मैं भटकना नहीं चाहती थी। न ही मुझे न्याय मिलता। मेरी ही तरह न जाने कितनी लड़कियों ने भी न्याय की उम्मीद लगाई होगी किन्तु मैंने तो नहीं सुना किसी को न्याय मिला।
मैंने अपने अपराधियों को स्वयं दंड दिया है। आप जानते थे, कि वे लोग मेरे अपराधी थे,साथ में आप भी.... किंतु फिर भी आपने एक बार भी नहीं सोचा -कि वह किस तरह से यहां रह रही होगी और वो किस अपराध की सजा काट रही है ? यदि आपको लगता, मैं सही थी ,तो सोचने में इतना समय लगा दिया या फिर अब किसी और कारण से मुझे लेने यहाँ आये हो।
तुम्हारी मम्मी भी तो मुझसे मिलने यहाँ आईं थीं,यदि सच्चाई जानकर वो मुझे क्षमा कर पातीं, तो अपने साथ लेकर जातीं किन्तु उन्होंने ऐसा नहीं किया।
मुझे माफ कर दो ! मेरा अहंकार कुछ ज्यादा ही बड़ा हो गया था ,वहां उपस्थित लोगों को खड़े देखकर ,गर्वित को कुछ बुरा तो लग रहा था किन्तु बात भी तो सम्भालनी थी।वे लोग ,उन्हें देख तो पा रहे थे किन्तु उनके मध्य क्या बातें हो रहीं हैं ?ये सुन नहीं पा रहे थे। मैंने तुम्हें हत्यारिन समझ लिया, असली हत्यारा तो मैं हूं जो, अपनी ही पत्नी को मरते हुए देखा और कुछ कर न सका और उसे जाते हुए, रोक भी न सका। मैं समझ नहीं पा रहा था कि क्या करना है ?
इसमें सोचना कैसा ?यदि मैं गलत थी तो तुम मुझे जेल भेज देते ,मुझे मेरे किये का दंड मिलता और यदि मैं सही थी ,तो मुझे यहाँ छोड़कर ही नहीं जाते। क्या तुमने परिवार में सबको मेरे विषय में बता दिया था ? रूही ने पूछा।
नहीं, मैंने किसी को कुछ भी नहीं बताया था, तुम्हारी बहन पहले से ही इस विषय में जानती थी किन्तु मम्मी के न रहने पर अब सभी जान गए हैं।
क्यों नहीं बताया, क्योंकि आप मुझे उनका अपराधी मानते थे और आप जानते थे , कि घरवाले मुझे स्वीकार नहीं करेंगे, मेरे अपराध को भी स्वीकार नहीं करेंगे। अब मैं उस हवेली में वापस नहीं जाऊंगी क्योंकि अब उस हवेली से मेरा कोई नाता नहीं है ,उसमें मेरा दम घूटेगा । मुझे सभी बातें रह रहकर याद आएँगी। अपराध अपनों ने किया हो या गैरों ने.... पापी का साथ देना भी, अपराध की श्रेणी में ही आता है ,उसने गर्वित को उचटती नजरों से देखा।
अच्छा एक बात बताओ ! ये अपराध मैंने किये हैं ,आप जानते हैं ,और आप चाहें कि मेरे भाई पुनः वापस लौट आएं ,तो क्या मैं आपके भाइयों को वापस ला सकती हूँ ?
ये तो तुम मुझसे बेहतर जानती हो ,ऐसा सम्भव हो पाता तो तुमसे पहले उन्हें, मैं वापस ले आता।
तो क्या तुम मेरे उस सतीत्व को वापस ला सकते हो ? जो तुम लोगों ने मिलकर रौंदा है। क्या तुम मेरी वो सादगी ,लोगों पर विश्वास , वापस ला सकते हो ? जो दर्द मैंने सहे हैं ,जो अब नासूर बन चुके हैं ,उन जख्मों को भर सकते हो। मेरे वो दिन, जो मैं ख़ुशी से जीना चाहती थी। मेरी उम्र के वो पल ,वो वर्ष मुझे वापस लौटा दो। जिनमें मैं जीना चाहती थी। आज उम्र के इस पड़ाव पर मैं अपनी उस उम्र को जीना चाहती हूँ। क्या लौटा सकते हो ? चलो !मैंने तुम्हें माफ किया। भूल जाती हूँ ,उस दर्द को। मेरी बीती वो उम्र मुझे वापस लौटा दो !
गर्वित निरुत्तर था ,कुछ देर चुपचाप खड़ा रहा। बच्चे कह रहे थे -पापा !वापस कब चलेंगे ?
तब गर्वित को लगा शायद मैंने यहाँ आकर गलती कर दी। तब बोला -मुझे यहाँ आना ही नहीं चाहिए था ,यहाँ आकर मेरा तमाशा बनवा दिया। वो तो मम्मी की अंतिम इच्छा थी ,इसीलिए आ गया।
अब सच्चाई मुँह पर आ गयी ,मैं वही तो सोचूं ,इन्हें मेरी याद कैसे आ गयी ? तुरंत ही बोली -बच्चो !चलो घर चलते हैं, उसने आश्रमवालों की तरफ देखा और बोली -अब मैं अपने घर जा रही हूँ। गुरूजी को मेरा प्रणाम कहना ,कहते हुए बच्चों का हाथ पकड़कर आगे -आगे चल दी। गर्वित समझ नहीं पाया ,आखिर ये चाहती क्या है ?अभी तो मना कर रही थी और अब आगे -आगे जा रही है।
आश्रम के सभी लोग ,उन्हें द्वार तक छोड़ने आये ,उनसे विदा लेकर शिखा आगे बढ़ी। गर्वित गाड़ी लेने गया किन्तु शिखा किसी अन्य सवारी से ''खेड़ा ''गांव की ओर बढ़ चली। गर्वित उन्हें जाते हुए देखता रहा।
