अभी तक आपने पढ़ा ,प्रियंका की दादी गांव से आई हैं और उसे सही तरीके से व्यवहार करने को कहती हैं। तब प्रियंका दादी से कहती है -ऐसे संस्कारों से क्या लाभ ? जिनका दूसरे की नजर में कोई मूल्य ही न हो। तब प्रियंका की मम्मी उसे आगे समझाती हैं। संस्कारहीन बच्चे को कोई कुछ नहीं कहता ,उसकी अशिष्टता का कारण, उसके माता -पिता पर ही थोप दिया जाता है या उसके परिवार पर... किसी भी बच्चों के असंस्कारी होने में सिर्फ माता-पिता का ही योगदान नहीं होता उसके आसपास के वातावरण और उसके मित्रों का भी काफी कुछ सहयोग होता है।
समय के साथ-साथ उसकी अपनी एक सोच भी बनती चली जाती है। तब वह अपने संस्कारों को त्याग कर क्या ग्रहण करता है ?यह उस पर और उसकी सोच पर निर्भर करता है।
यह बात नहीं है, कि तुम्हारी दादी तुम्हें ही अच्छे संस्कार सीखाना चाहती हैं , बचपन में ही जो आदतें पड़ जाती है या डाल दी जाती हैं । जीवन भर वही साथ निभाती हैं। अच्छे तरीके से रहने की आदत पड़ जाती है,कार्य को समय से संभालना आ जाता है और फिर बच्चों के व्यवहार बातचीत , सोच, इन सब से पता चलता है कि बच्चा कैसे परिवार से है ? और अपने बड़ों की बात का कितना मान रखता है ?
यदि तुम्हें कुछ अनुचित लगता है, तुम्हें उसका विरोध करना चाहिए किंतु क्या संस्कारी होकर ही विरोध किया जा सकता है ? शिष्टता का एक दायरा होता है ,उसे लांघना नहीं चाहिए । हमें जीवन में अच्छे -बुरे सभी तरह के लोग मिलेंगे। किंतु यह सब स्थिति पर भी निर्भर करता है कि हम किसी इंसान के साथ कैसा व्यवहार करते हैं। संस्कार ग्रहण करना ,उनका पालन करना कोई अनुचित कार्य नहीं है ,यह न हीं लड़कों के लिए होता है और न ही लड़की के लिए बल्कि संपूर्ण परिवार के लिए होता है। हर घर में बच्चों को संस्कारों का पाठ पढ़ाया जाता है।
यदि एक संस्कारी लड़की एक असभ्य परिवार में चली जाती है , तो उसके संस्कार कब तक काम आएंगे ?प्रियंका ने पूछा।
माँ! ये क्या सिखला रही हो ?अपनी पोती को....घर में प्रवेश करते हुए ,मनोरमा की ननद अपनी माँ से पूछती है।
अरे बुआ जी आ गयीं ,खुश होते हुए ,प्रियंका उछल पड़ी। देखो ! न बुआजी ! दादी जब से आईं हैं ,मुझे डांटे जा रहीं हैं। ऐसे मत उठो !ऐसे मत बैठो !यहाँ मत खड़ी हो।टेलीविजन पर ऐसे कार्यक्रम मत देखो !अब आप ही बताओ !मैं कैसे जियूँगी ?
अच्छा !मम्मी तुझे तंग कर रहीं हैं ,तुम मुझे ये बताओ !तुमने मेरी माँ का कितना कहना माना ?या फिर मेरी माँ की शिकायत ही कर रही है। अपने बड़े यदि कुछ कह रहे हैं ,तो मान लेना चाहिए। यदि तुम उनकी बात से सहमत नहीं हो ,तो कारण तो पूछोगी ही....
हाँ, वही तो मैंने पूछा ,प्रियंका बोली।
जबाब मिला।
हाँ ,तब से ये दोनों मुझे समझाने में ही लगी हुई हैं ,अपनी दादी और अपनी मम्मी की तरफ इशारा करते हुए प्रियंका ने जबाब दिया।
ठीक है ,आज की क्लास इतनी ही थी ,अब तुम अपने कमरे में जाकर पढ़ाई करो !
प्रियंका के जाते ही , नूतन के चेहरे के भाव बदल गए और बोली -माँ !अभी वो बच्ची है ,अभी उसे अपने घर में खुलकर तो जी लेने दो ! पता नहीं, जीवन में आगे क्या देखने को मिल जाये ?
शिष्ट्ता और संस्कारों की बचपन से ही नीव डाली जाती है ,ये कोई ऐसी चीज नहीं है। आज भूख लगी और एकदम से ठूंस -ठूंसकर खिला दो ! प्रतिदिन भूख लगती है ,प्रतिदिन इंसान कुछ न कुछ सीखता ही रहता है।
आपने मुझे और मेरी बहन को भी तो ऐसे ही समझाया था। क्या हुआ ?हम दूसरी जगह गए ,हमारी शालीनता ,नर्म व्यवहार ,हमारी सज्जनता को उन्होंने हमारी मूर्खता समझ लिया। दीदी की बात छोडो !मेरी सास ने इतनी -इतनी चालें चलीं कि कहीं उनका लड़का ,उनके हाथ से न निकल जाये। यही सोचकर उन्होंने हमारे बीच गलतफ़हमियाँ पैदा कर दीं। मेरी शालीनता ,सहजता से बोलना उन्हें ढोंग नजर आ रहा था।
उनके पैर छूकर मैं लोगों को दिखलाना चाहती थी, कि वो कितने सभ्य परिवार से है और ये लोग कितने ज़ाहिल हैं ?वहां ये सब काम नहीं आया। जब बात हद से बाहर हो गयी तब मैंने भी उनके तरीक़े से काम करना आरंम्भ कर दिया। 'जैसे को तैसा ''अब सब शांत हैं किन्तु एक ज्वालामुखी सबके अंदर धधक रहा है। न ही मुझे उनसे अब कोई प्रेम है ,न ही उनका सम्मान मेरे मन में है। क्या मेरे संस्कार वहां कुछ कर सके ?
दीदी !आज भी जीजाजी के अत्याचार झेल रहीं हैं ,वो शराब पीते हैं ,और नशे में न जाने क्या -क्या बोल जाते हैं। जब दीदी ने जबाब देना चाहा ,तो उन पर हाथ उठाया।
आपके संस्कार कहते हैं -ब्याही बरी लड़की मायके में आकर नहीं बैठती।अपने पति के सुख -दुःख में उसके साथ ही खड़ी रहती है। उन्होंने वहां जाकर सुख तो देखा ही नहीं ..... संस्कारों की क्या इतनी बड़ी क़ीमत चुकानी पड़ती है ?
उनके संस्कार हैं ,''औरत पांव की जूती होती है ,उसे सर पर नहीं चढ़ाना है। '' कब तक जी हुजूरी करती रहेगी ? आधी ज़िंदगी तो उन लोगों को समझने और उनको खुश करने के प्रक्रम में ही बीत गयी। अब क्या बचा है ? एक न एक दिन तो उसे आवाज उठानी ही होगी।
तभी प्रियंका वहां आ गयी और बोली -बुआजी !थोड़ा सा ही काम है ,आप आईं हैं ,इसीलिए अब अपना कार्य करने में मन नहीं है।
ठीक है ,तुम भी यहाँ बैठो ! तब अपनी बात जारी रखते हुए वो कहती है - यदि कोई लड़की बाहर नौकरी करने जाती है और उसे अशिष्ट ,असभ्य व्यक्ति मिलते हैं , उनका सामना भी करना होगा। संस्कार उचित -अनुचित का ज्ञान देते हैं। तुम्हें संस्कार सिखाए जा रहे हैं ,वह तुम्हारे काम आएंगे। जो तुम्हारे भाई को सिखाए जाएंगे, वह तुम्हारे भाई के काम आएंगे। ऐसा नहीं है जो संस्कार या सीख हम तुम्हें दे रहे हैं। वो तुम्हें आगे बढ़ने में सहायक नहीं होंगे। तुम शन्तिपूर्वक उचित निर्णय लेने में सक्षम रहोगी।
वह तुम्हारा भाई भी उपयोग में ले या उसके उपयोग में आएंगे किंतु वह भी तो देखता है न कि बहन को किस तरीके से समझाया जा रहा है ?और बेटियां तो अनमोल होती हैं, इसलिए बेटियों पर विशेष रूप से ध्यान दिया जाता है क्योंकि उन्हें दो परिवारों को जोड़कर रखना जो होता है, रिश्तों को संभाल कर रखना होता है। इसलिए तुम्हारी दादी तुम्हें जो कुछ भी समझा रहीं थीं ।ध्यान से सुनना और समझना चाहिए। उसकी बुआ ने विषय का रुख़ ही बदल दिया था।
बुरे लोग ,बुरे दिन सभी की ज़िंदगी में आते हैं। उनका सामना कैसे करना है ?किस तरह अपने जीवन को उन बुराइयों से लड़ते हुए आगे बढ़ना है ? यह सब परिवार के संस्कार ही उसको मजबूत बनाते हैं। विपरीत परिस्थितियों में बच्चा कमज़ोर न पड़े ,तब परिवार और संस्कार ही काम आते हैं। हम जानते हैं ,आज के समय में अपने को संभालना बहुत ही कठिन है किन्तु जो कुछ अच्छा मिल रहा है, ले लेने में क्या बुराई है ?बुआ ने प्रियंका से कहा।
वैसे मैं भी संस्कारों के विषय में ज्यादा कुछ तो नहीं जानती हूं किन्तु जितना जानती हूं।या मैंने इस जीवन को जाना है ,सीखने की कोई उम्र नहीं होती। ये जीवन बहुत कुछ सिखाता है ,ये तुम पर निर्भर करता है तुम सीखना क्या चाहते हो ?सही राह पर चलना है ,या फिर गलत राह पर !इतना ज्ञान तो सभी को हो जाता है क्या सही है ,क्या गलत हे ? आज मैंने तुम्हें जो समझना था ,समझा दिया कहते हुए मनोरमा जी रसोई घर में अपने काम में व्यस्त हो गईं ।
दादी की घूरती नजरों को देखकर प्रियंका ने भी, अब ज्यादा बात को बढ़ाना उचित नहीं समझा और सही तरीके से बैठ गई। भले ही जीवन में हमें कैसे भी लोग मिलें किन्तु'' हम अपना चरित्र नहीं बदल सकते और इसको हमारे संस्कार और भी सुदृढ़ बनाते हैं।''
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