रूही ,नाराज होकर आश्रम में तो आ गयी किन्तु वहां उसे, अपने बच्चों की चिंता परेशान कर रही थी। वह स्वयं ही नहीं समझ पा रही है ,वो नाराज़ है भी, तो किससे? अपने आपसे या फिर गर्वित से... प्रतिदिन ऐसे ही चाँद को निहारती ,आज उस सेविका ने जब उसे देखा ,तो उससे बोली -तुम अपने आपको क्यों धोखा दे रही हो ? तुम्हारे चेहरे पर नाराज़गी नज़र आती है किन्तु आँखों में किसी की प्रतीक्षा ! वो तो अपनी बात कहकर चली गयी।
उसके जाते ही ,रूही ने फिर से गगन में देखा ,किन्तु चाँद अब तक अपनी जगह से खिसक चुका था। रात्रि ही क्यों ? प्रातःकाल का सूरज भी तो निकलता है। नए जीवन ,नए उजियारे और एक नई शुरुआत की तरह किन्तु वो भी ढ़ल जाता है ,किन्तु उसके मन में जो उम्मीद जगती है ,वो भी सिमट जाती है। दिन निकलता है और दिन के बाद फिर से रात्रि होती है। ये जीवन चक्र की तरह निरंतर चलते रहते हैं।सुबह का सूरज एक उम्मीद लेकर आता है और अंधकार में सब लुप्त हो जाता है।
आश्रम में भी लोग आते हैं, चले जाते हैं। कोई ठहरता नहीं, किन्तु मेरी जिंदगी में तो जैसे घोर अंधकार ठहर सा गया है ।जो मौत के रूप में मुझे लीलने आया था। उसके बाद दिन भी, निकला था जब मैं डॉक्टर अनंत के घर पर रहती थी।
वो अनजाना अंधकार ! मैं जिंदा होकर भी अंधकार से बाहर नहीं निकली थी। न चाहते हुए भी मैं, उसमें कुछ ढूंढ़ रही थी। इंसानी प्रकृति जो ठहरी ,जिज्ञासा बनी रही ,जब तक वो डर मेरे सामने नहीं आ गया।
पारो ने मुझे, उसका सामना करना सिखलाया ,उससे लड़ना सिखाया। मैं तैयार थी, युद्ध का परिणाम चाहती थी। मैंने युद्ध के मध्य ही हथियार डाल दिए ,क्या मैं कमज़ोर हो गयी थी ? या फिर लड़ना ही नहीं चाहती थी। परिणाम कुछ भी होता ,हार तो अपनी ही होती है। अपनों को मारकर भला कोई, कैसे प्रसन्न रह सकता है ? किन्तु वे मेरे अपने कब से हो गए ? क्या मैं उस मौत से डर गयी थी ? या फिर इस युद्ध के परिणाम से। मानती हूँ ,''मौत ही अंतिम सत्य है ''किन्तु उसका कारण मैं ही क्यों ? जिन्हें मैं जीवन दे नहीं सकती ,तो मारना क्यों था ?
अपने ही विचारों में उलझकर रह गयी ,रूही ! मुझे मेरी मौत का बदला भी तो लेना था।'' बदले की भावना'' इंसान को कितना कठोर बना देती है ? यदि बदला लिया भी तो उसका परिणाम क्या होता ?आज वो हवेली विरान होती ,जहाँ आज जीवन है ,वहां श्मशान होता। क्या मैं खुश रह पाती ? क्षणिक आवेग सब तहस -नहस कर जाता। महाभारत का अंत क्या दे गया ? कुरुक्षेत्र को वीरान बना गया या फिर एक नई शुरुआत ! जो गए हैं ,उस रिक्त स्थान को तो न भर सका।
'' क्या मौत ! ही एक नई शुरुआत की पहल है ?एक नई सोच भी तो हो सकती है। '' विवाह के रूप में एक बदली छाई , घनघोर बादल गरजते हुए इधर उमड़ पड़े ,चंद बूंदें ही, तन -मन भिगो गयीं। अचानक ही उसे ख्याल आया - न जाने बच्चे, मेरे बिना क्या कर रहे होंगे ? उन्होंने खाना खाया होगा या नही... मैं कितनी कठोर मां हूं। अपने बच्चों का भी ख्याल नहीं रहा,अपने आपको समझाया -' उनकी दादी सब संभाल लेगी, साथ में उनकी मौसी भी तो है।''
वो, अपने बच्चों का और अपना ख्याल रखेगी या मेरे बच्चों का... मैं स्वयं ही, अपने बच्चों के प्रति लापरवाह हो गई हूँ। एक माँ ही तो है ,जैसा ख़्याल एक माँ रख सकती है, ऐसा कोई नहीं रख सकता। मैंने उन्हें बिना माँ के छोड़ दिया ? न जाने, उनकी परवरिश कैसी होगी ? ये उत्तरदायित्व भी तो मुझे ही निभाना था।
मेरी मम्मी भी तो मेरा कितना ख्याल रखी थीं ? मेरे लिए रोती थीं , आज भी उन्हें मेरी फिक्र रहती है। मैं मजबूरी में यहां पर हूं किंतु मेरे बच्चों के साथ क्या मजबूरी है ? फिर वे मेरे साथ क्यों नहीं है ? मुझे उनके साथ होना चाहिए था।
मैंने कितनी बार गर्वित से पूछा था -उसे मुझसे कुछ कहना तो नहीं है , किंतु उसने कभी भी अपने किए पर पछतावा नहीं किया। उसने कभी मुझसे यह नहीं कहा - कि जो भी कार्य मैंने किया, वह गलती से हुआ या मुझसे गलती हो गई।''
मुझे यहां छोड़कर चुपचाप चला गया, एक बार भी नहीं कहा- कि तुम यहां कैसे रहोगी ? तुम्हें मेरे साथ चलना ही होगा। कैसे कहता ? उसे तो अपने भाइयों के जाने का दुख हुआ होगा ,उनके जाने का दुःख तो उसे पहले भी था किन्तु उनकी मौत के कारण की इस वास्तविकता से पर्दा तो अब उठा। उसे मुझसे ऐसी उम्मीद ही नहीं होगी।
हो सकता है, मेरे अपराध की सजा के लिए कुछ सोच रहा हो। यहां आए हुए ,मुझे 15 दिन हो गए हैं लेकिन अभी तक उसने एक बार भी , मेरी खबर नहीं ली। उस परिवार में से भी कोई नहीं आया। हो सकता है, उसने सारी बातें अपने परिवार को बता दी हों और सभी लोग मुझसे नाराज हों ।
उनका नाराज होने का हक तो बनता है, पर मैं क्या कर सकती हूँ ? क्या मेरी नाराजगी का कोई महत्व नहीं है मैंने तो उनके पिछले कर्मों की सजा दी नहीं, जो वर्तमान में घटित हो रहा था, इसका विरोध किया।
दीदी जी ! क्या यूं ही खिड़की के पास बैठी रहेंगी, इस अँधेरे में क्या देख रहीं हैं ? आश्रम में सबसे अंत में सम्पूर्ण आश्रम की जाँच करते हुए सेविका ने पूछा ।
कुछ नहीं ,दिन के उजालों की चोंध में कई बार हम वो चीज देख और महसूस नहीं कर पाते ,जो ये रातों के अँधेरे समझा देते हैं ,किन्तु तब तक वो सेविका जा चुकी थी। मेरी बात सुनने -समझने की फुरसत ही किसे है ?सोचकर थोड़ा मुस्कुराई। इससे पहले की कोई और सेविका फिर से आकर उसे टोके, उसे अब अपने बिस्तर पर लेट जाना चाहिए। यही सोचकर रूही ने एक गहरी स्वांस ली और अपने बिस्तर पर लेट गयी।
लोग कहते हैं -''आश्रम में आकर मन को शांति का एहसास होता है किन्तु मेरे मन में अभी भी व्याकुलता क्यों है ? मन का स्थिर होना आवश्यक है, फिर चाहे वो आश्रम हो या फिर घर ! बाहर का वातावरण कितना शांत और ठंडा है किन्तु अंदर एक घुटन ,और अशांति छाई है। न जाने , नींद क्यों नहीं आ रही है ? करवटें कुछ ज्यादा ही बढ़ती जा रही हैं।
प्रातःकाल की वंदना के पश्चात ,रूही गुरूजी के समीप गई ,गुरूजी ! से मिलने गांव के कुछ लोग आये हुए थे ,उनसे वार्तालाप में व्यस्त थे। रूही को देखकर पूछा - क्या बात है ? कुछ कहना चाहती हो ?
जी !मैं प्रतीक्षा कर लूँगी, कहकर वो बाहर बैठ गयी।
