ज्यादा सोचने और समझने में उम्र निकल जाती है।
जो खुश रहने की उम्र थी, वह न जाने कहां खो जाती है ?
अब कभी उम्र के एक पड़ाव पर सोचता हूं ,
तो सोचता ही रह जाता हूं।
ढूंढता हूं ,खुशियां ! वो न जाने कहां ठहर गईं हैं ?
इंतजार करना बेकार था, मैं सोचता ही रह गया।
उम्र और समय कहीं निकल गया।
अब सोचता हूं ,मैं क्या चाहता था ?
मन ,मस्तिष्क खुशियों को तराजू में तौलता रहा।
मेरा दोस्त भी कहता था- जो आज है ,उसे बटोर ले !
खुश रहना, आज ही से सीख ले।
जब जैसा वक्त आएगा ,वह भी पार हो जाएगा।
समय के फेर में न पड़ !
संगिनी संग जीवननैया में बैठ, सुख -दुख पार कर जाएगा।
अंतिम समय में कुछ सुनहरी खट्टी- मीठी यादें रह जाएगी।
उन्हें याद कर, एकाकी जीवन भी कट जाएगा।
इस समय को संवार ले, वरना यह वक्त भी हाथ नहीं आएगा।
और तू सोचता ही रह जाएगा और तू सोचता ही रह जाएगा।
