Mysterious nights [part 191]

रुही की सच्चाई जानकर ,गर्वित को बहुत क्रोध आता है ,किंतु समझ नहीं पाता, कि ऐसी स्थिति  में उसे क्या करना चाहिए ? तब उससे पारो बात करती है , और उससे पूछती है-अब तो तुम्हें सम्पूर्ण सच्चाई मालूम  हो  ही है । तुम्हारी नजर में क्या वो[रूही ] गलत है ? यदि तुम्हें वह गलत लगती है, तो उसकी जगह पर अपने आप को रख कर देखो ! तब तुम्हें सही- गलत का एहसास होगा। 

गर्वित अभी भी तो दुविधा में पड़ा हुआ था। कायदे से देखा जाये तो, उसने गुनाह तो किया है ,उसने दो -दो हत्याएं की हैं। यदि वह रूही को जेल भेजता है ,तो उसके विरुद्ध उसके पास कोई सबूत भी तो नहीं है और फिर उन पुलिस वालों से क्या कहेगा ? मैं किस अपराध में, उसे जेल में डालना चाहता हूँ ?


 तब वो भी तो अपना पक्ष रखेगी ,हमारे विषय में भी तो लोगों को पता चल जायेगा। तब वो भी चुप बैठने वालों में से नहीं है। अब मैंने उसकी आँखों में किसी भी तरह का भय नहीं देखा। वो भी तो लोगों से यही बताएगी कि इन लोगों ने मेरे साथ क्या किया ? इस हवेली की जो साख बनी हुई है जो भी रस्में हैं, वो बाहर आ जाएगी, तब क्या होगा ? क्या मैं उस सच्चाई से डर रहा हूँ ? जिसे उसने झेला है। 

मैंने उससे प्यार किया ,किन्तु उसकी सच्चाई पता चल जाने पर, मुझे उस पर क्रोध क्यों है ?अपनी जगह तो वो सही है किन्तु फिर भी मुझे बुरा लग रहा है। मेरे परिवार के साथ उसने अच्छा भी तो नहीं किया। 

पापा देखो न....  मेरे जूते नहीं मिल रहे हैं , मम्मी !कहां चली गई ? मुझे भूख भी लगी है ?परेशान होते हुए उसके बड़े बेटे ने कहा। 

उसे गए हुए ,अभी दूसरा दिन ही तो हुआ है। गर्वित अपनी ही उलझनों में उलझा हुआ था। बेटे की बात सुनकर गर्वित को क्रोध आया और बोला -क्या मम्मी भोजन बनाती हैं ? भोजन रसोइया बनाता है , वह तुम्हें भोजन कराएगा, उससे  जाकर कहो ! तुम्हारे लिए भोजन बना दे !

ऐसा नहीं है , मम्मी ही मेरे लिए भोजन बनाती थी। वो, मेरे लिए  नए-नए  व्यंजन बनाती थी ,वो तो एक ही तरह का खाना बनाता है और मम्मी तो खिलाती भी थी।

 अब तुम बड़े हो गए हो ,स्वयं खाना सीखो ! जाकर दादी से बोलो ! वो खिलाएंगीं , परेशान होकर गर्वित ने कहा। 

गर्वित अपने कार्यों में व्यस्त होने का प्रयास कर रहा था किंतु उसका एक पल के लिए भी मन नहीं लग रहा था ऐसा लग रहा था, जैसे कुछ टूट रहा है। दिन तो ऐसे ही निकल गया किंतु रात्रि में उस कमरे का सूनापन उसे काटने लगा। कभी वह अलमारी में कपड़े रखती थी ,कभी कोई सामान समेटती  हुई नजर आती थी उसकी पायलों की रुनझुन ,इस कमरे में उसके होने का एहसास कराती थी  किंतु अब यह कमरा उसे काटने को दौड़ रहा है। जब तो शिखा का भूत नहीं था किंतु अब उसे वास्तव में उस' एकांत का भूत' काटने को दौड़ रहा था। वो सूनापन उससे सहन नहीं हो रह था। 

अपनी जिंदगी से  कितनी शिकायतें होने लगीं ?कभी लगता उसका हवेली में होना ही, उसके लिए अभिशाप बन गया या फिर इस ख़ानदान में पैदा होना ही भारी पड़ गया। उस एकांत में अपने आपको टटोल रहा था। विचारों को एक झटका दिया और चुपचाप सोने का प्रयास करने लगा। 

वह वहां क्या कर रही होगी ? क्या वो , वहां रह पाएगी ? आज तक उसने रूही की परेशानियों को कभी महसूस ही नहीं किया था किंतु आज उसे लग रहा था जैसे रूही वहां रहकर परेशान है, वह वहां आश्रम में कैसे रह पाएगी ? एक गहरी स्वांस लेते हुए ,उसने करवट बदली और सोचा, उसे ही तो जाना था, मुझसे  क्या कह कर गई है ,उसने फिर से करवट बदली,सोने का अथक प्रयास करते हुए भी विचार उसके इर्द -गिर्द ही मंडरा रहे थे। एक विचार को झटका देता तो दूसरा आ जाता , किंतु नींद नहीं आ रही थी।

न जाने क्यों ? मैं उसके विषय में इतना क्यों सोच रहा हूँ ? गयी है, तो जाने दो ! अनेक विचार आ जा रहे थे। उसने सोच लिया था, अपनी इच्छा से गयी है ,उसे कभी लेकर नहीं आएगा। अपनी इच्छा से ही गई है और अपनी इच्छा से ही वापस आएगी। जब कमरे में नींद नहीं आई तो अपने कमरे से बाहर निकल गया और बच्चों के कमरे में गया दोनों बच्चे निश्चित होकर सो रहे थे।

 ये हमारे, उन पलों के निशानी हैं , जिनमें कहीं न कहीं प्यार तो छुपा था। हो सकता है, उसके मन में जिम्मेदारियां रहीं हो  किंतु मेरे मन में तो प्यार ही था। यदि यह प्यार है ,तो फिर तू उस पर क्रोधित क्यों है ?अचानक ही ये प्रश्न उसके मन को झिंझोड़ गया। 

उसने तो अपना बदला लिया है , किन्तु मुझे तो इन सब बातों की कोई जानकारी थी ही नहीं, वो मेरा बदला  नहीं था फिर मैं उससे इतना नाराज क्यों हूं ? सोचते हुए ,वह दोनों बच्चों के बीच जाकर लेट गया और दोनों के मासूम चेहरे देखे ,सोते हुए कितने प्यारे लग रहे हैं ? दोनों को अपने समीप खींच लिया। अब शायद थोड़ी सुकून की नींद आ जाए। 

रूही,अपने कमरे की खिड़की के समीप बैठी हुई थी, उस चांद को देख रही थी ,जिसका प्रतिदिन का यही कार्य है। प्रतिदिन अपने समय पर निकल जाता है, और कुछ देर उसकी खिड़की से झांकता है और आगे बढ़ जाता है। वो मुझसे कुछ कहता क्यों नहीं ? क्या ये हवेली के मार्ग से होते हुए नहीं आता होगा ? कम से कम मेरे बच्चों की सूचना, उनका कोई संदेश तो दे जाता किन्तु हर बार ये ऐसा ही करता है। क्या मुझे मेरे बच्चे भी याद नहीं करते होंगे ? सोचकर उसकी आँखों से कुछ बूदें उसके कोमल कपोलों पर तैर गयीं। उनको पैदा करने का मेरा उद्देश्य यही था ,मैं अपने गुनाहों को थोड़ा कम कर सकूँ किन्तु दूर हो जाने पर न जाने क्यों ?मुझे उनकी याद सता रही है। 

क्या तुम रो रही हो ? अचानक पीछे से आई ,सेविका ने उससे पूछा। 

अपने अश्रु पोंछते हुए ,रूही बोली -नहीं ,तो... 

रूही के समीप बैठकर बोली - ये मोह ऐसी ही चीज है ,अचानक हो जाता है ,इंसान स्वीकारना नहीं चाहता किन्तु परिवार का मोह आसानी से नहीं जाता। इसलिए तो योगी इस चक्र में फंसना ही नहीं चाहते ,एक बारी इसमें घिर गए ,तो निकलना कठिन है। तुम कितना भी अपने को झुठला लो ! किन्तु तुम्हारी आँखें सब कह जातीं  हैं। तुम्हें अवश्य ही किसी की प्रतीक्षा है। मैं नहीं जानती, तुम्हारे साथ क्या हुआ ? किन्तु एक नाराज़गी तो लगती है। 

नाराज होना ये एक स्वाभविक क्रिया है ,जो अपनों से ही होती है और जब भी कोई समझ नहीं पाता तो प्रतिक्रिया होना भी स्वाभाविक है। उसी प्रतिक्रिया के कारण ,आज तुम यहां हो। मुस्कुराकर बोली - अभी तुम सो जाओ ! वैसे विचार करना ,तुम वहां अधिक प्रसन्न थीं या फिर यहाँ ! अभी मैं चलती हूँ ,गुरूजी नाराज होंगे। प्रातःकाल भी तो उठना है। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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