गर्वित, पार्वती की बातें, सुन रहा था और सोच रहा था- मैं इतनी छोटी सी बात भी न समझ सका किन्तु गलतियाँ तो उसने भी की हैं ,फिर मैं ही क्यों ? उसने तो हत्याएं की हैं ,हत्या से ज्यादा बड़ा अपराध तो नहीं किया है। हम ठाकुर हैं ,ऐसे ही किसी के सामने नहीं झुकते। वो भी तो इस हवेली की अपराधी है। न जाने कितनी लड़कियां हमारे जीवन में आईं ?कोई इच्छा से तो कोई बिना इच्छा के.... इस तरह तो हम सभी के अपराधी हुए। हमारे ख़ानदान की तरफ किसी की नजर नहीं उठी किन्तु आज ये दो लड़कियां हमारी हवेली में आती हैं और इस हवेली की नींव हिला देना चाहती हैं।यदि मैं अभी कमज़ोर पड़ गया तो हो सकता है। सम्पूर्ण जीवन मुझे झुककर ही रहना पड़े।
माना कि मैं, उससे प्यार करने लगा था किन्तु इसका अर्थ यह नहीं कि मैं उसके कदमों में झुकूंगा। ये तो मेरी शराफ़त है ,जो अब तक वो उस आश्रम में निश्चिन्त हो, रह रही है। अचानक ही गर्वित के विचारों में परिवर्तन आया और उसका ठाकुर खून खौल उठा।
गर्वित अपने विचारों में खोया था ,पार्वती की बातें जैसे उसे अब सुनाई ही नहीं दे रहीं हैं ,बस वो इतना सुन पाया ,पार्वती कह रही थी -''जो प्यार की गहराई में उतरता है, उसे यही आभास होता है अब आप ही समझ सकते हैं आपको क्या करना है ?'
रूही प्रतिदिन आश्रम की सफाई भी करती खाना बनाने में हाथ बंटाती किंतु उसकी नज़रें आश्रम के द्वार पर लगी रहतीं। उसे लगता शायद ,आज गर्वित उसे लेने आएगा इसी तरह बात होते-होते इतने दिन हो गए तो उसे निराशा होने लगी थी। इधर गुरूजी भी उससे, अपनी हवेली वापस लौट जाने के लिए कह रहे थे। वो चाहे तो, अपने घर भी लौट सकती है किन्तु माता -पिता को जो सुख देकर आई है। उसे बदलना नहीं चाहती। मुझे वापस अपने घर में लौटते देखकर वो ये बात शायद बर्दाश्त न कर सकें।
दिन निकलता, एक नई उम्मीद जगती और फिर निराशा की अंधियारी उसे अपने आग़ोश में ले लेती।इस तरह दिनों की संख्या बढ़ती जा रही थी।
अब तो दमयंती जी ने भी गर्वित से पूछा -तू बहु को हवेली में वापस क्यों नहीं ला रहा है ?
उसे शांति से रहने दीजिये ! यहाँ उसके बिना सभी कार्य हो तो रहे हैं। इस हवेली में यही तो शाप है ,इस हवेली में एक ही बहु रहेगी।
अब तो वो श्राप तो समाप्त हो गया है ,महात्मा जी ने कहा है।
कुछ पूर्व कर्मों की परछाइयां ,यहाँ अभी भी भटक रही हैं।
गर्वित को लग रहा था ,अपराध तो अपराध ही होता है ,हत्या जैसा जघन्य अपराध कम नहीं है। हमने अपराध किया उसका उसने बदला लिया ,उसका हिसाब बराबर.... किन्तु उसे मैं कैसे क्षमा कर सकता हूँ ?उसने मेरे भाइयों को मारा है। यदि मैं उसे क्षमा करता हूँ तो अपने भाइयों का गुनहगार बन जाता हूँ। अपराध तो मैंने भी किया था। बराबर का दंड मिलना चाहिए था। गुरूजी ने ,सत्य ही कहा था -अपराधी को जिन्दा रखकर दंड देना ,उसे तिल -तिलकर मारने जैसा है। मुझे भी उसके बिना धीरे -धीरे रहने की आदत पड़ जाएगी।
गर्वित अब अपने उस दर्द को जी रहा था ,प्रतिदिन रूही को स्मरण करता और अपने को कार्य में व्यस्त कर लेता किन्तु उसका ठाकुरों वाला 'दर्प 'झुकने से इंकार कर रहा था । देखा और सोचा जाये तो बात इतनी बड़ी भी नहीं थी। गर्वित अपने किये की क्षमा मांग लेता और रूही को घर ले आता किन्तु एक ठाकुर एक औरत के सामने कैसे झुके ? जो उसके भाईयों की मौत का कारण बनी हो। वो उस झूठी माँ को कैसे क्षमा करे ? जो दूसरे नाम से ,दूसरे रूप में उससे संबंध बनाती है। शायद रिश्तों की आड़ में उसे कमज़ोर बनाना चाहती थी। उसके बच्चों की माँ को तो दंड दे ही नहीं सकता किन्तु एक पति उसके फ़रेब के लिए उसे कैसे क्षमा कर दे ?
''पासा पलट गया था''ये सब तो रूही ने सोचा ही नहीं था। पार्वती का समझाना भी व्यर्थ रहा ,रूही के शब्दों का सार समझकर भी गर्वित ने उन्हें अनदेखा किया। यहां गर्वित को लोगों की परवाह नहीं थी किन्तु हवेली की मान -मर्यादा ,रिश्तों का दर्द ,एक पुरुष का आत्मसम्मान ,ठाकुर ख़ानदान का स्वभिमान सब दांव पर लगा था।
इन सबमें प्यार की महक कहीं खो गयी थी ,वो नाजुक़ सा रिश्ता प्रगाढ़ बनने से पहले ही दम तोड़ रहा था। अपराध तो हुए हैं ,दोनों तरफ से ही अपराध हुए हैं किन्तु किसका, कितना जघन्य अपराध है ? यह कोई तय नहीं कर पा रहा था।यह सुनिश्चित कौन करे ?गर्वित चाहता तो घरवालों को रूही के विषय में बता सकता था,जो भी होगा, देखा जायेगा किन्तु उस दर्द को वो अपने में ही समेटे हुए था।
एक दिन रूही बगीचे में पौधों को पानी दे रही थी तभी पीछे से आकर कोई उससे लिपट गया रूही ने मुड़कर देखा, उसका बेटा था ,न जाने, मन में कैसी हिलोर सी उठने लगी थी ? समझदारी से काम ले रही थी। वह रोना नहीं चाहती थी। न ही रो रही थी किंतु आंसू न जाने क्यों अपने आप ही बाहर आ रहे थे बहे जा रहे थी।
इतने दिन हो गए ,तुम्हें मम्मी की याद नहीं आई ,रूही ने रोते हुए पूछा।
मैं तो रोज कहता था, बहुत दिनों से ठीक से खाना भी नहीं खाया। पापा काम में व्यस्त रहते हैं ,हमें यहां कौन लाता ?अब हम आपको यहां छोड़कर नहीं जाएंगे, आपको अपने साथ लेकर जाएंगे। उसका छोटा बेटा रोने लगा।
तभी उसे सामने से गर्वित आता हुआ दिखाई दिया। उसको देखकर वह फिर से शांत हो गई ,जैसे ठोस पत्थर हो गई हो उसके समीप आकर गर्वित बोला- क्या तुम्हें एक बार भी अपने घर की याद नहीं आई जो भी गलतियां हुई हैं उनकी मैं, तुमसे क्षमा मांगता हूं और अब तुम अपने घर वापस चलो !मैं ,तुम्हें लेने आया हूं।
ए .....क्या कर रही है ? मेरे बेटे से लिपटकर क्यों रो रही है ?एक तेज स्वर से उसका ध्यान भंग हुआ। उसने देखा उसकी गोद में किसी और का बच्चा था जिसे वो सीने से लिपटाये रो रही थी।जैसे उसका कोई स्वप्न टू टा,उसने तुरंत ही उस बच्चे को छोड़ दिया।
अरे यह तो हवेली वालो की बहू है, यह तो बहुत दिन से यही रहती है। क्या हवेली वालो ने इसे, हवेली से बाहर निकाल दिया।
बेचारी क्या करें ?इसे अपने बच्चों की याद आती होगी इसीलिए इसके बच्चे को अपना समझकर उससे लिपट कर रो रही थी।
बहन ! कुछ भी नहीं हुआ है, यह एक भली औरत है। हम इसके विषय में ज्यादा तो नहीं जानते किंतु न जाने क्यों ? हवेली छोड़कर यह यहां रह रही है।
अरे !हवेली छोड़कर भी कोई 'आश्रम' में रहता है, अवश्य ही उन्होंने, इसे उस हवेली से बाहर निकाल दिया होगा। रूही घबराकर अपने कक्ष में चली गयी।आज न जाने उसे क्या हो गया था ? जब उसने अपने परिवार और हवेली का त्याग किया था। तब ऐसे विचार उसके मन में नहीं थे किन्तु समय बीतते -बीतते उसे अपने बच्चों की याद सताने लगी।
