हवेली में पहुंचते ही, सभी घरवालों से गर्वित का सामना हुआ और उन्होंने गर्वित से पूछा- रूही कहां है ? उस समय पार्वती भी हवेली में ही थी। इस तरह बच्चों के साथ गर्वित को अकेले आते हुए देखकर उससे पूछा -जीजा जी ! रूही कहां रह गई ? क्या वह मौसी -मौसा जी के पास रह गई ?
नहीं, वह आश्रम में गई है,संक्षिप्त सा जबाब दे गर्वित अंदर चला गया।
आश्रम में ! क्या इन दोनों के मध्य कुछ हुआ है ? पारो मन ही मन सोचती है।
गर्वित के व्यवहार को देखकर तो यही लगता है , कुछ तो हुआ है ,दमयंती जी बोलीं,तब उन्होंने गर्वित के पास जाकर पूछा -वो आश्रम में क्यों रह गई ,उसने हमसे तो कुछ नहीं कहा। वो तो अपने घरवालों से मिलने ही तो गयी थी फिर आश्रम में कैसे रह गयी ?
उसकी इच्छा थी ,वो कुछ दिन वहीँ रहना चाहती है,गर्वित को समझ नहीं आ रहा था कि वो क्या करे ?क्या घरवालों को उसकी सम्पूर्ण सच्चाई बता दे ?
क्या उसे हवेली में वापस नहीं आना है ? अब गर्वित घर वालों से कैसे कहे, कि आज उसका सामना एक कितनी बड़ी सच्चाई से हुआ है ?यदि ये लोग सुनेंगे, तो यह बात बर्दाश्त भी नहीं कर पाएंगे। वह क्या कहे ?कुछ समझ में नहीं आ रहा था। तब बोला - हां, वह कुछ दिन आश्रम में रहना चाहती है ,हो सकता है ,कुछ दिन शांति से जीना चाहती हो।
यहाँ किसने उसे अशांत किया हुआ है ? क्या वो नहीं जानती है ,उसके ऊपर कितनी ज़िम्मेदारियाँ हैं ?उसके छोटे बच्चे हैं, उसका पति है।
उसके लिए पति और बच्चे कहाँ महत्व रखते हैं ,मन ही मन सोच व्यंग्य से गर्वित मुस्कुराया।
क्या तुम, मुझसे कुछ छुपा रहे हो ,उसकी आँखों में झाँकने का प्रयास करते हुए दमयंती ने पूछा।
नहीं ,मैं क्या छुपाऊंगा ?हम आश्रम में गए और उसका मन वहीं रम गया ,कहने लगी -'तुम लोग जाओ !
दमयंती के चले जाने पर पारो चाय लेकर आई और पूछा -जीजा जी ! क्या कुछ बात हुई है ? उसके परेशान चेहरे को देखते हुए पारों ने पूछा।
नहीं, नहीं ऐसी कोई बात नहीं है।
अवश्य ही कुछ बात कुछ तो है ,क्या शिखा ने कुछ कहा है ?
अभी गर्वित ने चाय का घूंट भरा ही था ,उसको खांसी आ गयी।
आराम से ,उसकी पीठ थपथपाते हुए ,पारो ने कहा।
क्या तुम.....
हाँ ,मैं सब जानती हूँ ,उसने यहाँ दुःख और परेशानियां तो झेली ही हैं ,क्या आपको नहीं लगता ? वो अपनी जगह सही है ?
पारो के प्रश्न पूछने पर ,तभी तो ,इस हवेली के लोग, अपने कर्मों की सजा भुगत रहे हैं ,गर्वित ने कहा।
जो हो गया, उसे भूल जाइये !ये कहना, कितना आसान है ?किन्तु भूलना क्या, उतना ही सरल है ?
तुम्हारी बहन भी तो नहीं भुला पाई।
जो झेलता है ,दर्द तो उसी को होता है ,भुलाना न भुलाना इस बात पर निर्भर करता है कि ज़ख्म कितना गहरा है ? तन पर जख़्म हो तो, कुछ समय लेता है किन्तु यदि मन पर जख़्म हो तो ,रह -रहकर उभर आता है। ख़ैर छोड़िये ! जिसने जो किया ,उसको उसके अपराध की सज़ा मिल ही गयी।
क्या अपराधी वही दोनों थे ? गर्वित ने उसकी तरफ देखकर पूछा।
नहीं ,किन्तु सबको सुधरने का एक मौका तो मिलता है ,कोई सुधरना ही न चाहे ,तब क्या ?उन्हें पहले अपराध का दंड नहीं मिला था। उन्हें तुरंत किये अपराध का दंड मिला था।
तब गर्वित को स्मरण हो आया ,उसने भी यही कहा था। वो इतने दिनों मेरे साथ रही ,हर रात उस रात्रि को सोच, मरती रही होगी। मैंने भी उसके साथ कोई अच्छा तो नहीं किया , फिर भी मुझे उस पर क्रोध क्यों है ?
गर्वित को सोचते देखकर पूछा - अब उसने ऐसा क्या कर दिया ? परेशान होते हुए पारो ने प्रश्न किया।
उसने कुछ नहीं किया है , उसने आज मुझे अपना असली परिचय दिया है , उसने मेरा भ्रम तोड़ दिया है।
भ्रम कैसा ? ये उसके जीवन की सच्चाई है ,आप उसके दर्द को महसूस कर सके ,क्या आपने उसे समझा कि उसने कितना झेला होगा ? वो मरकर दुबारा जी है ,वो जी रही है किन्तु उसे कोई लालच नहीं,न ही धन का ,न ही किसी के प्रति मोह ! उसके अंदर की जिजीविषा समाप्त हो चुकी है। जिस परिवार में आई ,अपमानित हुई। क्या उस परिवार से बदला लेने का उसका हक़ नहीं बनता है ,वो अपने अपराधियों को दंड दे।
''किसी के भी विषय में उचित -अनुचित कहने से पहले आप अपने आपको उस स्थान पर रखकर देखिये ! उस परिस्थिति में आप क्या करते, जब आपकी जान पर बन आती ? तभी आप सही न्याय कर पाएंगे।'' उसने बदला लिया किन्तु उसे ,उनके जाने का दुःख है। तभी तो उसने इतने दिनों तक आपके साथ रहना स्वीकार किया। इस ख़ानदान के वारिस जो उन्हें लौटा दिए। जब आप वापस आ रहे थे ,तब क्या उसने कुछ कहा ?
नहीं ,गाड़ी से उतरी और चली गई।
क्या उसकी सच्चाई जानने के पश्चात भी, आपको उससे प्यार है ?
गर्वित सोच में पड़ गया ,जैसे वह अपने अंदर उसका प्यार ढूंढ़ रहा हो।
जब इतना सोचना पड़ जाये ,तो क्या कह सकते हैं आपके पास अभी भी समय है। आप अपने से पूछ सकते हैं। जो उसने किया क्या वो सही था ,या जो हमने किया क्या वो सही था ? आपने रूही से प्रेम किया ,क्या वो प्रेम शिखा के नाम जुड़ जाने से कहीं खो गया ? स्वार्थ तो सभी का जुड़ा था। हम किसी एक को दोष नहीं दे सकते। आप स्वयं ही सोचिये ! उसके लिए कितना कठिन रहा होगा ?अपने ही बलात्कारियों के घर में दुबारा जाना ,उनसे संबंध बनाये रखना। अच्छा अभी मैं चलती हूँ ,सुमित भी आ गया होगा।
गर्वित चुपचाप उसे जाते हुए देखता रहा ,दुविधा में फंसा उसका मन कोई निर्णय नहीं ले पा रहा था। एक तरफ उसने मेरे भाइयों को मारा है ,वो इतनी कठोर कैसे हो सकती है ?मन किया ,उसे लेजाकर पुलिस के हवाले कर दे ! उसने तीन -तीन हत्याएं की हैं। किन्तु मैं पुलिस में जाकर क्या कहूंगा ?मेरी पत्नी को गिरफ़्तार कर लीजिये !उसने मेरे भाईयों को मारा है। नहीं ,मैं उसे क्षमा नहीं कर सकता। उसका उद्देश्य मेरे घर को बर्बाद करना था।
क्या गर्वित रूही की सच्चाई जानकर उसको क्षमा कर पायेगा ? उसको घर वापस लाएगा या फिर उसे जेल भेज देगा आइये अगले भाग में मिलते हैं।
