प्रियंका ! ठीक से बैठो ! क्या तुम्हें ठीक से बैठने का तरीका नहीं आता, यह किस तरह से बैठी हो? क्या कुर्सी पर इस तरह से बैठते हैं ? अपनी फ्रॉक ठीक करो ! दादी ने प्रियंका को डांटते हुए ,उसकी माँ मनोरमा को पुकारा - मनोरमा ! तुमने अपनी बेटी को कुछ सलीक़ा सिखाया भी है या नहीं। यह देखो !किस तरीक़े से बैठी है ? क्या लड़कियों का इस तरह बैठना ,शोभा देता है ? कुछ दिनों के लिए दादी गांव से उनके पास रहने आई हैं। यह देखो ! किस तरह से बैठ रही है ?
दादी की बातें सुनकर प्रियंका थोड़ी नाराज हो गई और बोली -दादी ! मैं अपने घर में ही तो हूं, और किस तरह से बैठूँ ? मुझे तो इस तरह बैठने से आराम मिल रहा है। आप भैया को देखो !वो भी तो इसी तरह से ही बैठा है ,उसे तो आपने कुछ नहीं कहा।
वह लड़का है, किंतु तुम लड़की हो, तुम्हें मर्यादा में रहना चाहिए ,उठने -बैठने का तरीका आना चाहिए।अब तुम बड़ी हो रही हो। लड़कियों को अनुचित तरीके से बैठना -उठना शोभा नहीं देता।
अच्छा भैया, करे तो ठीक !और मैं करूं तो गलत ! प्रियंका मुंह बनाते हुए बोली।
जब तुम्हें समझाया जा रहा है ,तो तुम उनकी बातों पर ध्यान क्यों नहीं दे रही हो ? किस तरह से दादी से बात कर रही हो ?मनोरमा अंदर से आकर प्रियंका को डांटते हुए कहती हैं ।
लड़कियों का इस तरह से ज्यादा बोलना भी उचित नहीं है ,मनोरमा ! तुम अपनी बेटी को क्या 'संस्कार' दे रही हो ? क्या तुम नहीं जानती हो, कि इसे अगले घर भी जाना है, वहां क्या इस तरीके से ही अपनी सास से ज़बान लड़ाएगी ? तब इसकी ससुराल वाले क्या कहेंगे ?लड़की को थोड़ी भी शिष्टता नहीं सिखाई है।
तो क्या दादी, संपूर्ण शिष्टता का भार हमें ही संभालना होता है। भइया ,कैसे भी रहे ?इसे कोई कुछ नहीं कहता बिफरते हुए प्रियंका बोली।
यदि वो गलत होगा,तो उसे भी कहा जायेगा किन्तु बेटियों का थोड़ा सा ज्यादा ध्यान रखना पड़ता है। यदि घर में गृहणी शिष्ट होगी तो सभी लोग शिष्टाचार में रहेंगे , इसीलिए पढ़ी-लिखी, और सभ्य -संस्कारी वधु ढूंढते हैं।
हँसते हुए मनोरमा बोली -तुम्हारे भाई को हम क्या सिखाएंगे ? जब वो सुसंस्कारी वधु हमारे घर में प्रवेश करेगी, तो वो अपने आप ही इसे सब सीखा देगी।
दादी चश्में में से झांकते हुए ,मुस्कुराई और बोलीं -जिस तरह तेरी माँ ने तेरे पापा को आज्ञाकारी बना दिया।
सास की बात सुनकर मनोरमा जी थोड़ा गंभीर हो गयीं और अंदर चलीं गयीं। माँजी !ये ऐसे नहीं हैं ,इन्होने मुझसे कुछ नहीं सीखा ,न ही मैंने सिखाया। ये तो मेरी सुनते ही कहाँ हैं ?शायद उन्होंने बेटी के सामने सास से ज्यादा कुछ कहना उचित नहीं समझा।
तब दादी बोलीं - इसीलिए तुम्हारा सीखना ज्यादा जरूरी है। इस दुनिया में कोई तो होगी ,जो अपने बेटे के लिए संस्कारी बहु की प्रतीक्षा में होगी। जब तुम्हें स्वयं ही कुछ नहीं आता , तब तुम किसी दूसरे को कैसे समझा सकती हो ? क्या गलत है ,क्या सही है, तब तुम क्या सोचती हो ?
तुम्हारी मम्मी भी तो ऐसे ही रहती थी,बड़े अच्छे तरीक़े साड़ी पहनना , उठने - बैठने का तरीक़ा किस तरह से किससे कैसे बात करती है ? इसे सब आता था किंतु यह देखो !तुम्हारे प्रति कितनी लापरवाह हो गयी है ?
मान लो ! दादी ! मैं अपने संस्कार लेकर , किसी दूसरे परिवार में जाती हूं और उन लोगों में वह संस्कार ना हुए तो तब तो मुझे, उनके तरीके से ही तो काम करना होगा तो फिर अभी से ये सब सीखकर क्या करना है ?
ऐसा कौन सा परिवार हो सकता है ?
हर परिवार की एक अपनी अलग पहचान होती है, मैं यहां पर सभी 'संस्कार' सीखकर जा रही हूं और बाद में पता चला मेरी ससुराल के लोग 'असंस्कारी' हैं, 'अभद्र शब्दों ' का प्रयोग करते हैं। तब क्या मेरे ये संस्कार मेरे काम आएंगे। मुझे उन लोगों के साथ रहना है, उनके साथ जीवन व्यतीत करना है और उनसे, निभाने के लिए मुझे उनकी भाषा का ही प्रयोग करना होगा या तो फिर मैं अपने संस्कार छोड़ उनके वातावरण में अपने को ढाल लेती हूं। इसे आप क्या कहेंगी ? क्या मेरे संस्कार वहां काम आ पाएंगे ?
यह लड़की भी न.... कितनी बोलने लगी है ? शिक्षा का अर्थ यह नहीं, कि तुम अपने बड़ों से जबान चलाओ।उनकी अवज्ञा करो !
किंतु दादी शिक्षा का अर्थ यह भी तो है कि तुम उचित -अनुचित पर अपनी बात उठाओ !
मैं एक संस्कारी परिवार की लड़की होकर बाहर नौकरी करने जाती हूं, और उसके परिवार वालों ने जिस तरह से आप भैया को किसी भी बात के लिए नहीं रोकते -टोकते हैं ,उसी तरीके से किसी ऐसे ही असभ्य लड़के से मेरा सामना होता है। तब क्या मैं उसके सामने अपनी संस्कारों की पोटली लिए बैठी रहूंगी ?मुझे उसकी भाषा में ही उसे जवाब देना होगा।
संस्कार क्या महिलाओं के लिये ही होते हैं ? आपने कह दिया कि वह तो लड़का है तो क्या लड़कों में संस्कार नहीं होने चाहिए > सभी संस्कारी लड़की ही ढूंढते हैं , किंतु संस्कारी लड़का क्यों नहीं ढूंढते ? उसकी नौकरी देखते हैं, उसका घर -परिवार देखते हैं किंतु उनके संस्कार नहीं देखते।
ऐसा नहीं है, सभी चीजें देखी जाती हैं। इंसान का स्वभाव भी तो इस पर इस बात पर निर्भर करता है कि वह किस प्रकृति का इंसान है ?कई बार ऐसा हो सकता है कि वह संस्कारी और सभ्य परिवार से है। किंतु उसकी'' मित्र मंडली'' असभ्य हो और गलत चीजें तो इंसान बहुत जल्दी सीखता है।
अच्छी चीजों को सीखने में समय भी लगता है और पहली बात तो कोई सीखना भी नहीं चाहता, मनोरमा ने कहा। अब तुमसे दादी ने इतना ही तो कहा था -ठीक से बैठो ! किन्तु तुमने ठीक से बैठने से पहले दादी से कितनी बातें कहीं ,भाई का उदाहरण दिया। क्या तुम बिना कुछ बोले ,ठीक से नहीं बैठ सकती थीं। इसीलिए तो कहा -अच्छी चीजों को सीखने से पहले ,इंसान उसे उचित -अनुचित के तराजू में तौलने लगता है। ये मुझसे ही कही ,किसी दूसरे से क्यों नहीं कही ?अरे !पहले तुम तो उस राह को अपनाओ !बाद में दूसरे को भी देखेंगे।
ये ही चीजें सीखानी पड़ती हैं ,किसी को गाली देना ,शराब -सिगरेट पीना ,सट्टा बहुत से ऐसे कार्य हैं ,जो बच्चा अपने आस -पास के वातावरण ,या फिर दोस्तों से स्वतः ही सीख जाता है। उन्हें परिवार में नहीं सीखता।
ऐसा नहीं है, हम तुम्हारे भाई से कुछ नहीं कहते हैं ,किंतु तुम्हारा विशेष रूप से ध्यान रखना पड़ता है, क्योंकि तुम्हें, दूसरे घर भी जाकर, अपने संस्कारों द्वारा ही, उस परिवार को संभालना है। संस्कार तो सभी के लिए होते हैं , और यदि बच्चा लड़का हो या लड़की' असंस्कारी' है ,तब उसके माता-पिता को ही कहा जाता है।
