खाना, खाने के बाद सलमा, अपने शोेहर युसूफ मियां के करीब आकर बैठ गई। सुबह का माहौल तो बहुत ही ग़मगीन रहा ,इसीलिए तो यूसुफ़ घर से बाहर निकल गए थे। बेग़म को समझा नहीं सकते थे। जब तक ख़ुद को समझा न लें। उन्हें बेटी के रिश्ता टूट जाने का ग़म तो है ही ,थोड़े आसूं बहा लेंगी, तो मन हल्का हो जायेगा। उनकी उम्मीदों पर पानी जो फिर गया था। शाम को जब अपने घर में आये तो वहां का माहौल काफी कुछ बदला हुआ था। सुबह तो सलमा रो रही थी और रुकैया को कोस रही थी, किंतु अब अपने चेहरे पर मुस्कान लाकर युसूफ मियां से बोली -मैं एक बात कहना चाहती हूं ? कहते हुए उसने पान की तश्तरी उनके सामने पेश की।
उन्होंने उस तश्तरी में से वह पान उठाया और मुंह में रखते हुए बोले -बोलो, बेगम ! क्या कहना चाहती हो ?
मुझे लगता है, अभी यह बात ज़माने में फैली नहीं है, इससे पहले कि सब लोगों को पता चल जाए कि रुकैया ने, जीनत से रिश्ते के लिए इंकार कर दिया है ,उससे पहले ही, आप जाकर अपने भाई जान से मिल लीजिए ! उनका बेटा ख़ालिद है न.... वह तो पहले से ही अपनी ज़ीनत को पसंद करता है।
जब आप रिश्ता लेकर जाएंगे, तो वह भी खुश हो जाएगा, और बात घर की घर में ही दबी रह जाएगी किसी को पता भी नहीं चल पाएगा कि क्या हुआ था ? क्या नहीं।
यूसुफ मियां ,अपनी बेग़म की तरफ देख रहे थे ,वाह री ,नारी !अब तक जो लड़का तुम्हें पसंद न था ,आज अच्छा लगने लगा है। उसमें सौ बुराइयां थीं और आज उसी के लिए रिश्ते की बात कर रहीं हैं। क्या करें मज़बूरी जो ठहरी अब बात आन पर जो आ गयी हो। तुम दरिया हो, बहना तुम्हारा काम है ,राह निकाल ही लेती हो। ये बात तो मेरे दिमाग में आई ही नहीं.... सोच रहा था ,अब क्या होगा ? मेरा दिमाग़ तो जैसे सुन्न ही पड़ गया था। इतनी ग़मी में भी ,ये सोच रहीं थीं।
क्या सोच रहे हैं ?
बात तो तुम, ठीक कह रही हो, किंतु क्या भाई जान इस बात को मानेंगे ? क्योंकि मैं, उनसे पहले ही कह चुका हूं, रुकैया के साहबजादे से , अपनी ज़ीनत की बात चल रही है।
बात ही तो चल रही है, अभी हमने कौन सा रिश्ता पक्का कर दिया है ? वह इन शब्दों के फेर से अपने आप को भी समझा रही थी और यूसुफ मियां को भी समझा रही थी।
वैसे तो बात सही है, किंतु मुझे नहीं लगता उनका वह ''साहबज़ादा ख़ालिद '' मानेगा,वो तो गुस्से से भरा बैठा होगा और उसकी अम्मी 'ज़ोया 'क्या वो मानेगी ?
क्यों, वह तो उसे बहुत पसंद करता है, क्यों नहीं मानेगा ? आप समझाइएगें तो ज़रूर मानेगा, आप उसके चचाजान हैं ,अपनी ज़ीनत के लिए उसकी अम्मी को भी झेल लूंगी। क्या करें ?मजबूरी जो ठहरी ,उन लोगों से ताल्लुक़ात तो बढ़ाने पड़ेंगे।
ख़ालिद सब जानता है किंतु चिढा हुआ होगा ,उस समय तो हमने मना कर दिया था अब हम'' किस मुंह से उनके घर जाएं ?'' युसूफ मियां सोच रहे थे, किस तरीके से उनसे मिलने का बहाना खोजें !
क्या मैं, उन लोगों को खाने पर बुला लूं ?
क्या ?उन्हें ताज्जुब नहीं होगा, आज तक तो उन्हें खाने पर नहीं बुलाया और अब अचानक से कैसे खाने पर बुला रहे हैं ? कोई त्यौहार भी नहीं ....
क्या उसकी अम्मी आ जाएगी ? उससे तो तुम्हारी पटती ही नहीं थी।
मैं जानती हूं किंतु ज़ीनत के लिए मैं, कुछ भी करूंगी,आपसे कह तो दिया, उसे भी झेल लूंगी। बस एक बार इस रिश्ते के लिए ख़ालिद मान जाए और हमारी बेटी इज्ज़त से रुख़सत हो जाये और हमें कुछ नहीं चाहिए। दिल पर बहुत बड़ा बोझ है , यदि इसकी उम्र बढ़ गई , तो फिर रिश्ते भी न आएंगे और एक बार रिश्तेदारियों में, यह बात फैल गई फिर कोई रिश्ता लेकर भी नहीं आएगा। सब लड़कियों पर ही तोहमत लगाते हैं। कहेंगे,' लड़की में ही कोई कमी रह गई होगी इसीलिए रिश्ता टूटा।''
आप एक बार अपने गुरूर को छोड़कर उनसे मिल लीजिए।
चलो! बेगम देखता हूं ,इसमें ग़ुरूर कैसा ?वो मेरे भाईजान हैं ,उन पर मेरा अधिकार बनता है। अब तुम सुकून से सो जाओ ! कल की कल देखेंगे ! यूसुफ साहब तो कुछ देर के बाद ही ख़र्राटे भरने लगे।
किन्तु अपने शोेहर के कहने पर सलमा को एक उम्मीद जाग उठी ,अब उसे नींद कहाँ ?ख्यालों का बवंडर उसके दिलो -दिमाग़ पर छा रहा था और मन ही मन सोच रही थी, काश ! के हमने यह रिश्ता पहले ही ले लिया होता तो हमें इस रुकैया के कारण, इतनी ज़िल्लत तो न झेलनी पड़ती। मैंने युसूफ मियां से कह तो दिया है, कि आप उनके पास जाइए ! शक तो उन लोगों को भी होगा। हो सकता है,वो थोड़ी आनाकानी करें ,करने दो !उनका भी हक़ बनता है। पहले तो वही रिश्ता लेकर आये थे। अब हम चले जायेंगे ,तो क्या तौहीन हो जाएगी ? छोटी -छोटी बातों को दिल से नहीं लगाना है।
मेरी ही बुद्धि भ्र्ष्ट हो गयी थी ,जो रुकैया के साहबज़ादे के कारण, इतने दिनों तक बैठी रही ,बग़ल में हीरा था ,उसे परख़ न सकी। अपने ख़ालिद मियां क्या कम कमाते हैं ? अपनी ज़ीनत भी अपने नजदीक ही रहेगी। देर -सबेर मिल लिया करूंगी। बेकार में ही ,रुकैया के दिखाए सब्ज़बाग में खो गई थी ,भूल गयी थी ,उससे क़रीबी रिश्ते तो हमारे क़रीब ही हैं। अब तो किसी भी तरह से रिश्ता हो जाए बस यही उम्मीद है। सोचते हुए सलमा सो गई।
अगले दिन युसूफ मियां अच्छे से तैयार हुए, और वाहिद भाई जान के यहां जाने के लिए निकल पड़े।
अरे कुछ खाकर तो जाइए ! इतनी सुबह भी नहीं जाना है।
बेग़म ! तुम मुझे टोको मत ! थोड़ी हिम्मत सी आई है ,जरा भाई जान से मिलकर आता हूं। आकर ही खाऊंगा।
युसूफ मियां, अच्छे से तैयार होकर अपने भाईजान के घर की तरफ निकल गए। भाई जान तो घर के बाहर चबूतरे पर ही बैठे थे और अखबार में नज़रें टिकाये खबरें पढ़ रहे थे।
आदाब , भाई जान ! कहते हुए युसूफ मियां ने उनकी तरफ देखा।
वाहिद ने लापरवाही से उन्हें देखा ,और बोले -आदाब ! आज इधर कैसे आना हुआ ?
यहीं मुझे किसी काम से जाना था, काम के सिलसिले में किसी से मिलना था , रास्ते में ही आपका घर पड़ गया। मैंने सोचा ,अपने भाई जान ! से भी मिल लेता हूं ,शब्दों में मिश्री घोलते हुए बोले।
वाहिद के मन में गुस्सा तो था किंतु न जाने क्या सोचकर युसूफ मियां से बोले - तशरीफ़ ले आओ ! यूसुफ़ इसी बात के इंतजार में ही तो था,तुरंत ही आगे बढ़े और वहां पड़े मूढ़े पर बैठ गए।
उनके मूढ़े पर बैठते ही वालिद ने पूछा और सुनाओ ! सब कैसा चल रहा है ? कारोबार में कैसा चल रहा है ? कुछ तरक्की हुई ?
बहुत ही मंदा चल रहा है, क्या करें ? बाजार बहुत ही मंदा है बहुत कम ही ख़रीददार आ रहे हैं। सोच रहा हूं किसी तरह से ज़ीनत का निक़ाह हो जाए और वो अपनी ससुराल रुख़सत हो जाए। तो सुकून से रह सकूंगा , फिर मुझे कोई फिक्र नहीं होगी।
