Khoobsurat [part 145]

कल्याणी जी ,अपनी बेटी से मिलने के लिए उतावली हो रहीं थीं ,उससे पहले जब शिल्पा को पता चलता है ,कि कल्पित पुलिस का ही आदमी है और ये उपहार खरीदने के बहाने से, मुझे यहाँ लाया है। तब उसे बहुत दुःख होता है और सोचती है - इतनी दिक़्कतों के पश्चात, मैंने फिर से किसी अनजान पर विश्वास करके एक और सबसे बड़ी गलती कर दी है । मैं ये कैसे भूल गयी थी ? मेरी ज़िंदगी में विश्वसनीय लोग हैं ,ही नहीं। मैंने अपनी गलती से अपनी ही नहीं, मम्मी के लिए भी परेशानी खड़ी कर दी है। 

 तब वह घूरते हुए कल्पित से बोली -  मेरे जीवन में धोखेबाज लोग ही लिखे हुए हैं, जिनसे मुझे धोखा ही मिलना है। तुम  पर मैंने विश्वास किया, किंतु तुमने भी मुझे धोखा ही दिया।


सब इंस्पेक्टर चांदनी के सामने वो ,अपनी बात पर अड़ी रही थी,मेरा नाम 'रोहिणी' है और मैं कल्याणी जी की रिश्तेदार हूँ ।उन हत्याओं के विषय में, मैं कुछ नहीं जानती।

जब चांदनी को पता चलता है ,ये कल्पित को एक धोखेबाज़ इंसान समझ रही है ,  तब चांदनी ने कहा - उसने तुम्हें कोई धोखा नहीं दिया है ,वह बस अपना कार्य कर रहा था। कई बार अपने कार्य के लिए ,हमें न चाहते हुए भी.... वो कार्य पूर्ण करना होता है।

 किन्तु मैं तुमसे पूछती हूँ ,-' क्या तुमने लोगों को धोखा नहीं दिया है, तुमने तो लोगों को मारा भी है।  तुमने अपनी सहेली को धोखा दिया है, उसके पति के साथ विश्वासघात किया  है। क्या तुम 'धोखेबाज' नहीं हो , तुम' तमन्ना 'बनकर कलाकृतियां बनाती थीं , अपना नाम छुपा कर रहती थीं , क्या यह धोखा नहीं है ? तुम्हारे एक चेहरे के ऊपर दो-दो चेहरे लगे हैं।  चेहरे पर चेहरे बदल रही हो, तुम तो सबसे बड़ी 'धोखेबाज' हो। 

कभी अपने अंदर झांककर देखा है ,जो दिल  धीरे -धीरे काला होता गया और तुम स्वयं ही प्रेम के रंग 'लाल रंग 'से डरने लगीं हो क्योंकि तुम्हारे अंदर अब शैतान जो निवास करता है। 

तुम कितनी स्वार्थी हो ? तुमने हमेशा अपने लिए ही सोचा ,तुमसे अच्छी तो तुम्हारी वो बहन नित्या है । वो अपने रिश्ते में ,स्पष्ट थी। तुम्हारा भी साथ दिया और तुम्हारे लिए रंजन के प्यार को भी ठुकरा दिया।

क्या यह धोखा नहीं है ? तुम अपना नाम' रोहिणी' बता रही हो।' शिल्पा' तो न जाने कहाँ खो गयी है ?तुम अपने आपको ही भूल गयी हो। वो असली' शिल्पा' कहाँ है ? 

 कोई दूसरा धोखा देता है ,तो तुम्हें दर्द होता है, और जब तुम्हें ,धोखा मिलता है तो तुम, उसकी हत्या कर देती हो।  खून की होलियां खेलती हो। कैसी कलाकृतियां बनाती हो ? हत्या पर हत्याएं  किए जा रही हो , कलाकार रंगों से खेलते हैं, किंतु तुम तो लहू से खेल रही हो। अब हमसे असलियत छुपाने से कुछ भी लाभ नहीं है, क्योंकि तुम्हारी मम्मी ने भी ,अब सब कुछ स्वीकार कर लिया है।

चांदनी की बातें सुनकर दुःख से भरी शिल्पा चीख उठती है -' हाँ, ये सभी हत्याएं मैंने की हैं ,अब मुझे फाँसी पर चढ़ा दो ! मैं अब और जीना ही नहीं चाहती कहते हुए रोने लगी। मैं ही शिल्पा हूँ ,मैं ही तमन्ना ,यामिनी भी मैं ही हूँ और अब' रोहिणी' बनकर एक घुटनभरी ज़िंदगी जी रही हूँ। मैंने अपने पति रंजन को भी मार दिया और उस धोखेबाज़ कुमार का भी सिर फोड़ दिया। कोई भी मेरे सामने आएगा, झूठ बोलेगा। मैं उसे नहीं छोडूंगी। मैंने बहुत धोखे खा लिए किन्तु अब और नहीं, कहते हुए गुस्से से उसकी आँखें लाल हो गयीं। कहते -कहते बड़े जोरो से हंसने लगी। किसी को नहीं छोडूंगी ,किसी को नहीं छोडूंगी। 

ए....!शांत रहो ! अपने डंडे को मेज पर पीटते हुए चांदनी बोली -  यहाँ ये ड्रामा मत करो ! तुम्हारी माँ तो कह रही है - ये हत्याएं उसने की हैं। 

चांदनी की बात सुनकर शिल्पा चौंक गयी कुछ देर आँखें मूंदकर शांत बैठी रही ,शायद अपने को शांत  करने का प्रयास कर रही थी ,और तब बोली - मम्मी ,क्या मम्मी यहाँ आईं हैं ? वे मुझे बचाने के लिए झूठ बोल रही हैं। ये सभी हत्याएं मैंने ही की हैं ,लगभग अपने शब्दों पर जोर देते हुए वो बोली। 

सब पता चल जायेगा ,किसने क्या किया है ?अभी तो तुम कुछ देर पहले  कह रहीं थीं' कि कल्याणी जी तुम्हारी रिश्तेदार हैं , वो अब मम्मी कैसे बन गयीं ?''

आप अब सब कुछ जान और समझ ही गईं हैं, तो मुझसे क्यों पूछ रहीं हैं ?हताश रोहिणी ,चांदनी से बोली। 

जब कल्याणी जी के सामने रोहिणी को लाया जाता है ,तब वे भी रोहिणी को अपनी बेटी मानने से इंकार कर देती हैं। 

तब चांदनी,कहती है -अब ज़्यादा नाटक करने की जरूरत नहीं है ,रोहिणी भी स्वीकार चुकी है ,तुम उसकी माँ हो, यानि कि यही शिल्पा है। अब तुम दोनों यहीं बैठकर योजना बना लो !अब आगे क्या करना है ?जेल जाना है या हमें सम्पूर्ण सच्चाई बतानी है। वैसे कल्याणी जी और तुम [रोहिणी की तरफ देखते हुए ]बोली - तुम दोनों ने ही स्वीकार किया है ,अब एक साथ बैठकर सोच लो ! किसने किसका खून किया ?कहकर चांदनी  उन दोनों माँ -बेटियों को वहीं छोड़कर उस कक्ष से  उठकर बाहर आ गयी। 

और बाहर आकर इंस्पेक्टर तेवतिया और कुणाल दोनों से बोली -दोनों ने अपना-अपना  अपराध स्वीकार कर लिया है। 

कैसे ? क्या ये हत्याएं दोनों ने मिलकर की हैं। 

मिलकर तो नहीं कह रही हैं ,माँ कह रही है ,मैंने खून किया ,बेटी कह रही है ,ये हत्याएं मैंने की हैं। होठों  को बिचकाते हुए ,चांदनी बोली -थक गयी ,यार ! चाय मंगवा दो ! दोनों की कहानी सुनते -सुनते दिमाग़ भी थक गया है। अब ये और नई समस्या सामने आ गयी है। वास्तव में हत्या किसने की है ?

 माँ ने जो कुछ भी बताया,उसके आधार पर माँ ने हत्या की है किन्तु अब बेटी भी चीख रही है ,हत्याएं मैंने की हैं ,माँ झूठ बोल रही है या फिर बेटी ! या फिर दोनों एक -दूसरे को बचाने का प्रयास कर रहीं हैं।  

हाँ ,ये सम्भव हो सकता है ,अपनी बेटी को बचाने के लिए, उसने ऐसा किया हो ,तेवतिया ने कहा। 

हाँ ,ये भी तो हो सकता है ,शिल्पा की मानसिक स्थिति भी ठीक नहीं है और वो अपनी ज़िंदगी को समाप्त कर देना चाहती हो इसीलिए ये हत्याएं स्वीकार कर रही है। 

 चाय के घूंट भरते हुए ,तब चांदनी कहती है ,चाय पीकर दिमाग़ एकदम ताज़ा हो जाता है। तब आगे बोली -इसीलिए तो मैंने इन दोनों माँ -बेटियों को एक साथ एक ही कक्ष में छोड़ दिया है। आइये !चलकर आँखों देखा हाल देख लेते हैं। पता तो चले ,इन दोनों के मन में क्या है ? बाहर स्क्रीन पर वे दोनों माँ -बेटियों को देख रहे थे। 

मम्मी !आपने ये सब स्वीकार कैसे किया ? इतने दिनों से ये लोग हमें नहीं पकड़ पाए ,अब कैसे ? आपने अपनी उम्र और बीमारी देखी है। आप यहाँ कैसे आईं ?

ये तुम मुझसे पूछ रही हो ,नाराज होते हुए कल्याणी जी ने पूछा -तुम यहाँ कैसे ?मुझे तो लगता है ,इन लोगों को हम पर शक हो गया या फिर इनसे केस सुलझ नहीं रहा था इसीलिए ये धोखे से मुझे यहाँ ले आये किन्तु तुम यहाँ कैसे आईं ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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