Mujhe manjur nhi

माना कि, मुझे तुझसे कुछ शिक़वे थे ,कुछ शिकायतें थीं।

 तेरा इस कदर मुंह मोड़ कर चले जाना मुझे मंजूर न था। 

माना कि, जब हम मिले थे, तुमसे चाहा, तुम बस मेरे रहो !

तेरा, इस कदर मुझसे, बेपरवाह हो जाना मुझे मंजूर न था। 


माना कि, तुम मेरे होकर भी, गैरों में,कुछ रिश्तों बंट गए । 

तुम्हें इस कदर टुकड़ों में बंटते देखना , मुझे मंजूर न था। 

 मैंने,तुमसे क्या मांगा ? एक प्यार की,परवाह की जिद थी। 

तुमने समझा नहीं, नजरभर देखा नहीं,ये मुझे मंजूर न था। 

तुम ही बताओ !  भगवान से शिकायत कौन नहीं करता ?

तुम्हारा रूठना तो ठीक, इस जीवन से जाना मुझे मंजूर न था। 

तुम ही मेरे सब कुछ थे,जीवनाधार थे, तुमने,मुझे समझा ही नहीं। 

तुम्हें, कभी देख न पाऊंगी, 'बिनकहे 'चले जाना मुझे मंजूर न था।

शिकायत तो अभी भी, मुझे तुमसे है ,अकेले छोड़ जाओगे,सोचा न था।

 फेरो पर खाई थी, कसमें वे भी न निभाओगे ,जीते जी दगा दे जाओगे। 

फिर कभी न आओगे ,यह भी मुझे मंजूर न था...मंजूर न था... मंजूर न था।   

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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