माना कि, मुझे तुझसे कुछ शिक़वे थे ,कुछ शिकायतें थीं।
तेरा इस कदर मुंह मोड़ कर चले जाना मुझे मंजूर न था।
माना कि, जब हम मिले थे, तुमसे चाहा, तुम बस मेरे रहो !
तेरा, इस कदर मुझसे, बेपरवाह हो जाना मुझे मंजूर न था।
माना कि, तुम मेरे होकर भी, गैरों में,कुछ रिश्तों बंट गए ।
तुम्हें इस कदर टुकड़ों में बंटते देखना , मुझे मंजूर न था।
मैंने,तुमसे क्या मांगा ? एक प्यार की,परवाह की जिद थी।
तुमने समझा नहीं, नजरभर देखा नहीं,ये मुझे मंजूर न था।
तुम ही बताओ ! भगवान से शिकायत कौन नहीं करता ?
तुम्हारा रूठना तो ठीक, इस जीवन से जाना मुझे मंजूर न था।
तुम ही मेरे सब कुछ थे,जीवनाधार थे, तुमने,मुझे समझा ही नहीं।
तुम्हें, कभी देख न पाऊंगी, 'बिनकहे 'चले जाना मुझे मंजूर न था।
शिकायत तो अभी भी, मुझे तुमसे है ,अकेले छोड़ जाओगे,सोचा न था।
फेरो पर खाई थी, कसमें वे भी न निभाओगे ,जीते जी दगा दे जाओगे।
फिर कभी न आओगे ,यह भी मुझे मंजूर न था...मंजूर न था... मंजूर न था।
