Zindagi

 पल में रुलाती, पल में खुश कर जाती, 

 तितली सी... रंगीन नज़र आती है। 

 कभी लगता , हाथ में आ गई है।

 तो कभी लगता, हाथों से छूट गई है, जिंदगी !


 कभी किस्मत के सहारे,

 तो कभी कर्मों से संवारी है, जिंदगी !

कभी उबड़ -खाबड़ पथरीली सी नजर आती है। 

कभी समतल सी, फिसलती है ,जिंदगी !

कभी दाल में बघार सी महकती नजर आती है, जिंदगी !

कभी परिंदो सी उड़ान भरती है ,

कभी धरती पर रेंगती सी नज़र आती है ,ज़िंदगी !

कभी 'मिर्ची सी 'तीख़ी लगती है,तो कभी ,

चाशनी भरी रसगुल्ले सी मीठी लगती है, जिंदगी !

कभी ग़जरों की महक सी सजीली है ,

 तो कभी कड़वाहट से भरी, बेपरवाह लगती है,ज़िंदगी !

कभी मुस्कुराती ,नाजुक़ सी लगती है ,

तो कभी , काँटों की चुभन सी लगती है , ज़िंदगी  ! 

कभी गुमसुम सी , खोई -खोई ,

तो कभी ,खिलखिलाकर ज़ोर से हंसती है ,ज़िंदगी !

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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