भले ही ,
'फेरों' पर कुछ कदम पीछे चलती हूँ।
तो क्या ?तुमने देखा नही।
कुछ कदम आगे भी तो' धरती ' हूँ।
' धरती' हूँ ,सहन करती हूँ।
मैं ,तुम्हारी 'संगिनी' हूँ ,'सहधर्मिणी' हूँ।
फिर तुम मुझे पीछे क्यों धकेलते हो ?
मुझे छोड़ क्यों ?
आगे बढ़ जाना चाहते हो,''भार्या 'हूँ
मैं अर्धांगनी हूँ , संग चलना चाहती हूँ।
क्यों मुझे ? अज़ीब नजरों से देखते हो।
मेरे आगे, या साथ चलने से ,
क्या तुम्हारा जायेगा ?
मेरा भी मान रह जायेगा। '
मैं तो तुम्हारा सामिप्य ,सानिध्य चाहती हूँ।
इसीलिए साथ चलती हूँ।
अपना छोटा सा सहयोग चाहती हूँ।
तुम्हारे संग चल ,हाथ बंटाना चाहती हूँ।
तुमने, मुझे समझा नहीं।
क्या सोचकर मुझे, पीछे धकेलते हो ?
न जाने , कैसी सहचरी हूँ ?
शायद इन शब्दों को तुमने समझा नहीं ,
फेरों में निभाई ,कसमों को जाना नहीं।
लहूलुहान हो ,'दर्प' तुम्हारा ,
'अहं' तुम्हारा मुझे, आगे बढ़ने देता नहीं।
