Aham

                   भले ही ,

'फेरों' पर कुछ कदम पीछे चलती हूँ। 

      तो क्या ?तुमने देखा नही।  

कुछ कदम आगे भी तो' धरती ' हूँ। 

    ' धरती' हूँ ,सहन करती हूँ। 


मैं ,तुम्हारी 'संगिनी' हूँ ,'सहधर्मिणी' हूँ। 

 फिर तुम मुझे पीछे क्यों धकेलते हो ?

              मुझे छोड़ क्यों ? 

आगे बढ़ जाना चाहते हो,''भार्या 'हूँ  

मैं अर्धांगनी हूँ , संग चलना चाहती हूँ। 

क्यों मुझे ? अज़ीब नजरों से देखते हो।

      मेरे आगे, या साथ चलने से ,

         क्या तुम्हारा जायेगा ?

      मेरा भी मान रह जायेगा।  '

मैं तो तुम्हारा सामिप्य ,सानिध्य चाहती हूँ। 

       इसीलिए साथ चलती हूँ। 

अपना छोटा सा सहयोग चाहती हूँ। 

तुम्हारे संग चल ,हाथ बंटाना चाहती हूँ।

         तुमने, मुझे समझा नहीं।  

क्या सोचकर मुझे, पीछे धकेलते हो ?

       न जाने , कैसी सहचरी हूँ ?

शायद इन शब्दों को तुमने समझा नहीं ,

फेरों में निभाई ,कसमों को जाना नहीं।

       लहूलुहान हो ,'दर्प' तुम्हारा , 

'अहं' तुम्हारा मुझे, आगे बढ़ने देता नहीं। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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