गर्वित के मन में ,बार -बार एक ही प्रश्न उठ रहा था ,आख़िर रूही हमें अपने गांव में लेकर क्यों आई ? सम्पूर्ण सच्चाई अपने घर में अपने माता -पिता के सामने ही क्यों बताई ? तब वापस लौटते हुए ,वह रूही से प्रश्न करता है। क्या ये सभी बातें मुझे तुम पहले नहीं बता सकती थीं ?
नहीं, क्योंकि मैं अपने माता-पिता का अपमान से
झुका सिर नहीं देख सकती थी। मुझे उन्हें बताना था कि उनकी बेटी ने कोई भी ऐसा गलत कार्य नहीं किया है जिससे उनका सिर झुके। वो आज भी ठाकुर परिवार की बहु है ,वो किसी के साथ भागी नहीं थी ,जो कि तुम्हारे घरवालों ने मेरे विषय में झूठ बोला था। उन्हें पता तो चलना चाहिए , वह सब झूठ था और ठाकुर खानदान की सच्चाई भी तो पता चलनी चाहिए थी।'' क्या तुम मुझे कुछ कहना चाहते हो ?''
हाँ ,जब घर में यह बात सबको पता चलेगी, तो क्या होगा ? गर्वित ने उससे पूछा।
मुझे इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता, क्योंकि मैं जानती हूं, वे लोग तो ऐसे ही हैं किंतु मैं तुम्हें एक बात और बताना चाहती हूं। मैं तुम्हारी हवेली में तुम्हारे लिए नहीं, अपने बदले के लिए गई थी। मुझे तुम लोगों से बदला लेना था। मैं चाहती थी, जिस तरह से तुम लोगों ने मुझे तड़पा -तड़पा कर मारने का प्रयास किया था किंतु सफल न हो सके ,इस तरह मैं भी तुम लोगों को तड़पा -तड़पाकर मारना चाहती थी।
फिर क्या तुमने अपना इरादा बदल दिया ?
नहीं, इरादा नहीं बदला था,मैंने अपना बदला लिया , जिसका परिणाम गौरव को और पुनीत को झेलना पड़ा।
गाड़ी अपनी गति से चल रही थी लेकिन जैसे ही, रूही ने कहा।
एकदम से गाड़ी को तेज ब्रेक लगा बच्चे भी घबरा गए ,क्या हुआ ? पापा ! घबराहट से बच्चों का स्वर उभरा।
कुछ नहीं ,शायद कोई पत्थर आ गया ,तुम आराम से रहो ! मैं देखता हूँ ,कहकर गाड़ी से उतरा और रूही से भी गाड़ी से उतरने के लिए कहा। तब गर्वित ने रूही से पूछा -क्या उन दोनों को तुमने मारा....
रूही ने हाँ में गर्दन हिलाई ,उसने आज तो जैसे सच कहने की क़सम खाली है, बेख़ौफ उसने स्वीकार किया। गर्वित आज तक अपने भाई की मौत का ज़िम्मेदार अपने को मान रहा था। उसे लग रहा था ,शायद उसने ही क्रोध में आकर उससे कुछ ऐसी बात कह दी जिसके कारण उसको 'दिल का दौरा 'पड़ा , किन्तु आज पता चल रहा है, रूही ने उसको मारा।
आश्चर्य और क्षोभ के कारण उसकी बुरी हालत थी। वह इस बात को स्वीकार ही नहीं कर पा रहा था कि यह वही शिखा है, जिसे हमने एक वस्तु समझ उससे खेला था ,कभी उसकी भावनाओं के विषय में नहीं सोचा। इसने मेरे दो भाइयों को मार दिया। वो क्या करें ? कुछ समझ नहीं आ रहा। यदि ये अकेली होती तो अब तक इसका गला दबाकर मार दिया होता किन्तु अब.... मेरे बच्चों की मां ,अब सबको पता है ,मेरे साथ गयी है। सुमित के साथ इसकी बहन भी तो है।
तब रूही बोली -मैं, हवेली में बदले की भावना से ही आई थी, किंतु मेरी फितरत ऐसी नहीं थी इसीलिए मैंने कुछ नहीं किया। मैं निर्णय नहीं ले पा रही थी कि मुझे क्या करना चाहिए ? मैं इसी परेशानी में अपने आप से लड़ रही थी। एक दिन गौरव ने मेरे साथ, जो व्यवहार किया वो तो तुम भी जानते हो तब मैं एक निर्णय पर पहुंची और तुम्हारे हाथ से कॉफी पहुंचाई।
उस कॉफी में ऐसा क्या था ? जिसे पीते ही वो इस दुनिया से ही चला गया।
मैं नहीं जानती ,मुझे वो पाउडर किसी ने दिया था।
और तुमने मेरे भाई को पिला दिया क्रोधित होते हुए वो बोला।
अनजाने में नहीं पिलाया ,मैं जानती थी ,इसका परिणाम क्या होगा ? उसके किये की सजा उसे मैंने दी। दृढ़ता से वो बोली।
पुनीत को क्यों मारा ?उसने क्या किया था ?
जब तुम हवेली में नहीं थे ,तब पुनीत ने मेरे साथ वही बदसलूकी की,फिर से मुझे अपनी धरोहर समझ बैठा था। जिसका परिणाम उसको भुगतना पड़ा।अब मैं' शिखा' नहीं 'रूही 'बन गयी हूँ। हर इंसान को समझना होगा ,औरत भले ही शारीरिक रूप से कमज़ोर हो किन्तु उसकी लज्जा ,उसकी शालीनता को उसकी कमज़ोरी न समझें।खरगोश भी तेज दौड़ता था किन्तु तब भी कछुए से हार गया।
तुम लोगों ने 'तेजस 'के प्रति मेरे प्यार को नहीं समझा। मुझे ज़बरन मलिन करके मेरे पवित्र प्यार को गाली दी। मैं इसी हवेली में उसकी विधवा बनकर रह सकती थी किन्तु तुम लोगों को ये मंजूर नहीं ,तुम्हारे लिए तो औरत बस हवस की पूर्ति के लिए होती है क्योंकि तुम्हारी माँ ने कभी तुम्हें अच्छे संस्कार नहीं दिए और बहन तुम्हारे थी ही नहीं .... पैसे के खोल में पले हुए वहशी थे ,कोई भी जुर्म करते पैसे से सब सुलझ जाता।
तुम्हारा गुनहगार तो मैं भी था , फिर तुमने मुझे क्यों छोड़ दिया ?
मैं इस हवेली के लोगों का सर्वनाश करने के लिए ही आई थी, किंतु गुरुजी के समझाने पर, मेरा इरादा बदल गया उन्होंने कहा था -कि मार कर किसी को क्या दंड देना, सबसे बड़ा दंड तो यही है? कि उसे जिंदा रखें और अपराधी को पता रहे ,कि उसने क्या अपराध किया है ? अपराधी को मार देने से उसे अपनी गलती को सुधारने का मौका भी नहीं मिलेगा मैं नहीं चाहती कि तुम लोग, अपनी गलती को सुधारो ! लेकिन मैंने तुम्हें इसीलिए जिंदा रखा ताकि तुम, अपनी उन गलतियों को महसूस करो !उस दर्द को सहो , जो मैंने सहा है।
कहते हुए ,गाड़ी की तरफ बढ़ी ,एक क्षण रुककर बोली - अब यह गाड़ी हवेली में नहीं जाएगी ,इसे बाबा जी के आश्रम पर ले चलो ! मैं वहीं पर जाऊंगी।
अब क्या उस आश्रम में जाकर अपने पाप धोने का विचार है व्यंग्य से गर्वित बोला।
हवेली में क्यों और किसके लिए जाना है ?
क्या, अब तुम्हें मुझसे प्यार नहीं रहा ?
वो तो तुम्हें भी नहीं था ,हम दोनों ही अपने -अपने स्वार्थ से जुड़े थे ,तुम्हें अपनी हवेली के लिए फिर से एक ऐसी दुल्हन चाहिए थी ,जो तुम सभी भाइयों का बिस्तर गर्म करे। और मैं तुम सबसे अपनी उस मौत का अपनी उन रातों का ,अपने अपमान ,अपनी इस बदली पहचान का तुम सबसे बदला लेना चाहती थी।
क्या अब तुम्हें डर है ,यदि तुम हवेली में जाओगी और जब सभी को तुम्हारी सच्चाई मालूम होगी तो कोई भी तुम्हें माफ़ नहीं करेगा।
तुमसे किसने कहा ? मैं अपने किये पर शर्मिंदा हूँ अथवा माफी मांगना चाहती हूँ। मैं एक बार मौत के मुँह से वापस आ चुकी हूँ ,अब मुझे मौत से भी ड़र नहीं लगता, रूही का चेहरा कठोर हो गया।
फिर तुमने यह सब क्यों किया ? हमारे ये दोनों बच्चे ! हमें ऐसे भी तो मारकर जा सकती थीं।
यह तो मैंने इस हवेली का ऋण चुकाया है। उस हवेली की दो संताने मेरे कारण गई हैं। वही इस हवेली को अर्पित कर रही हूं। इनको देखकर तुम्हारी मम्मी भी कितनी प्रसन्न हैं ? मेरे गौरव और सुमित आ गए।
जैसा तुम चाहो ! उस समय गर्वित को भी कुछ नहीं सूझ रहा था और वह रूही को लेकर गुरु जी के आश्रम में पहुंच गया। वहां रूही को छोड़ आया और बच्चों के सहित हवेली में वापस लौट गया।
