आज, जब ज़ीनत घर में आई तो थोड़ा परेशान थी ,उसे अपने शौहर के साथ न रहने पर दुःख था। न जाने क्या -क्या सोचती रहती है ? तभी तो कई बात भूमि ने उसे अकेले में बड़बड़ाते हुए सुना है, कई बार उसने जानना चाहा ,और छुपकर सुनने का प्रयास भी किया -कि ये क्या बोलती है ? किन्तु समझ नहीं आया ।
भूमि ने महसूस किया,' ज़ीनत' के मन में हमेशा हलचल मची रहती है। शायद ये इसीलिए' पागल' सी हो गई है , जिसके मन में अनेक विचार आते हैं, लेकिन कोई कहने और सुनने वाला नहीं है ,कोई समझना भी नहीं चाहता, हर चीज मुझे भी तो नहीं बता सकती, इसीलिए इसे आज अपने शौहर की याद आई होगी। अचानक ही वो उठी और बोली -आंटी ! अब मैं जा रही हूं।
ज़ीनत की आगे कहानी कुछ इस तरह से थी, एक दिन ज़ीनत घर से बाहर घूमने के लिए गई थी,अभी कुछ दूरी पर ही गयी होगी ,तभी किसी ने उसे, एकदम से एक गली से खींच लिया। इनकी गलियां काफी छोटी ,पतली होती हैं। वह ठीक से किसी को देख भी नहीं पाई, क्योंकि तुरंत ही उसके मुंह पर कुछ ऐसा रख दिया गया ,जिससे वह बेहोश हो गई और, जब उसे होश आया तो उसने, अपने को एक सुनसान कमरे में,पाया। उसके हाथ बंधे हुए थे, वह सोच रही थी - कि मुझे यहां कौन लेकर आया है ?
शक करना ज्यादा मुश्किल नहीं था ,वह समझ गयी, उसके चचाजान का बेटा ! ख़ालिद ने ही उसे यहां कैद किया होगा।
इधर ज़ीनत गायब हुई , उधर गली और मोहल्ले में उसकी ढुंढेर मचने लगी। उसके अब्बू और भाई उसे ख़ोज रहे थे।
उस कमरे में बहुत अँधेरा था, कुछ देर बाद ,तब उस कमरे में किसी के आने की आहट उसे सुनाई दी।अँधेरे के कारण ज़ीनत को उसका चेहरा दिखलाई नहीं दे रहा था। तब वो बोली -कौन है ? मुझे यहाँ कैद क्यों किया गया है ? खोलो ,मुझे !
किन्तु उस साये ने कोई जबाब नहीं दिया और वो उसकी तरफ बढ़ने लगा। पैर बंधे होने के कारण ज़ीनत भाग भी नहीं सकती थी और उसके हाथ बंधे होने के कारण ,न ही उसका विरोध कर सकती थी। वो ये भी नहीं जानती थी ,ये कौन सी जगह है ?
वह साया , ज़ीनत के समीप आकर बैठ गया ,ऐसे लग रहा था ,जैसे वो ज़ीनत को महसूस कर रहा है, उसने अपने हाथों से ज़ीनत के अंगों छूना शरू किया ,वो बार -बार कभी गर्दन से ,कभी कंधों से उसका विरोध करती रही ,उसने धीरे से उसके हाथ खोले।
तब ज़ीनत को लगा शायद ये मुझे आजाद कर रहा है ,तब वो बोली -तुम कौन हो ? मुझे जाने दो ! किन्तु उसने,उसके सवालों का जबाब देने की बजाय, उसे अपने कंधे पर उठाया और एक तरफ को बढ़ गया।
वो अपने हाथों से उससे छूटने का प्रयास कर रही थी, किन्तु उसकी पकड़ इतनी मजबूत थी ,उस पर तो जैसे उसके मारने का भी कोई असर नहीं हो रहा था। उसने ज़ीनत को लेजाकर एक कमरे के पलंग पर पटक दिया। ज़ीनत ने उठकर भागने का प्रयास किया किन्तु सफल न हो सकी ,क्योंकि अभी भी उसके पैर बंधे हुए थे जिस कारण वो गिर पड़ी ,तब उस अनजान साये ने, उसके पैर भी खोल दिए। वो बेहद घबराई हुई थी।
वह अँधेरे में उसके चेहरे को देखने की कोशिश कर रही थी क्योंकि अब वो थोड़ी अँधेरे की अभ्यस्त हो गयी थी। उसने अपने हाथों से उसके चेहरे को नोचना चाहा किन्तु उसका चेहरा शायद किसी कपड़े से बंधा हुआ था।उसका कोई भी विरोध,सफ़ल न हुआ. उस कमरे का वही अँधेरा ज़ीनत के सुंदर भविष्य को भी जैसे लील गया और तमाम उम्र के लिए उसके जीवन पर छा गया।
वो धीरे -धीरे बेहोश हो गयी थी ,जब उसकी आँखें खुलीं ,तब वो अपने घर में थी ,उसके अम्मी -अब्बू और उसके भाई उसे घेरे हुए खड़े थे। उन्हें देखकर ज़ीनत जैसे समझ ही नहीं पाई कि वो सब एक सपना था या फिर सच्चाई !
उसके आँखें खोलते ही सवालों का तॉंता लग गया, कहाँ चली गयी थी ?किसके साथ गयी थी ?कोई लड़की थी या फिर कोई आदमी ,क्यों गयी थी ?उनके सवाल सुनकर ज़ीनत रोने लगी। उसने उठने क कोशिश की किन्तु उसकी पीठ और पेट में बहुत दर्द हुआ। ऐसे समय में उसे लग रहा था ,उससे जैसे किसी को भी हमदर्दी नहीं थी।
तब उसके अब्बू बोले -सलमा तुम इससे पूछो ! ये कहाँ गयी थी ? किसके साथ गयी थी ?उनकी आवाज में दर्द और परेशानी दोनों ही थी। इस बात का इसकी फूफी को पता चल गया तो रिश्ता टूटने में देर नहीं लगेगी। ये बात कहीं बाहर नहीं जानी चाहिए ,कहते हुए कमरे से बाहर आ गए।
अब उस कमरे में ज़ीनत और उसकी अम्मी ही रह गए थे। तब रोती हुई , जीनत से उन्होंने पूछा -तू किसके साथ गई थी।
अम्मी !मैं, किसी के साथ भी नहीं गयी थी। मैं तो बाजार जा रही थी, वहीं मुझे जैसे किसी ने खींच लिया और मैं अचानक ही मैं बेहोश हो गई थी और मुझे पता ही नहीं चला।
झूठ मत बोल ! अरे ,नामुराद ! तू, अब कोई छोटी बच्ची नहीं है,गुस्से से अम्मी झल्लाईं।
नहीं, अम्मी मैं सच कह रही हूं
चल बता !वो कौन था ?जो तुझे उठाकर ले गया था।
मुझे नहीं मालूम ! मैं कहाँ थी ,कौन मुझे उठाकर ले गया था ? एक कमरा था, उसमें बहुत अँधेरा था ,मुझे कुछ भी दिखलाई नहीं दिया।
वहां कितने लोग थे ?उन्हें शायद अभी भी उस पर विश्वास नहीं हो रहा था। लड़की की बिना शय के भला कोई ऐसे ही ,उठाकर कैसे ले जा सकता है ?
वो एक ही था ,अम्मी !
अभी तो तू कह रही थी -कोई नहीं था ,मैंने किसी को नहीं देखा,चिल्लाते हुए सलमा बोली।
अँधेरे में एक आदमी आया था ,उसके चेहरे पर भी कुछ बंधा था ,उसने अपने को छुपाया हुआ था ,अम्मी ! मैं सच कह रही हूँ ,मेरा यक़ीन करो !
उसने तेरे साथ कुछ किया तो नहीं ,निराशा से सलमा ने पूछा ,उसकी इस बात पर ज़ीनत चुप हो गयी। हाय अल्लाह ! ये क्या हो गया ? सोचकर ही वो काँप उठी ,बोली - क्या वो ख़ालिद था ?
मुझे नहीं पता....
और तुझे क्या पता है ? कहते हुए उन्होंने ज़ीनत की कमर में कई थप्पड़ जड़ दिए। अब हम किसी से क्या कहेंगे ?
ज़ीनत के मन में एक प्रश्न बार -बार गूंज रहा था -मैं ,अपने घर कैसे आई ?मुझे यहाँ कौन लाया ? किन्तु पूछते हुए डर रही थी।
बाहर से आवाज आई, अरे सलमा कहां हो , क्या कर रही हो ?
