ख़ालिद के पिता, ज़ीनत के लिए अपने बेटे का रिश्ता लेकर यूसुफ के घर आते हैं और अपने भाई से ,ज़ीनत और ख़ालिद के रिश्ते के लिए युसूफ पर दबाव बनाते हैं और उन्हें समझाते हैं, कि यह रिश्ता अपने ही खानदान में हो जाएगा ,इससे बेहतर और क्या हो सकता है ?हालांकि वे जानते हैं कि ख़ालिद थोड़ा गुस्सैल स्वभाव का है और काम धंधे में भी उसका इतना ध्यान नहीं रहता है। किंतु माता-पिता को अपने बच्चे कब बुरे लगते हैं ? वो उनमें अच्छा ही देखने का प्रयास करते हैं। वो जानते हैं ,कि ख़ालिद कैसा है ?किंतु उन्हें एक उम्मीद है ,जब ज़ीनत से उसका विवाह हो जाएगा तो वह अपने आप ही सुधर जाएगा। यही सोचकर उन्होंने ख़ालिद की कुछ अच्छाइयां यूसुफ को बताई ।
पर्दे के पीछे से, ज़ीनत की अम्मी सलमा भी यह सब सुन रही थी, वो ख़ालिद की अम्मी को अच्छे से जानती है ,बहुत पहले दोनों साथ ही तो रहतीं थीं ,उनकी आपस बनती ही कहाँ थी ?किसी न किसी बात पर रोज़ाना झगड़े होते रहते थे। सलमा पर अपने बड़े होने का रुआब झाड़ती थी,सलमा उसकी आदतों से अच्छे से वाकिफ़ थी। वो नहीं चाहती थी कि मेरी लाडली बेटी, उसके घर की बहू बने, ऐसा करना तो दूर ,सोचना भी नहीं चाहती थी।
तभी वह पर्दे के पीछे से कहती हैं - ख़ालिद !की आदतें सुधर भी गयीं तो क्या? उसकी अम्मी का क्या ?
इस तरह दो भाइयों के बीच में, सलमा को बोलते देखकर, युसूफ अंदर गए और सलमा को समझाया -तुम्हें अपने बड़ों का तनिक भी लिहाज़ नहीं है ,भाईजान सुनेंगे तो, क्या सोचेंगे ? तुम्हें इस तरह दो भाइयों के बीच में नहीं बोलना चाहिए।
क्यूँ न बोलूं ?आँखें तरेरते हुए सलमा बोली - ज़ीनत, मेरी भी बच्ची है ,जितना उसके लिए फ़ैसले लेने का हक़ आपको है उतना ही मुझे भी..... फ़ैसले लेने का हक़ है।
मैं अपने आप इस बात को संभाल लूंगा, तुम चुप रहो !कहकर वो बाहर आता है ,अपने चेहरे के भाव छुपाते हुए मुस्कुराने का यत्न करता है।
पीछे से सलमा की आवाज आती है - नहीं, मेरी बेटी उस घर में तो कतई नहीं जाएगी, चाहे आपके भाई जान कितना भी जोर लगाएं , उसका तो पहले से ही रिश्ता तय हो चुका है।
ओफ्फो ! तुम चुप भी रहोगी,वो वापस मुड़कर आकर कहता है - मैं अपने आप संभाल लूंगा, यूसुफ ने सलमा से कहा और भाईजान के पास आया।
उसके चेहरे के भाव देखकर भाई जान वाहिद समझ गए, जरूर इसकी बेगम ने कुछ कहा होगा। सब कुछ समझते हुए भी, अनजान बनकर वो बोले -अब हालात पहले से बदल चुके हैं, हम एक दूसरे को जानते हैं, अच्छाई - बुराई भी समझते हैं ,किन्तु उनसे ज़्यादा देर तक रुका नहीं गया और उन्होंने पूछ ही लिया -क्या सलमा कुछ कह रही थी ?
नहीं, भाई जान ! वह तो किसी और चीज के बारे में बात कर रही थी।
वह कुछ कह रही थी और तुम कुछ कह रहे हो आख़िर उन्होंने कह ही दिया क्योंकि सलमा के कुछ अल्फाज़ उनके कानों ने भी सुने थे ,लेकिन मैं जो कह रहा हूं, उस पर तुमने क्या गौर फ़रमाया है , तुम्हारे मन में क्या है ? तुम क्या चाहते हो ? क्या तुम्हें ख़ालिद पसंद नहीं है ?
नहीं भाईजान !ऐसी कोई बात नहीं है ,वो भी अपना ही बेटा है। बात को संभालने की कोशिश करते हुए , युसूफ मियां कहते हैं - दरअसल बात यह है , ज़ीनत की फूफी रुकैया ने, अपने अहमद के लिए, ज़ीनत का रिश्ता बहुत पहले ही मांग लिया था इसीलिए मैं इस रिश्ते के लिए , आपको वक़्त पर जवाब नहीं दे पाया। अपना खालिद भी अच्छा लड़का है ,अपना ही बेटा है, देखाभाला है किंतु उसकी फूफी को हम ज़बान दे चुके हैं।
यूसुफ की बात सुनकर, वाहिद को गुस्सा आया और वह बोले -अगर यही बात थी ,तो तुम हमें बता सकते थे ,मैं ख़्वामहखाह ही बोले जा रहा हूँ ,तुम तो निहायत ही नाशुक्रे हो ,उन्होंने अपने अहसानो को याद कर शायद ये बात यूसुफ़ से कही।
नहीं भाईजान !हम आपका एहसान मानते हैं ,आप हमारे बड़े भाई हैं।
तुम, मुझे यह बात पहले नहीं बता सकते थे ,उन्हें उम्मीद थी ,ये मेरे एहसानों के बदले, कभी भी रिश्ते से मना नहीं करेगा। नाराज़गी से बोले - जब मैंने रिश्ता भिजवाया था, तभी यह बात हो जाती तो मुझे यहां आना तो नहीं पड़ता। बेइज्जती से वो तिलमिला गए थे ,कुर्सी से उठकर बोले -अब मैं चलता हूं।
नहीं, भाई जान बैठिए तो सही, यूसुफ ने उसे रोकना चाहा।
किंतु इस समय उन्हें अपनी बेइज्जती लग रही थी , तब वो बोले -रुकैया के तेवर देखे हैं , उसके साहबजादे ! को क्या ज़ीनत पसंद आएगी ?
रुकैया ने तो, उसे देखा हुआ है, यूसुफ ने जवाब दिया।
चलो देखते हैं , कैसे रिश्ता होता है ? कहकर वह हवेली से बाहर निकल गए।
उनके तेवर देखकर लग रहा था, कि वो बहुत नाराज है किंतु उन्होंने यह जो बात कही, वह समझ नहीं आई। क्या वो धमकी देकर गए हैं।
उनके जाते ही, सलमा पर्दे से निकलकर बाहर आई और बोली - कैसे नहीं होगा, रिश्ता ! हमारी बच्ची में क्या कोई कमी है ? उनके उस नकारा लड़के का हमने रिश्ता नहीं लिया तो 'बदन में आग लग रही है' , बेइज्जती महसूस कर रहे हैं। तब अपनी ज़ीनत की तरफ देखा और बोलीं -इतनी खूबसूरत लड़की के लिए क्या खालिद मियां ही रह गए हैं ? क्या हीरे को पैबंद में जड़ दूं ?घमंड से बोली।
सलमा !तुम चुप रहो ! भाई जान का नाराज होना लाज़मी है , उन्हें मुझसे ऐसी उम्मीद नहीं होगी। मेरे इंकार करने पर उन्हें दुख तो ज़रूर हुआ होगा। मैं भी क्या कर सकता हूं ? इनकार करना पड़ा हमने रुकैया आपा को, ज़बान जो दे रखी है।
यदि उन्हें जुबान न भी दी होती, तब भी मैं अपनी ज़ीनत की शादी उनके बेटे से न करती तुनकते हुए सलमा बोली। उसे ड़र था ,हमने ख़ालिद के रिश्ते से मना कर दिया इसीलिए कहीं वो आवारा ख़ालिद उनकी बेटी के पीछे न पड़ जाये इसीलिए ज़ीनत के आने- जाने पर नज़र रखी जाने लगी। उससे कुछ दिनों तक बाहर निकलने से मना कर दिया गया।
उतरा हुआ ,चेहरा लेकर ख़ालिद के अब्बू घर पहुंचे और चुपचाप जाकर बैठक में बैठ गए और हुक्का गर्म करके लाने के लिए कह दिया। ख़ालिद तो कितनी देर से उनके इंतज़ार में था ?उनके जाते ही ,पूछा -अब्बू क्या हुआ ? चचाजान !ने क्या कहा ?
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