Kiski dulhan [part 11]

अभी मोहिनी और भानु सुरंग के बाहर खड़े सोच ही रहे थे ,कि क्या किया जाये ? तभी सुरंग में से फिर से वही आवाज़ गूँजी—

"भानू ..."अगर ज़िंदा रहना चाहते  हो ..."तो तहखाना नंबर दो में मत आना।  ऐसा लग रहा था ,जो भी ये चेतावनी दे रहा है ,वो कोई कमज़ोर, बुजुर्ग़ आदमी हो सकता है ,उन्होंने आवाज़ सुनकर अंदाज़ा लगाया। किन्तु  उस आवाज़ में ऐसा अधिकार था कि कुछ क्षणों के लिए मोहिनी  और भानु दोनों के कदम वहीं थम गए।दोनों ने एक-दूसरे की ओर देखा।

मोहिनी ने फुसफुसाकर पूछा - अब क्या करें?"


भानु की नज़र दीवार पर बने २  के निशान पर टिक गई ,तब वह बोला - जो आदमी हमें वहाँ जाने से रोक रहा है.. वहां जाने की ,शायद वही, हमारी सबसे बड़ी वजह है।"

मोहिनी  ने भी सहमति में धीरे से सिर हिलाया किन्तु वहां जाने का सोचकर ,किसी अनजाने भय से दोनों को ही ड़र लग रहा था ,लेकिन अब लौटना संभव नहीं है ,यह कहकर भानु आगे बढ़ गया। 

सुरंग कुछ और आगे चलकर संकरी होती जा रही थी। पत्थर की दीवारों से पानी की बूँदें टपक रही थीं।जहाँ हवा में सीलन और लोहे की जंग की गंध घुली हुई थी।करीब पचास कदम आगे बढ़ने के पश्चात रास्ता एक गोलाकार कमरे तक पहुंच गया। अब वे एक गोल कमरे के मध्य खड़े थे जिसके बीचों-बीच एक पुराना लोहे का दरवाज़ा था।उस पर वही चिन्ह उकेरा हुआ था—दो साँप...और बीच में अंक—

मोहिनी ने अपनी मुट्ठी खोली,चाँदी की चाबी हल्की रोशनी में भी चमक उठी। उसने काँपते हाथों से चाबी ताले में डाली टक...की आवाज से वह ताला खुल गया लेकिन दरवाज़ा अपने आप नहीं खुला।भानु ने दोनों हाथों से उसे धक्का दिया।भारी आवाज़ के साथ दरवाज़ा धीरे-धीरे अंदर की ओर खुलने लगा ,घर्ररर...

दरवाज़ा खुलते ही ठंडी हवा का तेज़ झोंका बाहर आया ,जैसे वर्षों से बंद किसी कमरे ने पहली बार साँस ली हो। अंदर का दृश्य देखकर दोनों ठिठक गए। यह कोई साधारण स्थान नहीं था। एक गुप्त तहख़ाना था ,उसके कमरे की दीवारों पर लकड़ी की पुरानी अलमारियाँ बनी हुई थीं। जिसमें सैकड़ों फ़ाइलें, मोटी डायरी और लोहे के बड़े -बड़े बक्से रखे थे।

 उनके मध्य  में एक बड़ी -सी लकड़ी की मेज़ थी । मेज़ पर धूल की मोटी परत जमी हुई थी लेकिन...ऐसा लग रहा था ,जैसे उस धूल पर किसी ने हाल ही में हाथ फेरा था। मतलब...यह जगह बिल्कुल सुनसान नहीं थी।

कोई तो था, जो यहाँ रहता है...मोहिनी  ने धीमे स्वर में कहा।

भानु  ने टॉर्च की रोशनी पूरे कमरे में घुमाई ,एक कोने में मिट्टी का घड़ा रखा था। दूसरे कोने में ताज़ा जली हुई मोमबत्ती और पास ही...आधी खाई हुई सूखी रोटी।

यह सब देखकर भानु  का गला सूख गया ,यह सब क्या है ? यह कुछ घंटे पुराना ही लग रहा है।"

अचानक...पीछे से लकड़ी की छड़ी के ज़मीन पर टिकने की आवाज़ आई, ठक...दोनों तुरंत ही पलटे।टॉर्च की रोशनी अँधेरे को चीरती हुई आगे बढ़ी और फिर...एक दुबला-पतला बूढ़ा आदमी, धीरे-धीरे रोशनी में आया। उसके लंबे सफ़ेद बाल कंधों तक बिखरे हुए थे। घनी दाढ़ी भी उसके चेहरे पर गहरे ज़ख्मों के निशानों को छुपा न सकी।

लेकिन...उसकी आँखें ! वे आज भी ,उतनी ही तेज़ थीं। जैसे हर आने वाले इंसान को आर-पार पढ़ सकती हों।

बूढ़े आदमी ने सबसे पहले भानु  को देखा। वो कुछ पल तक बिना पलक झपकाए उसे देखता रहा फिर उसकी आँखें भर आईं। वह बहुत धीमे स्वर में बोला—"तुम कितने बड़े हो गए...हो ?जब तुम्हें देखा था, बहुत छोटे थे। 

भानु एक कदम पीछे हट गया और उसने पूछा - आप... कौन हैं? मैंने तो आपको पहले कभी नहीं देखा। 

बूढ़ा हल्का-सा मुस्कुराया -यही सवाल तो मुझे तुमसे पूछना चाहिए।"तुम कौन हो ? क्या तुम  विक्रम के बेटे हो ?

भानु ने बिना झिझक उत्तर दिया -"हाँ।"

बूढ़े ने कुछ क्षण तक उसे देखा ,फिर धीरे से सिर हिलाया।"चेहरा बिल्कुल अपने पिता जैसा है...लेकिन आँखें... राजवीर खानदान की नहीं हैं।"यह सुनकर भानु चौंक गया। आप कहना क्या चाहते हैं?"

बूढ़े ने कोई उत्तर नहीं दिया,उसकी नज़र अब मोहिनी पर चली गई और अगले ही पल...उसका चेहरा बदल गया। वह इतनी तेज़ी से आगे बढ़ा। इतनी ही तेज़ी से कि भानु  तुरंत मोहिनी  के सामने आकर खड़ा हो गया -रुकिए!"

बूढ़ा वहीं रुक गया। उसकी नज़र मोहिनी के उस हाथ पर थी ,जिसमें वही चांदी की चाबी थी। उसने काँपती आवाज़ में कहा -"यह चाबी...यह तुम्हें किसने दी ?"

मोहिनी कुछ क्षण चुप रही,उसे दादीसा की बात याद आई।"सही समय से पहले किसी पर भरोसा मत करना।"

लेकिन न जाने क्यों ? उस बूढ़े की आँखों में उसे छल नहीं दिखा ,उसने धीरे से कहा -दादीसा ने।"

यह सुनते ही बूढ़े के हाथ से उसकी लकड़ी की छड़ी छूट गई। वह कुर्सी पर बैठ गया, उसकी आँखों से आँसू बहने लगे। वह बुदबुदाया—तो..इसका मतलब है ,'सरस्वती 'अभी ज़िंदा है।"

मोहिनी  और भानु ने एक साथ एक-दूसरे की ओर देखा और उनके मुँह से एकदम निकला -'सरस्वती?भानुशिला  हवेली में तो सभी उन्हें सिर्फ़ दादीसा कहते हैं।

उसका असली नाम... तुम दोनों ने पहली बार सुना है ,गंभीर होते हुए बूढ़े ने कहा। कुछ देर बाद बूढ़े ने खुद को संभाला।उसने मेज़ की दराज़ खोली। अंदर से एक पुरानी काली -सफ़ेद तस्वीर निकाली। तस्वीर के किनारे पीले पड़ चुके थे। उसने तस्वीर भानु  की ओर बढ़ाई -पहचानो ! इसे "

भानु  ने वो तस्वीर अपने हाथों में ले ली।उसमें तीन युवा लड़के खड़े थे।पहला...विक्रम सिंह। दूसरा...यही बूढ़ा आदमी ,लेकिन तीसरे लड़के का चेहरा किसी नुकीली चीज़ से बुरी तरह खुरच दिया गया था।जैसे किसी ने उसकी पहचान हमेशा के लिए मिटाने की कोशिश की हो।

भानु  ने उस तस्वीर से नज़र उठाकर उस बूढ़े से पूछा -यह तीसरा आदमी कौन है?"

बूढ़े की आँखों में अचानक डर उतर आया ,उसने फौरन भानु से वो तस्वीर वापस छीन ली और भयभीत होते हुए बोला -उसका नाम...इस तहखाने में भी मत लेना।"

कमरे में कुछ क्षणों के लिए ऐसा सन्नाटा छा गया कि तीनों की साँसें तक सुनाई देने लगीं और तभी...बहुत दूर कहीं ऊपर...लोहे का कोई विशाल दरवाज़ा बंद होने की गूँज सुनाई दी। धड़ाम...बूढ़े का चेहरा एकदम सफ़ेद पड़ गया।उसने घबराकर सुरंग की ओर देखा।"वे लोग..."उन्हें पता चल गया कि तुम यहाँ हो।"

भानु ने तुरंत पूछा -कौन लोग ?"

बूढ़े ने पहली बार अपना नाम बताया ,उसकी आवाज़ धीमी थी...लेकिन हर शब्द स्पष्ट  सुनाई दे रहा था—मेरा नाम...रत्न  प्रताप राजवीर है।"

और उसी क्षण...सुरंग के दूसरे छोर से कई लोगों के एक साथ चलते हुए कदमों की आवाज़ आने लगी।ठक... ठक... ठक...

कोई...या शायद कई लोग...सीधे तहखाना नंबर दो की ओर बढ़ रहे थे।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post