Zeenat [part 23]

खालिद अपने अब्बू का बेसब्री से इंतजार कर रहा था, अब्बू के आते ही, उसने पूछा -अब्बू !चचाजान ने क्या कहा ?

वाहिद जानते थे ,यदि इससे एकदम से कहूंगा ,कि उसने रिश्ते से इंकार कर दिया ,इसे गुस्सा आएगा,गुस्से में ये ,न जाने ये क्या कर बैठे ? तब बोले - सब बेगैरत हैं , एहसान फरामोश हैं , उसके कारोबार में मैंने, उसकी कितनी मदद की थी ? मुझे लगता था, यह मेरा एहसान मानता है ,किंतु आजकल  भलाई का तो जमाना ही नहीं रहा।


 जब इंसान दुख में होता है, और किसी अपने के द्वारा, उसे दर्द मिलता है, तब उसे अपने किए हुए काम  या फिर किसी पर किया हुआ ,एहसान उसे याद आता है। ''यह इंसानी फितरत है, इसी प्रकार जब यूसुफ ने वाहिद से उनके बेटे खालिद से रिश्ते के लिए मना कर दिया। तब उन्हें अपने किए एहसान याद आ रहे थे। 

हालाँकि उस समय तो बड़ा भाई होने के नाते उन्होंने, उसकी मदद की थी किंतु अब समय के साथ-साथ  वह मदद, एहसान में बदल गई और अब उन्हें लगता था कि उस एहसान के बदले ,मुझे भी कुछ मिलना चाहिए और इस नाते यही सोचकर , वो  ज़ीनत का रिश्ता, अपने बेटे खालिद के लिए मांगने गए थे।

 और जब युसूफ ने  उस रिश्ते से इनकार कर दिया, तब उनके मन में तिलमिलाहट होने लगी , और अपने भाई पर क्रोध भी आया हालांकि यूसुफ ने बता दिया था - कि ज़ीनत के लिए पहले ही, अहमद का रिश्ता आ चुका है किंतु तब भी उन्हें  यह बात हज़म नहीं हो रही थी। तब भी उन्हें  लगता था, कि मेरी तोेहीन हुई है।

जब ख़ालिद ने उनसे पूछा - कि चचाजान ने क्या कहा ? तो वही गुस्सा उस पर उतार रहे थे। कमज़र्फ !हल्का बुदबुदाते हुए बोले -नामाकूल ! आज तेरे ही कारण मेरी बेइज्जती हुई है, घर की बात है, मैं उसे मना भी लेता ,सलमा तो अपने  शोेहर से पहले ही मना कर चुकी थी और वो तेरी फूफी रुकैया !

 क्या हुआ ?फूफी जान को क्या वो भी वहीं थीं ?उतावला होते हुए ख़ालिद ने पूछा  

नहीं, वो वहां नहीं थी किन्तु वो हमसे पहले ही अपने अहमद का रिश्ता ले गयी थी ,मन की थोड़ी भड़ास निकाल वो शांत हुए और बोले - यदि उनकी  रुकैया से बात नहीं हुई होती तो शायद मैं इस रिश्ते के लिए यूसुफ़ को मनवा भी सकता था। अपने बेटे को वे अभी भी दिखला देना चाहते थे ,बात उनके हाथ में ही थी किन्तु रुकैया भी तो अपनी ही बहन है ,अहमद भी अपना बच्चा है। 

किन्तु अंदर ही अंदर उन्हें सलमा पर गुस्सा था। वो , खालिद से भले ही ज़ीनत का रिश्ता न करते किन्तु उसे इस तरह नहीं बोलना चाहिए था।  वह तो दूसरे घर की है, किंतु अपने यूसुफ को तो सोचना चाहिए। हमारा खानदान एक है, घर की बात घर में ही रहती। अहमद क्या उसे पसंद करेगा ? हां, खूबसूरती को देखते हुए यदि वह पसंद करता है तो ठीक है वरना इतना पढ़ा- लिखा लड़का एक अनपढ़ को कैसे पसंद करेगा ?

उनकी बात सुनकर खालिद चुप हो गया, और मन ही मन सोचने लगा -ऐसा उसमें  क्या है ?जो उसे इतना घमंड आ गया है। मेरे पीछे न जाने, मोहल्ले की कितनी लड़कियां घूमती हैं ? किंतु इस बात का उसे बहुत दुख हो रहा था। उसकी नजरों के सामने से ज़ीनत का चेहरा नहीं हट रहा था। बार-बार उसको देखने की ललक बढ़ती जा रही थी। 

कई बार वह, अपने चचाजान के मोहल्ले में भी गया ,उस गली में बेमतलब ही घंटो खड़ा रहा। शायद, ज़ीनत की एक झलक मिल जाए। अब तक उसके प्रति इतनी क़शिश नहीं थी किन्तु जब से उसे लगा है ,कि वो उसकी ज़िंदगी में आ ही नहीं सकती ,वो तो किसी और की अमानत है ,तब से ,जैसे वो बहक सा गया था।

 एक बार ज़ीनत मिल जाये ,उससे बात हो जाये तो शायद मैं उसे मना सकूँ ,एक अनजानी सी उम्मीद लिए उसकी गली के चक्कर लगा रहा था। 

ख़ालिद को उनकी गली के चक्कर लगाते हुए , ज़ीनत के भाई तैमूर ने देख लिया और घर आकर बताया -अम्मी !मैंने ख़ालिद अपने महल्ले में घूमते हुए देखा है। 

 अब तो ज़ीनत पर सलमा ने पहरा लगा दिया था ताकि वह बाहर न निकले , उसके भाई भी उसका ख्याल रखते थे। वो जानती थी ,यदि ख़ालिद को गुस्सा आ गया या अपनी ज़िद पर आ गया तो कुछ भी कर सकता है। 

काम में मन नहीं लग रहा था ,हताश हो ख़ालिद घर आ गया ,अपने बच्चे को देखकर जोया का' कलेजा मुँह को आया.''क्या हुआ ?सब ठीक तो है। 

हाँ ,सब ठीक है ,कहते हुए वहीं पड़ी कुर्सी पर बैठ गया। उसकी अम्मी पानी लेने गयी, तभी उसे थोड़ी बेचैनी हुई और अपने कमरे में गया। अलमारी खोली और उससे वे पायजेब निकाली ,अचानक ही मन गुस्से से भर गया और वापस वहीं पटक दीं। 

जोया उसके पीछे खड़ी ,उसकी सभी हरक़तों को देख रही थी। उसे मालूम नहीं था ,''बाप -बेटे में क्या खिचड़ी पक रही है ?'' ख़ालिद के हाथ में पायजेब देखकर मुस्कुराई और पूछा -किसकी पायजेब हैं ?

ख़ालिद पीछे पलटा ,और हकलाते हुए बोला -किसीसी की... नहीं, कहते हुए अलमारी बंद की और जोया से पानी का गिलास ले लिया। 

अब तो तुम्हारे लिए  कोई लड़की  देखनी होगी, अब घर में पायजेब आ गयीं हैं ,अब इनको पहनने वाली भी आनी चाहिए। क्या तुम्हें कोई पसंद है ,तो मुझे बताओ ! मैं उसके घर रिश्ता लेकर ख़ुद जाउंगी। 

बाहर से आते हुए ,वाहिद मियां ने जोया की बातें सुन लीं ,वे जानते थे, उनके बेटे को ज़ीनत बहुत पसंद है और अब अपनी माँ से कह रहा है ,तब अंदर आते हुए  बोले -रुकैया भी तो अपने ही घर की बेटी है। 

यह आप क्या फ़रमा रहे हैं ? जोया ने पूछा -रुकैया को क्या हुआ ?

तब उन्होंने सारी बातें अपनी बेग़म जोया को बतला दीं। औरत जात ,बात को अपने मान पर ले गयी। वैसे चाहे वो ज़ीनत से अपने बेटे का निक़ाह न करती किन्तु उसके शौहर और उसके बेटे का अपमान हुआ है। बोली -वो सलमा अपने को क्या समझती है ? उसकी बेटी कोई हूर की परी नहीं है ,उससे खूबसूरत तो मेरी खाला की बेटी है। 

माशाअल्लाह ! क्या तीखे नैन नक्श हैं ? कहते हुए अपने बेटे को समझाना चाहा और उससे कहा, उसे भूल जाओ ! इससे भी खूबसूरत और पढ़ी-लिखी लड़की तुम्हारे लिए लाएंगे। 

दोनों बाप -बेटा जानते थे, जोया का सलमा से छत्तीस का आंकड़ा है ,इसके खाला की बेटी खूबसूरत न भी होगी ,तब भी उसे ज़ीनत के सामने वही खूबसूरत नज़र आएगी। 

 वक़्त कभी भी एक जैसा नहीं रहता,पता नहीं कब किस मोड़ पर किसी की दुनिया ही बदल जाये ?अगले साल ही अहमद मियां की पढ़ाई पूरी हो जाएगी और तब ज़ीनत से उनका निक़ाह करके ज़ीनत को उसकी ससुराल के लिए रुख़सत करके सुकून की साँस लेंगे। सलमा और यूसुफ़ यही उम्मीद लगाए बैठे थे। 

चचाजान !आप ये क्या कर रहे हैं ? ज़ीनत के लिए रिश्ता भिजवाया था, आपने इंकार करके अच्छा नहीं किया। 

हम क्या करते हम भी इंकार नहीं करना चाहते थे, परन्तु क्या करते ?तुम्हारी फूफी को हम ज़बान दे चुके हैं। बस अहमद मियां  की पढ़ाई पूरी होने का इंतज़ार कर रहे थे। अगले साल ही पढ़ाई पूरी होते ही, हम उन दोनों का निक़ाह करवा देंगे। तुम फ़िक्र न करो !हम तुम्हारे लिए बेहद खूबसूरत लड़की ढूंढकर लाएंगे जो हमारे ख़ालिद मियां को खुश रखे उनकी खूब सेवा करे। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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