Mysterious nights [part 178 ]

हवेली के अंदर, गुरुजी प्रवेश करते हैं, और वहां देखते हैं, उस हवेली में अविश्वास छाया हुआ है , यहां बहुत बड़ा अनाचार हुआ है। हवेली शांत है किन्तु इस हवेली के लोगों के मनों में अशांति प्रवेश कर चुकी है। वो ये सब पहले से ही जानते थे, कि अब रूही' बदले की भावना 'से इस हवेली में आई है और इसीलिए ये मौतें हो रही हैं। वो चाहते तो सबके सामने कह भी सकते थे- कि इन मौतों का कारण कोई और नहीं, रूही है किंतु उन्हें गलती उसकी भी नहीं लगी। उसके साथ जो कुछ भी हुआ, वह तो उसका प्रतिकार था। 


वो अपना बदला ले रही है ,उसके स्थान पर कोई और भी होता तो भी यही करता। अपराधी को उसका दंड देना आवश्यक है , वरना अपराध हद से ज्यादा गुजर जाता है। तब वो गर्वित से पूछते हैं -' तुम इस हवेली से बाहर कहां भटक रहे थे ? क्या तुम शांति की तलाश में थे, या फिर अपने किए हुए कर्मों का पश्चाताप करने गए थे।'' 

गर्वित को कुछ भी समझ नहीं आया, वह स्वयं ही नहीं जान पा रहा था, कि वह इस तरह क्यों भटक रहा है ? क्योंकि उसे सही राह दिखाने वाला कोई था, भी नहीं, वह नहीं जानता कि वह अपने कर्मों के कारण भाग रहा है या फिर अपने आपसे भाग रहा है। उसे लगा ,गुरूजी को ये सब कहाँ मालूम होगा ?तब वो बोला - पता नहीं ,गुरुजी कहीं भी शांति का एहसास नहीं हो रहा था, ऐसा लग रहा था जैसे बहुत कुछ पीछे छूट गया है ,मन में प्रसन्नता का आभास नहीं हो रहा।  

जो छूटा है, वो कुछ अच्छा भी तो नहीं था,उसे क्यों पकड़े रखना चाहते हो ? क्या अपनी जीवन यात्रा के विषय में कुछ सोचा है ? जो बीत गया, उसे बीत जाने दो ! क्यों परेशान हो रहे हो ?तुम भी तो किसी के दर्द का कारण हो सकते हो ,हो सकता है ,तुम्हें उस दर्द का एहसास दिलाने के लिए ही ,दर्द दिया गया हो। 

 मन न जाने क्यों विषाद से भरा हुआ है ? लगता है, सब कुछ है लेकिन कुछ भी नहीं है।

 तुम्हें, ऐसा क्यों लगता है ?तुम्हारा तो अब नया जीवन आरम्भ हुआ है ,उनका इशारा रूही की तरफ था। 

किन्तु वो किस मुँह से कहे ? जबसे ये वैवाहिक जीवन आरम्भ हुआ है ,मुझे प्रसन्नता का एहसास नहीं हो रहा ,नई ब्याहता बीवी साथ में होकर भी...  रूही के अंदर शिखा की आत्मा आती है ,जब से ये इस हवेली में ब्याहकर आई है ,इसने मुझे कभी अपने समीप नहीं आने दिया। न जाने क्यों, अब वो अपने को अपने भाई का गुनहगार भी मानता है क्योंकि रूही ने उससे कहा था -'तुमने जो कॉफी उसे दी थी ,तभी उसकी मृत्यु हुई थी ,इसका कारण वह आज तक समझ ही नहीं पाया ,वो तो दोनों भाइयों में सुलह चाहता था ये सभी भाव अपने मन में दबाये घूम रहा था और जब ह्रदय विषाद से भरा हो ,तब वहां प्रसन्नता का स्थान कहाँ होगा ? गुरूजी से बस इतना ही कह पाया - घर -परिवार में कुछ भी अच्छा नहीं हो रहा है ?

यह तो तुम अच्छे से जानते हो और तुम्हारी माताजी भी जानती हैं, दमयंती की तरफ देखते हुए बोले - क्या तुमने,कभी  किसी के साथ छल नहीं किया है ,किसी मन नहीं सताया है ? दोनों माँ -बेटे एकदूजे को देख  रहे थे। कर्म किसी न किसी रूप में लौटकर आता है।  

वह तो बच्चों की नादानी थी, दमयंती ने अपना पक्ष रखते हुए कहा। 

अपराध को नादानी का जामा मत पहनाओ , तुम्हारे बच्चे इतने छोटे भी नहीं थे, कि उन्हें किसी के दुख और दर्द का एहसास ही ना हो और तुम तो उनकी माँ थीं , तुम्हें  तो उन्हें समझाना चाहिए था,एक माँ ही है ,जो बच्चों को सही राह दिखलाती है किन्तु तुम.... क्रोधित होते हुए महात्मा ने कहा।

 तुम तो स्वयं उन्हें नर्क में धकेल रहीं थीं।  उसको एक बार भी पलट कर नहीं देखा , वह कहां है ,कैसी है ? उसकी जिंदगी से तुम लोग , खिलौने की तरह खेल गए और जब मन भर गया फेंक दिया।

 उनकी बात का आशय समझकर दमयंती ने अपने आस -पास देखा, कहीं बाहर का कोई आदमी तो नहीं ,तभी उनकी दृष्टि रूही पर गयी। मन ही मन सोचा -ये तो कुछ भी नहीं जानती है ,हवेली में नई आई है। इसे कुछ पता चला तो अच्छा नहीं होगा तब वे रूही  से बोलीं - जाओ !गुरूजी के लिए शरबत ले आओ !

इस तरह किसी को बाहर भेज देने से, तुम्हारे दोष कम नहीं हो जाते , ऐसा तुमने कौन सा कर्म किया है ? जो तुम्हें छुपाना पड़ रहा है कभी सोचा है, अवश्य ही वह कर्म सही नहीं होगा, तभी तो तुम छुपाना चाहते हो। 

यह बात तो गुरुजी हम समझ गए, किंतु अब इसका कोई उपाय तो बताइए ! इसका क्या कोई निदान है ? जो इसे संभाल जा सके। यह चारों का बंधन था, जो मेरी सास ने करवाया था क्या अब यह बंधन, टूट गया, या फिर मेरे बच्चों का भविष्य ऐसे ही गर्त में चला जाएगा। 

गुरुजी ने ध्यानपूर्वक दमयंती की बातें सुनी और बोले -जिसने यह बंधन बंधवाया था , वो अब स्वयं भी जिंदा नहीं है , और जिनके लिए बनवाया था, उनमें से दो जा चुके हैं , फिर बंधन किस बात का ? यही बंधन तो.... इस हवेली के सर्वनाश का कारण बन गया। फिर भी यदि इस बंधन का कोई प्रभाव रहता है तो मैं  हवन करवा कर उसकी शांति का उपाय करवाऊंगा  और तुम्हारी सास की आत्मा की शांति के लिए भी ,वह पूजा आवश्यक है। इस बात को सिर्फ तेजस और जगत सिंह और दमयंती जानते थे।

 जब गुरु जी ने यह सब कहा -तो गर्वित, सुमित और अन्य लोग भी सुन रहे थे आज उन्हें भी पता चल गया , कि  दादी गायब नहीं हुई, बल्कि वो इस दुनिया में ही नहीं रही हैं।

कुछ देर पश्चात रूही ने उन्हें शरबत लाकर दिया, और दमयंती ने हवन की तैयारी के लिए, लोगों को सामान लाने के लिए बाहर दौड़ा दिया। तब गुरुजी दमयंती से बोले -मैं तुम्हारी बहू से कुछ बातचीत करना चाहता हूं। तब तक तुम लोग अपने-अपने कार्य निपटा लो ! उनका कहने का आशय समझ कर धीरे-धीरे सभी लोग वहां से उठकर चले गए। 

तब गुरु जी ने, रूही से पूछा -उस जीवन में और इस जीवन में क्या अंतर है ?

रूही नहीं जानती थी, कि गुरुजी सब समझते हैं , तब वो बोली -मैं कुछ समझी नहीं। 

अब इतनी नादान भी नहीं हो , हम सब जानते हैं, जब तुम नादान थीं , तब तुमने सब झेला और इतना सहन किया कि वह सीमा से बाहर हो गया किंतु आज तुम निखरे हुए कुंदन की तरह ,परीक्षा की भट्टी से निकलकर आई हो, तपकर कुंदन बन चुकी हो। अब तुम क्या चाहती हो ? बदला ! इस हवेली का सर्वनाश ! या फिर क्षमा !

गुरुजी !यदि इन लोगों को पता चले, कि इनके पुत्रों की हत्या के पीछे मेरा ही हाथ है, मैं ही उनकी मृत्यु का कारण रही हूं तो क्या यह लोग मुझे क्षमा कर देंगे ?

प्रश्न अच्छा है, किंतु क्या तुम ,बदला लेकर अपने को खुश रख पा रही हो ,तुम्हारी आत्मा को सुकून मिल रहा है तो बदला लेना सही है किंतु यदि बदला लेने के पश्चात भी, तुम्हारी आत्मा संतुष्ट नहीं है, शांति नहीं है,तब  इसका क्या लाभ ? कहते हुए वो रूही की तरफ देख रहे थे ,वह एकदम शांत बैठी हुई थी। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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