ज़ीनत ,मेले की भीड़ में सहेलियों से बिछुड़ गयी थी ,इसी बीच उसे ,उसके चचाजान का बेटा ख़ालिद मिल गया किन्तु नज़मा ने उसके सामने ,ख़ालिद के इस तरह से तारीफों के पुल बांधे [बुराई की ]थे। कल्पना में ही ज़ीनत को' ख़ालिद 'शैतान नज़र आने लगा था।
आज जैसे ही ख़ालिद उसके सामने आया ,वो उससे बचकर भागी और उसने पायजेब भी नहीं लीं। अभी उसी के बारे में सोचते हुए वो उस भीड़ में आगे बढ़े जा रही थी तभी अचानक किसी ने उसका हाथ पकड़कर खींच लिया। घबराकर ज़ीनत की चीख़ निकलने ही वाली थी क्योंकि वो ख़ालिद के बारे में सोचती जा रही थी ,उसे लगा कहीं ,उसका पीछा करते हुए ख़ालिद ही न आ गया हो। तभी उसने पलटकर देखा ,साज़िया कह रही थी -तुम कहाँ गुम हो गयीं थीं ?हम कितनी देर से तुम्हें ही ढूंढ रहे हैं ?
मैं भी तो तुम्हें ही ढूंढ़ रही थी, ढूंढते हुए मैं पायजेब वाले की दुकान पर पहुंच गयी , सोचा था तुम भी, मुझे ढूढ़ते हुए वहीं आ जाओगी।
वाह !हमें क्या अल्लाह ने ख़बर देने के लिए दूत भेजे हैं ?कि जाओ !ज़ीनत वहां है। अरे तुझे पायजेब ही ख़रीदनी थी ,हमें बता तो देती,अब दिखाओ ! कैसी पायजेब लाई हो ?
कहाँ ला पाई ? वो दुकान में... !!
क्या हुआ ? क्या तुम्हें ,वहाँ किसी ने छेड़ा या अहमद मियां मिल गए ?मुस्कुराते हुए नज़मा ने पूछा।
ऐसा कुछ नहीं हुआ था ,वो वहां 'ख़ालिद भाईजान' मिल गए थे, इसलिए आ गयी।
ये तो अच्छी बात थी ,उनकी जेब ख़ाली करवा देती ,मुझे ,मेरे भाईजान मिलते तो सारी ख़रीददारी उनके बटुवे से ही होती। हंसी -मज़ाक करते हुए वे आगे बढ़ गयीं।
ख़ालिद ने, ज़ीनत को बहुत ढूंढा किन्तु भीड़ में न जाने वो कहाँ ग़ुम हो गयी ?पायजेब अपनी ज़ेब के हवाले कर ख़ालिद अपनी दुकान पर पहुंचा। काम तो कर रहा था किन्तु उसकी नजरों के सामने बार -बार ज़ीनत का चेहरा आ रहा था। उसे ताज्जुब हो रहा था ,ज़ीनत इतनी बड़ी हो गयी है ,खूबसूरती में तो सुभानल्लाह ! घर पहुंचकर उसने वे पायजेब जेब से निकालकर अलमारी में संभालकर रख दीं और मन ही मन बुदबुदाया -ये ज़ीनत की अमानत हैं ,उसे अपने हाथों से पहनाउंगा।
यह बात आई गई हो गई, एक दिन अचानक ही ख़ालिद के घर से, ज़ीनत के लिए रिश्ता आया। जिसको सुनकर ज़ीनत के अब्बू सोच में पड़ गए। वो इस रिश्ते को मना करना चाहते थे, किंतु भाईजान ने उन पर बहुत से एहसान किए हैं, इसलिए थोड़ा चुप थे। वो तो अपनी ज़ीनत के लिए रुकैया के लड़के अहमद को उसके दूल्हे के रूप में देख रहे थे। भाईजान का ख़ालिद एक छोटी सी दुकान करता है ,देखने में इतना जंचता नहीं है। पढ़ाई भी मदरसे जाकर ही की है। गुस्सैल तो इतना है.... सोचकर ही उनकी रूह काँप गयी।
अब्बू ! कई दिन हो गए ,ज़ीनत के घर से कोई जबाब नहीं आया,बेचैनी से ख़ालिद ने अपने अब्बू से पूछा।
हाँ ,सोच तो मैं यही रहा था ,किन्तु हो सकता है कोई काम आ गया हो ,उसे फ़ुरसत न मिली हो ,आज मैं ही जाकर उससे पूछता हूँ ,उसे अपनी बेटी का विवाह हमारे यहाँ नहीं करना है, तो मना तो कर सकता है कोई ज़बरदस्ती थोड़े ही है। उसकी बेटी है ,जहाँ चाहे करे ,हमें क्या ?बेटे के सामने ऐसा जतलाया जैसे उन्हें कोई फ़र्क ही नहीं पड़ता। परन्तु जबाब ही नहीं दिया इसे, हम क्या समझें ? मन में गुस्सा लिए वाहिद मियां यूसुफ़ के घर जा पहुंचे।
यूसुफ़ और वाहिद दोनों ही भाई -भाई हैं ,यूसुफ़ कपड़ों का व्यापार करता है और वाहिद ने लकड़ी के सामानों की दुकान खोली है। दुकान क्या अब तो बड़ा सा शोरूम बन गया है ,जहाँ पर घर के उपयोग में लाई जाने वाली सभी वस्तुएं जैसे अलमारी ,पलंग ,खाने की मेज़ इत्यादि सामान बनता है। दोनों का अपनी -अपनी जगह काम अच्छा चल रहा है।
जब उनके अब्बू का इंतक़ाल हुआ ,तब दोनों के घर में झगड़े होने लगे। दोनों की बेगमें लड़ -लड़कर इस हवेली जैसे घर को सिर पर उठा लेती थीं। तब दोनों भाइयों ने अलग होने की ठान ली ,यह पुश्तैनी हवेली जो यूसुफ को मिली ,क्योंकि वाहिद को लगता था। सड़क के किनारे जो दुकानें हैं ,वे उसके कारोबार को बढ़ाने में सहायक होंगी। यह हवेली तो वैसे ही बहुत पुरानी और ज़र्जर है। सड़क के किनारे की दुकानों की क़ीमत भी ज्यादा होगी।
यूसुफ़ के अनुसार, अपने पुरखों की यादें इस हवेली में हैं ,इतनी बड़ी और शानदार हवेली पूरे इलाक़े में नहीं ,इसीलिए दोनों बिना लड़े ही अलग -अलग रहने लगे। आज बहुत दिनों के बाद' वाहिद' ज़ीनत के कारण उसी हवेली के सामने खड़ा था,वैसे तो काम धंधे के कारण किसी को मिलने की भी फ़ुरसत नहीं। अपनी औलाद के कारण ,इसी बहाने आज अपने भाई से भी मिलना हो जायेगा।
यूसुफ़ !यूसुफ़ !बाहर से आती आवाज सुनकर ,सलमा अपने शौहर के पास गयी और बोली - देखिए !शायद बाहर आपको कोई बुला रहा है।
इतनी सुबह ! कौन हो सकता है ?अभी वो यही सोच रहे थे तभी फिर से आवाज आई -यूसुफ़ !अरे !ये तो भाईजान की आवाज़ लग रही है। तुम चलो !कुछ खाने को बनाओ !मैं उनसे मिलकर आता हूँ ,कहकर यूसुफ़ बाहर आये।अरे भाईजान,आप !आइये !आइये !बाहर से ही पुकार रहे हैं ,अंदर तशरीफ़ लाइए !
तुम तो बड़े आदमी हो गए हो ,हमने ही सोचा ,चलो ! हम ही छोटे बन जाते हैं ,ताना मारते हुए ,उस हवेली की दहलीज़ पर क़दम रखते हैं।
आप इत्मीनान से बैठिये !कहते हुए सलमा को पुकारा -सलमा !भाईजान आये हैं ,इनके लिए कुछ खाने का बंदोबस्त करो ! कहकर वो भी वाहिद के नज़दीक ही कुर्सी पर बैठ जाते हैं, और सुनाइए !भाईजान ! घर में सब ठीक से तो हैं।
हाँ ,घर में सब ठीक हैं किन्तु तुम बताओ !तुमने क्या सोचा है ? तुम्हारे यहाँ हमने अपनी ज़ीनत के लिए ख़ालिद से शादी के लिए पैग़ाम भिजवाया था ,उसका क्या हुआ ?बहुत दिन हो गए ,तुमने तो कोई जबाब नहीं दिया। अब तुम हवेली वाले जो हो ,अपने ख़ालिद ने जबसे ज़ीनत को देखा है ,बस एक ही रट लगाए है -'ज़ीनत से ही निक़ाह करेगा। ''हमें भी इस रिश्ते में कोई बुराई नज़र नहीं आई। घर की बात है ,एक दूसरे को अच्छे से जानते हैं। अपने ख़ालिद से ज़ीनत का निक़ाह हो जायेगा। बेटी अपने घर में ही समझो ! भई !मैका भी यहीं और ससुराल भी नज़दीक ही रहेगी।
अपना ख़ालिद भी अब ज़िम्मेदार हो गया है ,दुकान संभालता है ,जब ज़ीनत से निक़ाह हो जायेगा तब और ज़िम्मेदार हो जायेगा।वैसे तो वाहिद साहब अपने बेटे को अच्छे से जानते हैं कि वो कितना ज़िम्मेदार है ? ''उम्मीद पर दुनिया क़ायम है। 'उन्हें लगता है ,शायद निक़ाह के बाद वो सम्भल जाये , किन्तु रिश्ते के लिए ऐसा नहीं बोलेंगे तो ख़ालिद को अपनी बेटी कौन देगा ? किन्तु अपने भाई को समझाबुझाकर ,उसे मनवा तो सकते ही हैं। इस बात का उन्हें अपने आप पर पूरा यक़ीन था।