ज़ीनत की अम्मी 'सलमा' , उसे समझाते हुए कहतीं हैं -तुम्हारी फूफी रुकैया का बेटा' अहमद' जब डॉक्टर बन जायेगा ,उसके साथ, तुम्हारा निक़ाह कर दिया जायेगा।
रुकैया फूफी ! वो तो मुझे बहुत डांटती हैं ,सास बन गयीं तो मुझे न छोड़ेंगीं, घबराकर ज़ीनत ने जबाब दिया। नहीं ,मुझे उनके घर नहीं जाना, नादान ज़ीनत अपनी माँ से शिक़ायत करती है।
नहीं, ऐसा नहीं कहते हैं ,जब तुम दस बरस की थीं ,तभी तुम्हारी फूफी ने तुम्हें अपने 'अहमद' के लिए पसंद कर लिया था ,अब तुम हमारे घर में' अहमद की अमानत हो।'यदि तुम्हारी फुफी तुम्हें पसंद न करतीं तो तुम्हारे लिए अपने अहमद का रिश्ता न लातीं।
न जाने, अहमद केेसा होगा ? ज़ीनत उसकी कल्पना करती , मन ही मन खुश होती और अपनी सहेलियों से कहती -मैं 'अहमद की अमानत' हूँ।
कौन ? अहमद ! क्या तूने उसे पहले कभी देखा है ?
नहीं ,देखा तो नहीं है ,वो हमारी फूफी रुकैया का बेटा है ,डॉक्टरी पढ़ने गया है ,आते ही उससे हमारा निक़ाह हो जायेगा।ज़ीनत की आँखों में अनजाने से ख़्वाब पल रहे थे ,एक अनजान चेहरे को मन में बसाये ,उसकी प्रतीक्षा में थी। उम्र के साथ -साथ उसका इश्क़ भी परवान चढ़ता जा रहा था।वो भी ऐसा इश्क़ जिसको पहले कभी देखा नहीं।
हर वर्ष ईद आती ढ़ेर सारी ख़ुशियाँ लेकर आती और ज़ीनत के अहमद से मिलने के दिन भी कम कर जाती। ज़ीनत का हुस्न भी परवान चढ़ रहा था किन्तु उसकी चाहत अब अहमद को देखने की हो रही थी किन्तु उससे कैसे मिला जाये ?यही मालूम नहीं था। एक दिन अम्मी से बोली - क्या' अहमद' अपने घर कभी नहीं आता ?
आता होगा,किन्तु छुट्टियों में आता होगा,तुम ये किस तरह की बातें कर रही हो ?अपने होने वाले शौहर का क्या इस तरह नाम लेते हैं ?
अम्मी !अभी वो शौहर बने नहीं हैं ,क्या ईद पर उनकी छुट्टी नहीं होती ? मैंने तो उसे कभी देखा ही नहीं। जिसे बिन देखे ही वो अपना सबकुछ मान बैठी ,अब उसे देखने की इच्छा होती ,मिलने के लिए दिल मचलता। ये सब कारस्तानी उसकी सहेलियों की थी, जो उसके मन में नए -नए ख़्याल पैदा कर रहीं थीं।
एक ने तो यहाँ तक कह दिया ,तुम्हारी फूफी ने तो तुम्हें देखा है, इसीलिए अपने बेटे से ,तुम्हारे रिश्ते की बात की किन्तु तुम्हारी अम्मी और अब्बू ने उसे देखा है या नहीं ,कहीं वो ख़ालिद जैसा हुआ तो.... कहकर सब हंसने लगीं।''
ख़ालिद'' ज़ीनत के चचाजान का बेटा था। सांवली रंगत लिए उसकी चमड़ी ,देखने में बड़ा ही क्रूर लगता ,मुँह में पान दबाये सारा दिन आवारागर्दी करता रहता । महल्ले की लड़कियों को ताड़ता रहता ,उसकी नज़र ज़ीनत पर भी थी किन्तु क़रीबी रिश्ता होने के कारण, कभी हिम्मत न हो पाई। जबसे ज़ीनत बड़ी हुई है ,तबसे बुरखे में ही है ,कभी उसे ठीक से देखा भी नहीं .....
क्या हुआ ?अपने अहमद मियां की बड़ी याद सता रही है,अम्मी ने मुस्कुराते हुए पूछा ।
नहीं ,ऐसी तो कोई बात नहीं ,शर्माते हुए ज़ीनत बोली -क्या, आपने उन्हें देखा है ? नज़मा कह रही थी -कहीं 'अहमद मियां ' ख़ालिद की तरह न हो।
ओहो !तो हमारी बच्ची को फ़िक्र है, कहीं अहमद खूबसूरत न हुए तो क्या होगा ? कहते हुए हंसने लगीं ,तब अपनी बेटी से बोलीं -तुमने अपनी फूफी को तो देखा ही है ,बस उनके जैसे ही हैं अपने ''अहमद मियां ''तुम्हारे अब्बू अपनी बच्ची को ऐसे ही 'कहीं भट्टी में न झोंकेंगे।' तुम बेफ़िक्र रहो ! अल्लाह !को मानती हो ?
हाँ !
उनसे मुहब्बत करती हो ,क्या तुमने उस अल्लाह को कभी देखा है ,कभी उससे मिली हो ?
नहीं ,
फिर भी उस पर यक़ीन है ,वो जो भी करेगा ,हमारे लिए अच्छा ही होगा ,इसी तरह उसी अल्लाह पर यक़ीन बनाये रखो !
अब तो जब भी कभी ज़ीनत की फूफी घर पर आती' ज़ीनत' उनका तहेदिल से इस्तक़बाल करती ,अब वो उनमें फूफी नहीं ,अपनी सास को देखती।
एक दिन ज़ीनत मेला देखने बाहर गई थी, वह अपनी सहेलियों के संग गई थी। वहां पर बहुत सारी प्यारी-प्यारी चूड़ियां थीं, साज -सजावट का बहुत सामान था। ज़ीनत अब उम्र से पहले ही बड़ी हो गई थी, अब वह खेल- खिलौनों से नहीं खेलती बल्कि अब उसे सिंगार करना पसंद आता ,ख्वाबों में ही सही अब अपने अहमद के लिए सजती और आईने में खुद ही अहमद बन, खुद से ही ख़ुद की तारीफ़ करती और हया से सुर्ख हो जाती। अपनी खूबसूरती बढ़ाने के लिए नई-नई चीजें खरीदती । चूड़ियां, नए-नए कपड़े जूतियां मेहंदी !इत्यादि सामान उसने लिए ,उसकी सहेली नज़मा कब उससे आगे निकल गयी। भीड़ में ज़ीनत को पता भी न चला ,पायजेब की दुकान देखकर दुकान के अंदर आई और उसने पायजेब दिखाने के लिए दुकानदार से कहा।
तब उसने पीछे मुड़कर देखा ,उसकी कोई सहेली न दिखी ,वह घबरा गयी उठकर जाने लगी ,दुकानदार ने कहा -आप बैठिये !क्या तुम्हारे साथ कोई है ?
जी ,मेरी सहेलियां हैं ,उसने जबाब दिया।
वे भी आपको ढूंढते हुए, यहीं आ जाएँगीं ,इतने आपको पायजेब दिखला देता हूँ। ज़ीनत को उसकी बात अच्छी लगी और पायजेब देखने लगी ,अब उसने अपने चेहरे से पर्दा हटा दिया था। ज़ीनत की खूबसूरती देखकर दुकानदार के मुँह से निकला -माशाअल्लाह !इससे पहले की ज़ीनत कुछ समझ पाती ,वो बोला -देखिये !ये पायजेब कितनी खूबसूरत है ? आपके पैरों में इसकी क़ीमत बढ़ जाएगी ,मेरा मतलब है ,आपके पैरों की रौनक बढ़ जाएगी।
तभी एकाएक, एक लड़का दुकान के अंदर आकर उसके करीब बैठ गया।
आप किन साहेबान की नूरे नज़र हैं ? दुकानदार ने प्रश्न किया
हमारे वालिद 'यूसुफ़ ख़ान ''हैं।
तभी बगल में बैठा लड़का बोल उठा - क्या तुम ''ज़ीनत ''हो ?
हाँ ,मगर.....
तब वो दुकानदार से बोला -ये हमारे ख़ानदान से ही हैं ,हम इनके चचाजान के बेटे हैं।
तब ज़ीनत से बोला -तुम अकेली आई हो ,क्या तुमने हमें पहचाना नहीं ....हम ख़ालिद !आज कई साल बाद पहली बार उसने ख़ालिद को देखा था ,उसे आदाब किया किन्तु तुरंत ही उसे नज़मा की बात याद आ गयी और मुँह बनाकर तुरंत ही अपने चेहरे पर हिज़ाब गिरा लिया और बोली -अब मैं चलती हूँ ,कहकर बाहर निकल गयी।
दुकानदार उसे आवाज़ लगता रह गया ,कहाँ जा रहीं हैं ?अपनी पायजेब तो ले जाइये !
ख़ालिद ने दुकानदार से पूछा -इन मोहतरमा ने कौन सी पायजेब पसंद की ?उससे पायजेब लेकर फुर्ती से वो बाहर निकला और ज़ीनत को उस भीड़ में खोजने लगा।
जीनत का चेहरा देखकर ख़ालिद समझ गया था कि ज़ीनत ने उसे देखकर अपना मुंह बनाया है किंतु इश्क़ में छोटी -मोटी गुस्ताखियां उसको कमजोर पड़ने नहीं देतीं। उस बात को नजर अंदाज करते हुए वह आगे बढ़ गया।
ज़ीनत सोच रही थी - ख़ालिद, वहां कैसे पहुंच गया ? पता नहीं , वो वहां किस लिए आया था ? कम से कम भाईजान होने के नाते उससे मिलकर, उसे ख़ुशी जाहिर करनी चाहिए थी। वो है ,तो रिश्तेदार ही...
तभी भीड़ में से किसी ने ज़ीनत का हाथ खींचा, वो बुरी तरह ड़र गयी।
