लोग कहते हैं - कि यह मेरा 'पुनर्जन्म ''हुआ है ,ताकि मैं इन लोगों से, इनके अपराध का बदला ले सकूं ,मैं अपने प्रेम और व्यवहार से इन लोगों की सोच भी तो बदल सकती थी। इनकी गलतियों का सुधार करने के लिए जो स्थिति बिगड़ी है उसको सुधारा भी तो जा सकता था किंतु उस समय परिस्थितियां आज की स्थितियों से विपरीत थीं । जिन परिस्थितियों के तहत इन्होंने मेरे साथ वह अपराध किया। वह अपराध भी, उस बंधन के कारण हुआ था, जो अब कब का टूट चुका है ?
यही तो होता आया है ,जब जिस परिस्थिति में इंसान होता है उस समय उसको जो उचित लगता है ,उससे अपने बिगड़े हालातों को संवारने का प्रयास करता है किन्तु जब हालत बदल जाते हैं। तब ऐसे में कोई दूसरा आकर उसे समझाने लगता है। यहाँ तुम सही थे ,और यहाँ ग़लत !हर इंसान की परिस्थितियां अलग -अलग होती हैं। अब ऐसे में दूसरा इंसान आकर कहे ,तुम गलत थे ,तब कितना दुःख होता है ?
जिस समय मैं इस हवेली में विवाह करके आई थी।उस समय मैंने एक विधवा के रूप में इस हवेली में प्रवेश किया था। मेरे लिए तेजस का प्रेम ही सर्वोपरि था। मुझे इस हवेली अथवा इसकी सम्पदा से कोई सरोकार नहीं था। प्रेम ही मेरे लिए बहुमूल्य था। इस हवेली के अभी बिगड़ी हुई सन्तानों में ,जवानी का जोश और ठाकुर ख़ानदान की अकड़ थी। उस समय मेरी उम्र भी तो कम थी ऐसे हालातों में मैं, उन परिस्थितियों को संभाल न सकी।
आज रूही एक समझदार हालातों से जूझ चुकी, एक मज़बूत महिला है। जो अब इंसानी फ़ितरत को पहचानती है। गलत का विरोध भी कर सकती है ,कोई उससे अनुचित व्यवहार करेगा तो उसको मुँह तोड़ जबाब भी दे सकती है। सबसे बड़ी बात.... अब उसके माता -पिता [डाक्टर अनंत और तारा ]उसके साथ हैं। हर हालत में वे अपनी बेटी के साथ खड़े हैं।
वैसे तो शिखा के माता -पिता भी उसके साथ थे किन्तु उन बेचारों को तो कुछ मालूम ही नहीं था कि इस हवेली में उनकी नाजुक़ सी बेटी के साथ क्या -क्या हुआ है ?बल्कि उन्हें तो अपनी ही बेटी के विरुद्ध गलत सूचना देकर इन लोगों ने उन्हें अपमानित किया। उस समय के हालात कितने कष्टदायक थे ?और आज पार्वती आकर मुझसे कहती है -इन्हें क्षमा कर दो !, न मानने पर मुझे धमकी भी दे रही है।क्रोध से उसकी आँखों में आंसू बह निकले '' किसी ने सच ही कहा है ,समय और इंसानी व्यवहार कब पलट जाये ?कुछ कहा नहीं जा सकता ?''
मुझे लगता है ,मुझे गर्वित को सब कुछ बता देना चाहिए ,मेरा यहाँ आने का क्या उद्देश्य था ?और मैंने यहाँ आकर क्या किया है ? वो मुझे क्षमा करता है या फिर अपराधी मान सजा देता है या दिलवाता है ,उसकी इच्छा ! अब यदि इसे मैं क्षमा करती भी हूँ ,तो ईमानदारी से इसे, मुझे सब बताना ही होगा ,ये रिश्ता अब झूठ की बुनियाद पर आगे नहीं बढ़ सकता। बाकी इसकी इच्छा ! सोते हुए गर्वित की तरफ देखकर सोचती है।
किन्तु मैं इससे अपने किये की माफी नहीं मांगूंगी, मैंने जो भी किया अपने अपराधियों को दंड देने के लिए किया। वैसे तो ये भी तो मेरा अपराधी ही है किन्तु अब शायद ये सम्भल रहा है किन्तु पुनीत और गौरव तो..... अभी भी, मुझसे गलत हरकतें कर रहे थे । मैंने तभी उन्हें सजा दी ,शायद ये सोचकर वो अपने मन को समझा रही थी कि उसने जो भी किया परिस्थितिवश किया। मन बहुत उद्वेलित था, कुछ समझ नहीं आ रहा था क्या सही है क्या गलत ?क्या मुझे अपने अन्य अपराधियों से बदला लेना चाहिए या फिर इन्हें माफ कर देना चाहिए।
यदि मैं बदला लेती हूं, इसके साथ ही अपने को भी तो दंड देती हूँ। इससे मैं क्या हासिल कर पाऊंगी ?मेरा यहाँ आने का उद्देश्य पूर्ण हो भी गया तो क्या ? क्या सम्पूर्ण जीवन एक विधवा बनकर बिताती रहूंगी ?पार्वती के कहेनुसार इस सम्पूर्ण सम्पत्ति की मालकिन बनकर क्या हो जायेगा ?क्या वो अपने जख़्म भर सकती हूँ ?क्या मैं पहले वाली शिखा बन सकती हूँ। मन में इतने विचार का ताँता लगा था ,एक जाता दूसरा जैसे पहले ही लाइन में खड़ा था।
सोच -सोचकर रूही थक चुकी थी रूही ने गर्वित की तरफ देखा, जो शायद दिनभर का थका था और अब सुख की नींद सो रहा था। रूही भी विचार शून्य हो जाना चाहती थी कुछ देर के लिए अपने मन को शांत रखना चाहती थी इसलिए ज़बरन ही सोने का प्रयास करती है।
अगले दिन, वही महात्मा, दमयंती के कोठी में प्रवेश करते हैं , उन्हें देखकर सभी अपने -अपने स्थान से उठकर उनके पांव छूकर उनका आशीर्वाद लेते हैं। वे इधर-उधर नजरें दौड़ा कर उस हवेली को देख रहे थे। जैसे वो हवेली के हर दर्द को, कोने -कोने से ढूंढ़ निकालेंगे। हवेली उन्हें बीते वक्त की कहानी सुना रही हो। दमयंती उनके समीप बैठ गई और प्रतीक्षा में थी। कब वे उन्हें आशीर्वाद दें और साथ ही सुझाव भी कि मुझे क्या करना है ?
रूही अपने कमरे में थी रूही और गर्वित को बुलाया गया। दोनों महात्मा के सामने आए ,सिर झुका कर प्रणाम कर आशीर्वाद लिया।
तब महात्मा बोले-जिस प्रकार मन अशुद्ध हो जाता है और उसको शुद्धी की आवश्यकता होती है। समाज की नकारात्मकता भी मन को अपवित्र कर देती है। तब उसे शुद्ध की आवश्यकता होती है इसी प्रकार इस हवेली को भी शुद्ध होने की आवश्यकता है, इसने बहुत कुछ देखा है। इसमें बहुत बड़ा पाप हुआ है। जिसका भार वह यह वहन नहीं कर पा रही है। अपने अभिमान में कुछ लोग, बहुत गलत कार्य कर बैठते हैं और जिनके परिणाम वह सोचते भी नहीं, आज इस हवेली में,उसी का परिणाम दिखलाई दे रहा है,' मौत नाच रही है।'
तुरंत ही दमयंती बोली -महात्मा इसीलिए तो मैं आपको बुलाना चाहती थी मैं बहुत ही परेशान हूं। न जाने मेरे इस परिवार को किसकी नजर लग गई है ?
तुरंत ही महात्मा बोले -तुम्हारी ही नजर लगी है, लालच जब सिर पर चढ़कर बोलता है तो उसकी पट्टी से है अंधा हो जाता है उसे अच्छा- बुरा कुछ दिखलाई नहीं देता। इसी प्रकार बदले की भावना भी मनुष्य को अंधा कर देती है सोचने समझने की शक्ति छीन लेती है। मैं यह नहीं कह रहा, कि जो अपराधी हैं उन्हें दंड नहीं मिलना चाहिए किन्तु इस सबसे क्या हासिल होगा ? कहते हुए रूही की तरफ देखा ,जो नजरें झुकाये उनके सामने बैठी थी।
क्या कोई मुझे बता सकता है ,उन्होंने गर्वित की तरफ देखा, और पूछा-तुम बाहर गए थे,तुमने बाहर जाकर क्या पाया? क्या तुम्हें वहां पर शांति मिली ?बाहर क्यों भटक रहे थे ? क्या तुम अपने कर्मों से अपने पापों से बचकर भाग रहे थे।
