Zeenat [part 13]

 मिसेज गुप्ता ,भूमि को बताती हैं कि अक़्सर खन्ना उसके घर आकर, उससे मिलने का प्रयास करता ,और नजदीकियाँ बढ़ाने का भी प्रयास करता। 

तब भूमि कहती है -आपको उसके विषय में' भाई साहब' को बताना चाहिए था। 

इस बात पर वो कहतीं हैं - मुझे भाईसाहब ! का सहारा क्यों लेना था ?मैं कोई कमजोर ,महिला हूँ ,वो तो मैं उसके पड़ोसी होने का लिहाज़ कर रही थी।  जब मेरे मन में कोई खोट नहीं था तो मैं, उससे क्यों दबूँगी और डरूंगी ? तब मैंने उससे पीछा छुड़ाने के लिए बहाने से कहा -,अब तुम अपनी पढ़ाई पर ध्यान दो ! तुम, मेरे यहाँ आते हो। आंटी जी को अच्छा नहीं लगता।


 दो दिनों तक तो वो नहीं आया किन्तु तीसरे दिन फिर किसी बहाने से आया। उस दिन मजेदार बात ये रही ,ये घर पर ही थे। इन्हें देखकर पहले तो हड़बड़ा गया किन्तु ये बड़ा ही शातिर है ,तुरंत ही संभलकर बोला -अरे ,भइया !आज आप यहीं हैं। मम्मी ने कहा था -जरा, अपनी भाभी को देखकर आ ! किसी चीज आवश्यकता तो नहीं। 

इन्हें बहुत अच्छा लगा ,कितने अच्छे पड़ोसी हैं ? तब ये बोले -हाँ- हाँ अपनी भाभी से आकर पूछ लिया करो ! कहीं किसी चीज की आवश्यकता तो नहीं। 

वो खुश हो गया और बोला -अच्छा ,अब मैं चलता हूँ ,जाकर मम्मी को भी तो बताना है ,आज भइया घर पर ही हैं। 

उसके जाने के पश्चात मैंने इनसे कहा -मैं कोई छोटी बच्ची हूँ ,जो ये मुझे देखने आएगा ,आपको इससे यह कहने की क्या आवश्यकता थी ?कि तुम आकर पूछ लिया करो !आपको दिखलाई नहीं देता ,कल को मैं घर में अकेली हूँ, कैसी हूँ ,किस हालत में हूँ और ये आ गया तो..... 

अपनी बात बड़ी करने के लिए ये बोले -क्या तुम मुख्य द्वार बंद नहीं रखती हो ? उसे बंद रखा करो ! जब आवश्यकता हो तभी खोलना ,मैंने तो इससे ऐसे ही कह दिया था ,क्या मैं जानता नहीं, मेरी बीवी बड़ी स्यानी है। 

तब आपने इससे पीछा कैसे छुड़ाया ?आप ये बताइये !

बड़ा ही सरल था ,ये मेरे घर आता ,उससे पहले ही मैं, इसके घर पहुंच गयी और आंटी से पूछा -आजकल ये क्या कर रहा है ,नौकरी करेगा या कोई व्यापार !

इसकी मम्मी ने जबाब दिया ,ये पढ़ता ही कहाँ है ,इसका दिमाग़ पढ़ाई में नहीं है ,कोई काम ही करेगा।

 तब मैंने ही उनसे कहा -जब व्यापार  ही कराना है तो क्यों इसकी पढ़ाई में समय बर्बाद करवा रहीं हैं। काम करवाइये !सारा दिन आवारागर्दी करता रहता है। काम करवाकर इसके लिए कोई अच्छी सी लड़की देखकर इसका विवाह कर दीजिये !इससे पहले की इसके पैर लड़खड़ाएं। 

आंटी !बहुत ही समझदार थीं ,उन्होंने मेरी तरफ देखा और बोलीं -तुम ठीक कह रही हो। आज ही तुम्हारे अंकल से बात करती हूँ। मेरी उनसे अच्छी दोस्ती हो गयी। ये मेरे घर आये ,उससे पहले ही ,मैं इसके घर जाकर  बैठ जाती और दोपहर का भोजन भी ,इसके घर ही करके भी आती। उनकी आवाज से लग रहा था ,वो अपनी चतुराई पर शायद मुस्कुरा रहीं हैं।

आपने तो बड़ी चतुराई दिखाई किन्तु आंटी की तो सज़ा हो गयी, आपको भोजन भी खिलाना पड़ा।  

इस बात पर वो हंसी और बोलीं - जब ऐसी औलाद पैदा की है, तो कौन भुगतेगा ?वे क्या स्वयं बनाती थीं ? खाना बनाने वाली थी ,मुझे तो बस आंटी से बातें करना था और अपना समय व्यतीत करना था।  इन्हें भेजकर सारा दिन फ्री होकर ,उन्हीं  के साथ लगी रहती थी। तभी तो मुझे पता चला ,अंकल ! भी ऐसे ही हैं।'' जब दुश्मन से बचना हो तो, उससे बचने की बजाय ,उसी के खेमे में घुसकर उसकी कमजोरियों का पता लगाओ ! और उसे लगे, कि तुम उसके हितैषी हो।'' 

आप भी कमाल हैं ,हँसते हुए भूमि ने कहा -ये क्या कोई युद्ध था ? 

कमाल तो करना ही पड़ता है ,गहरी स्वांस लेते हुए वो बोलीं - एक महिला के लिए ,अपने मान -सम्मान को बनाये रखना भी किसी युद्ध से कम नहीं, फिर चाहे वो उसकी ससुराल हो या फिर समाज के लोग... तब  मैं क्या अबला बनकर अपने घर में ही रहती और ये आकर मुझे तंग करता रहता और इसे चाय भी पिलानी पड़ती।'' जैसे को तैसा''

आपका ,इसके अपने घर में भी तो, इससे सामना हुआ होगा। 

हाँ ,होता था ,मुझे तिरछी नजरों से देखता और अपने कमरे में चला जाता या फिर दोस्तों के संग बाहर निकल जाता। तब मैं भी आंटी से कहती -आपके यहाँ आकर समय कट जाता है ,वरना उस घर में अकेली पड़ी रहती ,आप तो मेरी मम्मी जैसी ही हैं ,मेरा कितना ख़्याल रखतीं हैं ?अच्छा, अभी चलती हूँ ,वे आने वाले होंगे। यहाँ देखेंगे तो ,कहेंगे -सारा दिन यहीं पड़ी रहती है ,जाकर उनके लिए कुछ बनाना भी है। कई बार तो आंटी इनके लिए भी भोजन दे देती थीं। जब मैं उनसे कहती -'आपने इतना खिला दिया अब भूख ही नहीं है ,किन्तु इनके लिए तो जाकर बनाना ही पड़ेगा।' 

तब वो कहतीं -खाना अभी बचा है ,अब उसके लिए क्या भोजन बनाएगी ?वो भी हमारे बालक जैसा ही है ,उसे भी ले जा !

मना करते -करते ,मैं ले आती। 

मतलब !

मैं मना करती रहती और वहीँ खड़ी रहती ,जब तक वो तारा से भोजन टिफ़िन में नहीं भरवा लेतीं। अपने घर आकर ताला भी लगा लेती ,ताकि वो मुख्य द्वार खोलकर सीधे घर में न चला आये। इस तरह से ''सांप भी मर गया और लाठी भी नहीं टूटी। '' 

तभी आपको भोजन बनाने की इतनी आदत नहीं है ,हंसकर भूमि बोली। 

इस बात से वो चिढ गयीं और बोलीं -क्यों ?अपने बच्चों के लिए तो बनाती थी,उन्हें मैंने ही तो पाला है। 

हाँ ,मालूम है ,आप ये बताइये !आपका ये कार्य कब तक चला ?जब खन्ना के पिता ऐसे थे ,तो उन्होंने कभी आपको गलत नज़र से नहीं देखा। 

कैसे देखते ?क्योंकि  मैं तो जाते ही उनकी बेटी बन गयी थी और दूसरी बात,' वो काम भी करना चाहते थे और ये भी चाहते थे, किसी को पता भी न चले।' समाज में सम्मान के साथ भी जीना चाहते थे इसीलिए अड़ोस -पड़ोस पर नजर थोड़े ही रखेंगे। वो तो ये खन्ना ही ऐसा हुआ है। 

खन्ना से कब पीछा छूटा ?

ये समझ गया था ,कि मैं आसानी से निगलने वाली मक्खी नहीं हूँ और फिर अंकल- आंटी के साथ मिलकर इसके लिए लड़की भी तो ढुंढवाई ,ताकि इससे मेरा पीछा छूटे और छूट भी गया।

आपने भी न... उससे अपना पीछा छुड़ाने के लिए बेचारी भाभी जी को फंसवा ही दिया। आज  बेचारी वे उसे भुगत रहीं हैं। 

मैंने कोई जबरदस्ती थोड़े ही की थी ,भाभी जी के पापा ही ,इनका रिश्ता जाने के पश्चात इतने खुश हो गए ,उन्हें तो लग रहा था ,हमारी बेटी के तो जैसे भाग्य खुल गए। बाहर से देखने पर तो ये परिवार बड़ा ही सभ्य और संस्कारी नज़र आता है। अंदर की बात तो मैं ही जानती हूँ। 

तब आपको उन्हें फंसने बचाना चाहिए था। 

क्यों ?किसी न किसी से तो इसका विवाह होता ही.... वैसे ये भाभीजी बहुत अच्छी हैं। बहुत पूजा -पाठ करती हैं। आंटीजी ने जो भी सिखाया ,सब सीखा ,उनके तो जैसे भाग्य ही खुल गए थे। इतनी अच्छी बहु पाकर तो ये खन्ना भी सब कुछ भूल गया था। वो तो बच्चे होने पर इसे एहसास हुआ कि इसकी एक अलग सोच और दुनिया भी है।   


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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