zeenat [part 12]

मिसेज गुप्ता से, जब भूमि ने ,उनके पड़ोसी 'मिस्टर खन्ना' के विषय में पूछा ,तब उन्होंने बिना किसी झिझक के उनके ही नहीं, उनके सम्पूर्ण ख़ानदान की पोथी खोल डाली। ज़ीनत के कहने पर अभी तक भूमि को  विश्वास नहीं था, किन्तु अब तो मिसेज गुप्ता भी, उसके विषय में बिंदास बोल रहीं थीं। शायद उन्हें इस बात का भी भय नहीं था कि किसी ने खन्ना को बताया, कि वो ऐसा बोल रहीं थीं ,तब उनकी प्रतिक्रिया क्या होगी ? न ही, उन्होंने भूमि से इस बात का कोई वायदा लिया ,कहीं उनके सामने 'मैं' कुछ बोल न दूँ। 

जब भूमि ने कहा -मोेहल्ले की बात है ,मेरा नाम न आ जाये। 


तब वो बोलीं - तुम इसकी चिंता न करो !इसको यहाँ सब जानते हैं ,बस, बोलता कोई नहीं है। इसका बस चले तो ये, मौहल्ले की बहु -बेटियों को भी न छोड़े किन्तु ये लाभ उठाने वाला व्यक्ति है। 

वो कैसे ? 

अपनी तरफ से कभी पहल नहीं करता ,नजर सब पर रखता है। जैसे ही इसे, कोई मजबूर ,बेबस ,जरूरतमंद महिला दिखती है ,उसकी सहायता के लिए सबसे आगे आता है और जब उस पर एहसान कर देता है तो वो इंकार भी नहीं कर सकती ,इसीलिए इसकी सताई कोई औरत इसके विरुद्ध मुँह भी नहीं खोलती। वो , यह सब सहर्ष स्वीकार कर लेती है या फिर मजबूरी में इसको झेलती है। 

ये तो बिल्कुल फ़िल्मी ख़लनायक की तरह है ,भूमि ने मुस्कुराकर जबाब दिया। 

अजी ,ऐसा कहाँ है ? उससे भी' खतरनाक' है ,मिसेज गुप्ता ने भूमि की बात का प्रतिवाद किया। 

क्यों ?फ़िल्मों में बदमाश ऐसे ही तो होते हैं। 

एक गहरी स्वांस लेते हुए, वो बोलीं - ये उनसे ज़्यादा ख़तरनाक है ,उनका पता तो होता है ,कि वो गुंडे हैं  ,जो भी करेंगे गलत कार्य ही करेंगे। उन्हें इस तरह का काम दिया जाता है किन्तु इसको देखकर आप बता नहीं सकतीं कि ये किस तरह का इंसान है ? ये ''भेड़ की खाल में छुपा भेड़िया है।''ये लोगों की सहायता के लिए आगे आता है और फिर मौका देखकर झपटने का प्रयास करता है। 

आप इनके विषय में इतना सब जानती हैं ,कहीं आपके साथ तो...... कहकर भूमि मन ही मन थोड़ा घबराई ,कहीं ये बुरा न मान जाएँ। 

किन्तु विलम्ब किये बग़ैर वो बोलीं -तभी तो मुझे, इसकी असलियत मालूम है। जब मैं यहाँ आई थी ,तब मेरा विवाह ही हुआ था। मेरी सास ने पहले ही सोच रखा था। गुप्ता जी , दो भाई हैं। उनका एक मकान वहां था जहाँ मेरा विवाह हुआ ,दूसरा ये वाला था। तब मेरी सास ने इनसे कहा -अब तुम दोनों दूसरे घर में रहने लगो ,मैं भी खुश थी, कि दोनों मियाँ -बीवी मजे से रहेंगे। न ही किसी की रोक -टोक ,न ही किसी तरह का बंधन।

फिर क्या हुआ ?

अच्छा ! देखो !मेरी कहानी में कैसी दिलचस्पी ले रही हैं ?जब मैं कहती हूँ ,घर मिलने आ जाओ !तो आती नहीं ,उन्होंने ताना दिया। 

आप तो जानती ही हैं ,बेटा ,अभी छोटा है और इन्हें कोई चीज समय पर न मिले तो इनका'' गुस्सा नाक पर बैठा रहता है। ''घर के कितने काम हो जाते हैं ,अभी भी आपसे बातें करते हुए ,कपड़ों पर स्त्री कर रही हूँ। 

इतना काम मत किया करो !कुछ समय अपने लिए निकाला करो !अभी तुम काम कर रही हो ,सभी चीजें समय पर करके देती हो। तो अच्छी लग रही हो वरना..... तुम उनकी नहीं ,वो तुम्हारे नहीं। सभी रिश्ते मतलबी हैं ,ये आदमी लोग....  किसी के भी सगे नहीं होते ,इनके लिए चाहे ,तुम अपना जीवन ही न ख़पा दो !

ऐसा नहीं है ,हमारे मिश्रा जी ऐसे नहीं हैं ,हमसे और परिवार वालों से बहुत प्यार करते हैं। वो ही तो इस घर को चला रहे हैं। 

और तुम क्या कर रही हो ?तुम क्या'' ख़ाक छान रही हो ? '' अरे वो जो कमाकर ला रहे हैं ,तुम उसमें बरक़त करती हो। तभी तो वे चार पैसे जोड़ पाते हैं वरना कपड़ों पर स्त्री तो बाहर भी होती है। तब तुम उस पैसे से बाहर प्रेस करके क्यों नहीं मंगवा लेती ? वो इसीलिए कि तुम उनकी मेहनत की कमाई को अपने भविष्य के लिए ,अपने बच्चों के लिए बचाकर रखना चाहती हो। पता नहीं, औरतें ही अपनी क़द्र करना कब सीखेंगी ?

दरअसल,दोनों के साथ मिलकर, काम करने से ही तो घर चलता है ,वो कमाकर ला रहे हैं और मैं उनके घर को संवार रही हूँ। दोनों ही अपना -अपना कर्त्तव्य निभा रहे हैं। इसमें कोई किसी पर एहसान नहीं कर रहा  हैं। जितना उनका परिवार है ,उतना ही मेरा !अब मेरे काम की वो, या उनके परिवार वाले क़द्र नहीं करते हैं। तो यह मेरी गलती नहीं होगी। कम से कम उनसे नजऱें मिलाकर ,मैं ये तो कह सकती हूँ ,कि आपके सुख -दुःख में मैंने, हमेशा आपका साथ निभाया।

 कल को वो ये नहीं कहेंगे -कि तुम अपनी खुशियों या स्वार्थ के लिए अपनी जिम्मेदारियां न निभा सकीं। ज़िम्मेदारियों से भाग खड़ी हुईं। मैं तो ये मानती हूँ ,जो भी कार्य करो !पूरी ईमानदारी और निःस्वार्थ भाव से करना चाहिए। अब उसके बदले तुम्हें क्या मिलता है ? यह तो समय ही बताएगा। अनिष्ट की आशंका से ,हम अपने उत्तरदायित्वों से मुख तो नहीं मोड़ सकते। आगे जैसी परिस्थितियां आएँगी ,उनका भी सामना करेंगे। 

तुम और तुम्हारी बातें ! कहकर वो कुछ देर चुप रहीं ,शायद उन्हें भूमि के विचार, उसकी बातें पसंद नहीं आये।

  अच्छा ये तो बताओ  !आप जब इस मकान में आईं ,तब क्या हुआ ?खन्ना ने आपसे कुछ कहा। 

अपनी आदत के मुताबिक ,अपनी कोठी से निकलकर बाहर आया और अच्छे पड़ोसी होने का फ़र्ज निभाते हुए ,मेरी सहायता के लिए ,सामान रखवाने लगा। बड़ी विनम्रता से मुझे उसने भाभी बना लिया -नमस्ते, भाभी जी ! जब इसका विवाह नहीं हुआ था ,तब तक ये अपने बाप को देखकर ही, उसके लक्षण सीख रहा था। मैंने भी सोचा ,इसमें क्या बुराई है ? थोड़ी सहायता हो जाएगी,उम्र में मेरे साथ का ही तो है। 

फिर क्या हुआ ?

होना क्या है ? इसने मेरे यहाँ आना -जाना कर लिया ,कभी चाय के समय आ टपकता ,कभी किसी चीज को लेने के बहाने आ जाता। ये तो अपने काम पर चले जाते ,तब ये आ जाता। कुछ दिनों के पश्चात मैंने महसूस किया ,जब घर में ये नहीं होते ,ये तभी आता है। अब मेरा इतना कोई काम भी नहीं रह गया था। हम दो पति -पत्नी ही तो थे ,बच्चे भी नहीं हुए थे। इसने कुछ मेरी पढ़ाई के बारे में जानना चाहा और बातें करने के लिए कुछ न कुछ बात निकाल ही लेता था।  किन्तु अब मैं महसूस करने लगी थी, ये किसी न किसी बहाने मुझे छूने का प्रयास करता है। मेरे करीब आने की कोशिश करता है। 

तब आपको गुप्ता जी को बताना चाहिए था। 

अच्छा !और वो सच मान लेते, मैं सही हूँ ,मुझ पर विश्वास कर लेते।

नहीं ,मेरे कहने का मतलब था ,यदि आप उनसे बतातीं कि ये लड़का मुझे सही नहीं लग रहा है। तब तो भाईसाहब, आप पर विश्वास करते। इस तरह उसको, आपके साथ देखकर भी तो अविश्वास ही कर सकते थे ।


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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