Mysterious nights [part 170]

 तेजस की पत्नी बेवा थी, उसके साथ अनजाने ही मुझसे अपराध हो गया, उसके लिए मैं क्षमा चाहती हूं,दमयंती गिड़गिड़ाते  हुए बोली - किंतु अब क्या ? अभी भी तो कुछ भी ठीक नहीं चल रहा है । 

चलेगा कैसे ? उसका श्राप जो लगा है,तुमने जो भी अपराध किये ,अनजाने में नहीं थे।तुम्हें सोचने -समझने के  बहुत मौक़े मिले थे ,तुम सम्भलना चाहती तो.... अपने बच्चों को समझा सकती थीं ,अपनी बहु को समझने का प्रयास कर सकती थीं किन्तु उसके साथ जो तुम लोगों ने वहशी व्यवहार किया है ,वो क्या क्षमा योग्य है ? क्या तुम, किसी को मारकर जिन्दा वापस ला सकती हो ? सुनयना देवी जो इस हवेली की भलाई चाहती थी। वही इसका उपाय भी ढूंढकर लाती किन्तु तुमने तो उसे भी ,अपनी गलतियों को सुधारने तक का मौका ही नहीं दिया। वो जिन्दा होती तो शायद, तुम्हें ये पाप और गलतियां करने से रोक भी लेती। अब जब तक उसका श्राप  शांत नहीं होगा , तब तक हवेली इसी तरह विरान होती  रहेगी। 



यह आप कैसी बातें कर रहे हैं ? आप मुझे कोई उपाय तो बताइए ताकि मैं अपने परिवार के लोगों को  उसके श्राप से बचा सकूं, पहले ही मेरी सास ने, उन्हें बंधन में बांधकर उनके जीवन को इतना बड़ा अभिशाप दे दिया था। अब उस विधवा का श्राप !! मैं ये सब कैसे झेल पाऊंगी ?गिड़गिड़ाते हुए बोली।  

यह तो तुम्हें कर्म  करने से पहले सोच लेना चाहिए था ,उन महात्मा ने क्रोधित होते हुए कहा। 

नहीं, प्रभु! कृपा कीजिए ! मेरे दो ही बच्चे बचे हैं ,उन्हें बचा लीजिये ! क्या अब वह बंधन टूट गया ? उसकी नई पत्नी आई है, वह कहती है -' वह इस नियम को नहीं मानेगी, यह बंधन अपने आप ही टूट चुका है।' कृपा कीजिए !कोई राह सुझाइए ताकि मेरी हवेली फिर से, चमक उठे ,उसमें चहल-पहल हो, खुशियां हों  और बच्चों की किलकारियाँ भी  गूंजने लगे। 

अब कुछ नहीं हो सकता, नाराज होते हुए उन तांत्रिक ने कहा। वह अपना बदला लेने आई है और लेकर ही रहेगी। 

कौन आई है ? वो किस तरह बदला लेगी ?

 तुम्हारा एक पुत्र तो अब जा चुका है , दूसरे की तैयारी कर लो ! उन महात्मा ने कहा।

 यह आप कैसी बातें कर रहे हैं? मैं आपके पास बहुत सारी उम्मीदें लेकर आई हूं। कृपया मेरे बच्चों को बचा लीजिए। अब तो मेरे पांच बच्चे, रहे ही नहीं ,तीन गए ,दो ही रह गए हैं ,ये तो चार का बंधन था फिर ये बंधन कैसे टूटा ? क्या बाबा के आशीर्वाद का भी असर नहीं रहा ?

 अभी तो ,तुम्हें बहुत कुछ देखना बाकी है, कुछ नहीं कर सकता। वो गिन -गिनकर बदला ले रही है , उसके मन में तुम्हारे प्रति क्रोध है, वह तुम्हें कभी क्षमा नहीं करेगी, यदि वह तुम्हें क्षमा कर देती है ,तो शायद तुम्हारे पुत्र बच जाएं । कौन है, वो ! क्या शिखा की आत्मा मेरे बच्चों से बदला ले रही है ?

दमयंती की बात सुनकर महात्मा जी को हंसी आ गयी ,और बोले -तू ,क्या समझती है ? तूने उसका अंत कर दिया। 'जाको राखे साइयाँ ,मार सके न कोय। ''

आश्चर्य से दमयंती ने पूछा -महात्मा जी ! क्या शिखा जिन्दा है ? जिन्दा है, तो कहाँ है ? मुझे बताइये !मैं उससे मिलूंगी और माफी मांग लूंगी। मेरे बच्चों की जान बख़्श दे !

 अब इससे,क्या कुछ हो होगा, अब  तू ,यहां से जा ! जो अपराध तूने किया है, उनका दंड भोगना निश्चित है , तेरी सास ने तो छोटा ही अपराध किया था किंतु तूने तो बड़े-बड़े अपराध कर डालें हैं। इस संसार में यही तो होता है, इंसान अपने बड़े-बड़े अपराधों को भी नहीं देखता और दूसरों  के राई जैसे अपराध को भी पहाड़ समझ बैठता है। 

कृपा कीजिए, महाराज ! मेरे बच्चों को बचा लीजिए। तभी एकाएक दमयंती अपने आंसू पोंछते हुए बोली - यदि आप मेरी सहायता नहीं करेंगे तो मैं वापस हवेली नहीं जाउंगी ,जहाँ मेरा पति और बेटा अपने 'अंतिम संस्कार' की प्रतीक्षा में हैं।

 दमयंती के इस तरह बार -बार गिड़गिड़ाने पर महात्मा कहते हैं - तू बड़ी जिद्दी है। ठीक है, मैं ! कुछ दिनों  के पश्चात तेरे घर आऊंगा और उस हवेली के श्राप की  शांति के लिए कुछ उपाय करूंगा और हवन करूंगा तब तक संभलकर रहना। अब तू जा सकती है, कह कर वह अपने कार्य में तल्लीन हो गए।

किन्तु बाबा !इस बीच उसने कुछ कर दिया तो.... तो क्या होगा ?

नहीं करेगी ,मैं उससे पहले ही आ जाऊंगा। 

 दमयंती को कुछ भी समझ नहीं आया उन्होंने किस और इशारा किया था उसे आश्चर्य हो रहा था कि इन महात्मा को मालूम है, कि  सुनयना देवी की हत्या मेरे ही हाथों हुई है और शायद शिखा भी जिन्दा है। साथ ही उसका महात्मा के प्रति विश्वास भी बढ़ गया था।

तब वह जाते -जाते वापस लौटी और पूछा - बाबा ! क्या वो जिन्दा है ,है ,तो कहाँ है ?मुझे बता दीजिये। 

ताकि तू, फिर से उसे मारने का प्रयास करे ,वो जहाँ भी है ,ठीक है ,मैं, उससे बात कर लूंगा। 

 दमयंती, रास्ते में सोचते हुए आ रही थी -मैंने, अपने लालच में चारों की पत्नी बनना स्वीकार तो कर लिया था और मैं शांतिपूर्वक जीना भी चाहती थी किंतु जब मैंने अपनी सास के मुख से अपने चारों बेटों के लिए बंधन सुना तो मुझे अत्यंत क्रोध आया। मैं नहीं चाहती थी, कि मेरे बच्चों पर भी ऐसा ही कोई नियम लाध दिया जाये।

  किंतु मैं कर भी क्या सकती थी ? वो चारों बेटों के साथ अच्छा व्यवहार करती थी किंतु मेरे पांचवें बेटे के साथ सौतेला व्यवहार करती थीं।  यह बात मुझे कतई अच्छी नहीं लगती थी, मैं हर बार इस बात को नजर अंदाज करने का प्रयास करती ,किंतु एक दिन तेजस के हाथ से कांच का एक बहुत बड़ा मर्तबान टूट गया था। उसके टूटने का स्वर आज भी मेरे कानों में गूंजता महसूस होता है साथ ही ,उसके  टूटते ही सुनयना देवी का कठोर स्वर भी उसके कानों में गूंज गया और फिर चटाक !!गालों पर तेज तमाचा पड़ते ही  तेजस , रोता हुआ मेरे क़रीब आया और उसके गाल लाल हो गए थे। उसे साथ लेजाकर मैंने उनसे पूछा था - 'आप अक्सर मेरे इस बेटे से ही' सौतेला व्यवहार'क्यों करती हैं ? 

उन्होंने कहा -'मेरे चारों बेटों से चार संताने हैं, यह तेरे प्रेम की अलग से एक निशानी है जो इस परिवार से मेल नहीं खाती।' 

मैंने उनसे कहा- तो क्या हुआ ?यह भी तो आपकी औलाद का ही अंश है। क्या उनको यह बात समझ में ही नहीं आती ?

विचारों में मग्न वो कब घर पहुंच गयीं ,उन्हें स्मरण ही नहीं रहा , घर में प्रवेश करते ही, उन्हें फिर से वही बात स्मरण हो आई ,कुछ देर पश्चात वो अपने  लोगों के संग थीं। अब जैसे उन्हें एहसास हुआ कि उनका बेटा उनसे बहुत दूर चला गया है ,जिसे अब वे कभी नहीं देख सकेंगी। उनकी आँखों से झर -झर आंसुओं की झड़ी बहने लगी। 

कविता और रूही दोनों ही जानना चाहती थीं कि दमयंती जी अब तक कहाँ थीं ? किन्तु किसी का भी उनसे कुछ भी पूछने का साहस न हुआ।

कुछ ही देर में गर्वित आ गया और अपने भाई और पिता को देखकर फूट -फूटकर रोने लगा। मेरे भाई तुझे क्या हुआ ?तेरे साथ ये सब किसने किया ? तू इस तरह मुझे छोड़कर नहीं जा सकता। अपने साथ पापा को भी ले गया। उसके कुछ देर पश्चात ही,सुमित भी आया उसके साथ ही ,रूही के माता -पिता और उसकी बहन ने हवेली में प्रवेश किया। सभी को आश्चर्य हुआ ,सुमित इन लोगों के साथ कैसे ?

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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