रूही ने जिन बुजुर्ग़ को हवेली के आस -पास कई बार देखा था ,उन्हें आज भी ,उस हवेली की तरफ उदास नजरों से देखते हुए देख लिया। जब पुनीत और जगतसिंह की शवयात्रा में सब जा रहे थे ,तब हवेली के पिछले रास्ते पर जाकर रूही ने, उन्हें पहचानते हुए पूछा -आप हवेली में क्यों नहीं आते ?जबकि आप इस हवेली के मालिक हैं।
वो भी रूही को पहचान गए कि यही शिखा है ,तब वो उसे बताते हैं -मेरी पत्नी सुनयना को , तुम्हारी सास दमयंती और जगतसिंह ने ही मारा था, उनके कथनानुसार भले ही वो एक हादसा था किन्तु वे मुझसे मेरी पत्नी की ख़बर एक वर्ष तक छिपाये रहे।
एक दिन उन्हीं के मुख से जब मुझे पता चला कि मेरी सुनयना अब इस दुनिया में ही नहीं है ,मुझे बहुत दुःख हुआ ,सबसे ज़्यादा इस बात ने मुझे तोड़ दिया कि मेरे बच्चे ही ,मुझसे ही झूठ बोलते रहे। इंसान से गलती हो जाती है ,यदि उसे पछतावा होता है ,तो अपने किये कि' क्षमा याचना' भी तो करता है किन्तु अपने पाप को छुपाता नहीं है ,इन्हें तो जैसे अपनी माँ के जाने का तनिक भी अफ़सोस नहीं था।
तब मैं ,उन दोनों के सामने गया ,और उनसे पूछा - तुम लोगों ने मेरे साथ ऐसा क्यों किया ?
मुझे सामने देखकर, दोनों सफेद पड़ गए,'काटो तो खून नहीं' घबराकर तब दमयंती हाथ जोड़कर आगे आकर बोली -पापा जी ! उन्होंने तेजस को बहुत डाँटा था , उस पर हाथ भी उठाया था। उस दिन मुझे भी उन पर गुस्सा आ गया और मैंने उनको अलग करने के लिए धक्का ही दिया था। धक्का देते ही उनका सिर बड़ी जोरों से खम्बे में जाकर लगा जिससे वो चक्कर खाकर गिर पड़ीं। मुझे मालूम नहीं था ,ऐसा कुछ हो जायेगा ,वैसे यह सब मैंने जानबूझकर नहीं किया था, अनजाने में ही हुआ था।
बहु ! तुम्हें ,तो मैं अच्छे से जान गया हूँ ,तुम लालची तो हो ही किन्तु तुम्हें इस बात का भी क्रोध था कि उसने विवाह के समय तुमसे कहा था -'ये धन -सम्पत्ति सभी तुम्हारी है किन्तु उसने विवाह के पश्चात भी इस हवेली की चाबियाँ तुम्हें नहीं दीं। इस बात का भी तो तुम्हें क्रोध होगा। क्या तुम लोगों ने यह भी जानने का प्रयास नहीं किया कि वो ज़िंदा है या.... डॉक्टर को भी नहीं बुलाया। अपने आप ही सब तय कर लिया, किसी को बताया भी नहीं। मैंने कितनी बार पूछा था ? सुनयना कहाँ है ?
नहीं, पापा जी ! ऐसी कोई बात नहीं है ,आप हमें गलत समझ रहे हैं।
अच्छा ,क्या माँ -बाप अपने बच्चों को भी नहीं समझेंगे ? अच्छा ,ये सब छोडो !क्या यह बात तेजस को मालूम है ?
नहीं ,वो तो बस इतना जानता है,उसकी दादी का इलाज़ चल रहा है।
किंतु अपराध तो अपराध है ,यह बात मैं भी जानता था -सुनयना , तेजस के साथ सौतेला व्यवहार करती है।तुमने इतना सब अकेले कैसे कर लिया ?
नहीं ,पापा जी, जब मैंने जगत को बताया ,अचानक ही इस तरह से दुर्घटना हो गई है और उनकी मम्मी नहीं रहीं , तब उन्होंने चुपचाप मम्मी को बगीचे के पेड़ के नीचे दबा दिया ताकि घर के अन्य लोगों को कुछ पता ना चल सके।
ये कितना कठोर हो गया ?जिस माँ ने इसे इतने लाड़ -चाव से पाला, इसने अपनी माँ को मिटटी में दबाने में तनिक देर नहीं की। न ही उसका कोई संस्कार किया और अंतिम समय में मुझे भी उसे देखने नहीं दिया। यदि यह मात्र एक दुर्घटना होती ,तो इस तरह चुपचाप ,छुपकर तुम लोग ये कार्य न करते ,मुझे तो दुःख इस बात का है ,मेरी अपनी ही औलाद ने मेरे साथ छल किया।
जगत अब तक चुपचाप बैठा, हमारी बातें सुन रहा था और रो रहा था। उसका चेहरा पश्चाताप के आसुओं से भीग गया था।
घर में सभी ने जब अपनी माँ के लिए पूछा -मम्मी कहां है ?तब 'हरिराम' ने कहा -'वह घूमने के लिए तीर्थ स्थल गई है।'उससे यह बात किसने कही ? क्या वो अपने पति और अपने बच्चों से पूछे बग़ैर' तीर्थ स्थल 'में घूमने निकल पड़ी। आज तक तो उसने कभी ऐसा नहीं किया। इतने सारे 'तीर्थ स्थल' हैं, किसी को कुछ बताकर नहीं गयी कहाँ गयी हैं ?न ही किसी ने जानने का प्रयास किया।
ठाकुर साहब की, सुनयना देवी अब इस दुनिया में नहीं रही, और इस सब का जिम्मेदार उनका अपना बेटा जगत और उनकी बहू है। यह सब जानकर उन्हें बहुत दुख हुआ। अब उनका मन उस हवेली में नहीं लग रहा था। वह अपने को अपनी पत्नी का अपराधी मान रहे थे और एक दिन वो चुपचाप बिना किसी को बताए उस हवेली से निकल गए। यह बात सिर्फ उनका एक विश्वसनीय नौकर ही जानता था कि वो इस समय कहां है ?
मोह ,माया इतनी आसानी से पीछा नहीं छोड़ते ,वे चाहते तो अपनी बहु और बेटे को, अपनी माँ की हत्या के अपराध में उन्हें जेल भी भेज सकते थे किन्तु इस सबसे सुनयना देवी तो वापस नहीं आ जाएँगी ,इसीलिए उन्होंने हवेली से दूरी तो बना ली किन्तु मोह नहीं छूटा। अक्सर वह हवेली की खबरें वही नौकर उन्हें देता रहता था।
कभी- कभार उस हवेली को देखने चले आते थे, इतने मन से उन्होंने अपनी यह हवेली बनाई थी। और आज वह हवेली तिनका -तिनका होकर बिखर रही है। इस हवेली के कर्मों की सजा अब इस घर के लोगों को मिल रही है।
इंसान अपने जीवन में कई तरीके से काम करता है , कई बार उससे अच्छे कर्म भी हो जाते हैं और कई बार बुरे भी, हवेली की दीवारें उन कर्मों का लेखा-जोखा रखती हैं। समय के साथ-साथ, उन कर्मों का दंड भोगते हुए भी, उन लोगों को देखती हैं। कहने को तो ये बहुत शांत रहती हैं , किंतु एक-एक पल का हिसाब उनके पास होता है। शिखा के साथ जो कुछ भी उस परिवार के लोगों ने किया, वह सब भी इस हवेली ने इस हवेली ने मौन रहकर देखा।
अब हवेली के लोग, किस तरह तिनका तिनका बिखर रहे हैं इसकी गवाह भी यह हवेली बन चुकी है। कौन किसको क्षमा करता है ? कौन किसको दंड देता है ? सबका लेखा-जोखा इसके पास है किंतु यह मौन रहकर सब कुछ देखने पर विवश रहती है। किसी से कुछ नहीं कहती , बस समय की प्रतीक्षा में, खड़ी रहती है।
ठाकुर साहब अपने बच्चों को अंतिम विदाई देने के लिए आए थे, वहां पर उनकी भेंट रूही से हो गई , उसे सब बताया और चले गए। मन ही मन रूही सोच रही थी, इस जीवन में क्या है ? या तो इंसान दंड देता है या फिर सहन करता है किंतु सब कुछ लौट कर वापस आता है ,जिस तरह मैं इस हवेली में, अपना बदला लेने के लिए वापस आई हूं। इन लोगों को अपने गुनाहों का परिणाम तो भुगतना हीं होगा, तभी उसे पारो के शब्द स्मरण हो आए, जब उसने कहा था-' सुमित को मेरे लिए छोड़ देना। ' इस बात से उसका क्या तात्पर्य था ? कुछ समझ नहीं आया। वह भी उन लोगों के साथ, शमशान घाट की तरफ गई है ,जब आएगी तब उससे बात होगी ,यह सोचकर वह हवेली में प्रवेश करती है।
