Mysterious nights [part 174]

 यह हवेली, अब कितनी सुनसान लग रही है ?' मौत का मातम' जो छाया हुआ है।  कुछ देर पहले, यहां विलाप हो रहा था। अपनों के बिछड़ने का दर्द भरा विलाप ! किंतु अब कितनी शांत है ? आंधी से पहले की शांति है या फिर यह हवेली कुछ दिन शांत रहना चाहती है। रूही ने हवेली को एक नजर देखा, एक नजर में तो यह हवेली देखी  ही नहीं जा सकती, इतनी बड़ी जो है। इसे शायद अपने बड़े होने पर गुरुर आ गया था। यदि मैंने इससे अपना बदला लिया, तो इस हवेली के आंसू पौंछने वाला भी कोई नहीं रहेगा।यह भी तो उतनी ही गुनहगार है ,मौन होकर सब देखती रही। मेरी चीख़ें इसके अंदर ही घुटकर रह गयीं ,इसने उन्हें बाहर भी नहीं जाने दिया।


  मैं मानती हूं, उस समय, गर्वित भी उन लोगों के साथ था किंतु अब वह नहीं जानता, मैं वही शिखा हूं। उस समय कम से कम एक बार तो प्यार का मरहम लगा देता , उस समय तो ये भी उन्हीं की तरह 'वहशी' बना हुआ था।

 किंतु इस समय रूही के रूप में तो यह मुझसे  बहुत प्यार करता है ,आज तक मुझे छुआ नहीं है, न ही मैंने उसे छूने दिया किंतु इतना ही काफी नहीं है। उसके कर्मों का परिणाम तो, उसे भी भुगतना होगा। अभी वह यही सब सोच रही थी। तभी घर के अन्य लोग वापस आ गए। सभी के चेहरे उदास थे, पारो, रूही के कमरे में आई उसका चेहरा शांत था और एक कुर्सी पर बैठकर गंभीर स्वर में बोली -बस, अब यह सब यहीं  रोक दो ! इससे आगे और नहीं ....

गुनहगार तो सभी हैं, तो सबको समान दंड क्यों नहीं ?

इस तरह तो तुम भी गुनहगार बन गई हो,कभी तुमने सोचा है , तुम अब तक तीन हत्याएं कर चुकी हो। 

तीन नहीं दो ! उसके पिता तो स्वयं ही चल बसे। 

उनकी भी हत्या का अपराध !अपने सिर कौन लेगा ? कारण तो तुम ही रही न.... अब तो तुम भी अपराधी बन गई हो। 

यह सब परिवर्तन तुम्हारे मन में कैसे आया ? तुम तो स्वयं मुझसे कह रही थीं  -कि मुझे अपने अपराधियों को दंड देना होगा,उनसे बदला लेना होगा।  

हां, कह रही थी, किंतु उनके अपराधों का दंड देते -देते, हम स्वयं भी तो अपराधी बन जाते हैं, हमारे  किए की सजा कौन देगा ? हमारे अपराध भी तो कोई देख ही रहा होगा। 

हो सकता है, तुम्हारे अगले शिकार से पहले ही, इन लोगों को मालूम हो जाए कि ये हत्याएं तुमने ही की हैं। ये लोग , तुम्हारे खून के प्यासे हो जाएंगे। हो सकता है ,ये भी तुम्हें मारना चाहेंगे।' बदले की भावना' तुम्हें फिर से इनका दुश्मन बना दे।  इस तरह तो यह अपराध कभी समाप्त ही नहीं होगा। तब तुम कहां जाओगी ?गर्वित जो तुम्हें प्यार करने लगा है ,सच्चाई का पता चलने पर वो तुमसे नफऱत करने लगेगा। 

मैं, उसके प्यार के लिए यहां नहीं हूँ ,मैं यहां अपना बदला लेने आई हूँ दृढ़ स्वर में रूही ने जबाब दिया। 

इसके पश्चात क्या ?? क्या वापस मौसा - मौसी के घर.... जाकर रहोगी या फिर गर्वित के साथ शांतिपूर्वक इस हवेली में रहना चाहती हो। किसी को कुछ पता नहीं चलेगा, तुम्हारा बदला भी हो गया और तुम हवेली की मालकिन भी बन गईं ।

 मुझे मालकिन बनने का कोई लालच नहीं है ,मेरे गुनहगारों में अभी दो ज़िंदा हैं।  

जानती हूं, किंतु अब इस हवेली में तुम्हारे दो ही गुनहगार रह गए हैं , सुमित और गर्वित !अब तुम एक अच्छी पत्नी की तरह तुम गर्वित के साथ रहो ! तुम क्या पागल हो गयी हो ,इतनी बड़ी हवेली धन -सम्पत्ति भला कौन छोड़ता है ? अब तुम्हारा एक ही पति होगा। 

सुमित को क्यों छोड़ना है ? उसकी तस्वीर पर नजर रखते हुए, रूही ने पूछा -और यह तुम लोगों के साथ कैसे आया ?बहुत देर से यही बात मुझे ख़ल रही थी। 

यह हमारे साथ ही था, दरअसल हुआ यह था , पिछली बार जब मैं गौरव के लिए यहां आई थी , तब सुमित से मेरी मुलाकात हुई थी। हम आपस में एक दूसरे से बातचीत करते थे, मिलते थे और मुझे लगता है अब हम एक दूसरे को  प्यार करने लगे हैं। 

क्या ??आश्चर्य से रूही की आँखें फैल गयीं ,और पूछा - तुम इस हवेली के सारी बातें जानते हुए भी....  कैसे उस इंसान से प्यार कर सकती हो ?जो मेरा गुनहगार है, आश्चर्य से रूही ने पूछा। 

क्यों, नहीं कर सकती ? जब तुम भी तो अपने बदले के लिए ,गर्वित से विवाह कर सकती हो तो मैं, अपने प्यार के लिए सुमित से विवाह नहीं कर सकती। 

तुमने तो सुमित को पहले भी देखा था, तब तो तुम्हें प्यार नहीं आया था। तभी अचानक रूही के मन में एक विचार कौंध गया और बोली -1 मिनट ! कहीं तुम.... इस हवेली के लालच में तो नहीं , मुझे लगता है, तुम इस हवेली की संपत्ति के लालच में सुमित को बहला - फुसला रही हो क्योंकि जब मेरे लिए ,मेरी ससुराल से आभूषण और वस्त्र आए थे ,तब तुम उन्हें पहन -पहनकर देख रहीं थीं और कह रही थीं - कि इस सबके लिए तो आदमी कुछ भी करेगा। मुझे लगता है ,तुम्हें वही लालच यहां खींच लाया है। 

मुझे तो ऐसा कुछ याद नहीं पड़ता, यदि ऐसा कहा भी...  तो क्या फर्क पड़ता है ? पारो ने अपने होंठ बिचकाते  हुए कहा। 

 तुम भूल गई हो, किंतु मुझे अच्छे से याद है, तुम्हें इस हवेली का आकर्षण खींच कर लाया है ,सुमित की संपत्ति खींचकर ला रही है। 

तुम कुछ भी कह सकती हो, अब यह बात सही है कि तुम्हारा विवाह गर्वित से हुआ है और अब सुमित और मैं एक -दूसरे से प्यार करने लगे हैं। यदि तुम मेरी बात नहीं मानती हो , तो मैं, तुम्हारी सच्चाई इस परिवार के लोगों को बता दूंगी। तुम्हें जो सोचना है ,सोचो ! तुम गर्वित को मार दो !मुझे कोई फ़र्क नहीं पड़ता ,कंधे उचकाते हुए बोली - मुझे सुमित से मतलब है ,वो ज़िंदा रहना चाहिए। यदि तुमने उसके लिए कुछ भी गलत सोचा तो...  

तो क्या ??

अच्छा नहीं होगा। 

तुम मुझे धमकी दे रही हो। 

नहीं ,अभी तो मैं तुम्हें समझा रही हूँ ,यदि शांति से जीना चाहती हो तो अब ये सब छोड़ दो ! वरना.... तुम्हारे लिए अच्छा नहीं होगा।

तुम क्या कर लोगी ?लापरवाही से रूही ने पूछा। 

ये तो तुम्हें बाद में ही पता चलेगा ,वैसे इतना बता देती हूँ ,यदि तुमने ऐसा कुछ भी किया तो तुम सीधे जेल जाओगी। 

मैं भला जेल क्यों जाउंगी ? जब मैंने कुछ किया ही नहीं ,मुस्कुराते हुए रूही बोली।ये बात तो डॉक्टर भी साबित न कर सका कि इनकी हत्याएं हुई हैं। 

किन्तु मैं उन्हें बताऊँगी ?

साथ में तुम भी तो जेल जाओगी ,मैं इतनी पढ़ी -लिखी भी नहीं ,इतना नहीं जानती, कि क्या दवाई देने से उनकी हालत ख़राब हुई ?तुमने ही मुझे वो पाउडर लाकर दिया जिससे दिल की धड़कनें रुक जाती हैं।  इस सबमें ,तुम भी बराबर की हक़दार हो ,समझी !

''मेरी बिल्ली मुझे ही म्याऊं !''तुम्हें ही मैंने बताया और मुझे ही फंसा देना चाहती हो ,क्रोध से गुर्राते हुए पार्वती बोली। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post