जो नारी एक राजनीतिज्ञ बनकर, राजनीति में भी हिस्सा लेती है ,उसमें अपना अहम योगदान देती है,एक शिक्षिका बनकर ,देश की भावी पीढ़ी को जागरूक करती है। प्राचीन समय से ही धनुष ,तीर -तलवार इत्यादि अस्त्र -शस्त्र चलाने में महारत हासिल की है। आज भी अपनी योग्यता का' लोहा मनवाने में' पीछे नहीं हटती ,वही नारी' घरेलू राजनीति' में कैसे हार जाती है ? बच्चों का प्यार, परिवार को जोड़े रखने का भार, समाज में सम्मान बनाए रखने का प्रतिकार, यह सब वह पढ़ -लिखने के बावजूद भी, ससुराल में आकर बेपढ़ी - लिखी हो जाती है। कहने को तो वह एक 'आम गृहणी' बन जाती है किंतु इस सृष्टि में, वह पारिवारिक बोझ , आत्म सम्मान का ठीकरा अपने सिर पर ढ़ोती है।
इतना सब सहन करने के पश्चात, तभी तो उसे त्याग, ममता की मूरत , शालीन, संस्कारी, पतिव्रता, गृह लक्ष्मी, सहनशीला इत्यादि शब्दों से, सुसज्जित किया जाता है। दिल को बहलाने के लिए, ये शब्द ही काफी हैं और इन्हीं शब्दों का' तमगा' लेकर, वह ताउम्र उस गृहस्थ जीवन में, अपना संपूर्ण जीवन व्यतीत कर देती है। समय के साथ उसमें बदलाव आता है, अपने लिए लड़ने का प्रयास करती है, जवाब देना सीख जाती है। विद्रोह भी करती हैं।
जिस समाज को, जिन लोगों को उसका निश्छल मन एक अलग दृष्टि से देखता था। अब वही समाज, वही परिवार उसे क्रूर नजर आने लगता है और उसे लगता है - कि उसके त्याग का क्या महत्व रहा ? किसी ने उसके त्याग को सराहा ही नहीं, क्योंकि यह तो उसका इस परिवार के लिए कर्तव्य था, एक ग्रहणी होने के नाते उसका कार्य ही यही था उसमें, उसकी क्या सराहना करना ? लोग ऐसा सोच जाते हैं।
किसी- किसी परिवार में तो,' प्यार के दो बोलों' के लिए भी वह तरस जाती है, बाहरी तौर पर दिखता है , कि वह संघर्ष कर रही है, अपने आत्म सम्मान के लिए लड़ रही है, किंतु उसका अंतरण, उसका मौन, उससे कहीं आगे जा चुका होता है। यही बात तो मिसेज पारुल खन्ना के साथ हुई थी। धीरे-धीरे कुछ चीजें स्पष्ट होने लगीं क्योंकि इन सब का परिणाम कुछ समय पश्चात नकारात्मक ही आता है। उसके त्याग का, उसके प्यार का, उसकी सहनशीलता का वजूद ही नहीं रह जाता है । कभी-कभी तो उसे लगता है, क्या इस परिवार में मेरा भी वजूद है या नहीं, मैं यहां क्यों हूं ? किसके लिए हूं, क्या कर रही हूं ? क्या यह मेरी कोई मजबूरी है।
मैं इस पिंजरे को तोड़ क्यों नहीं देती ? किंतु तोड़ना चाह कर भी वह तोड़ नहीं पाती क्योंकि उस पिंजरे की आदि जो हो चुकी होती है। उसे लगता है, यदि वह इस पिंजरे से निकल कर बाहर खुले आसमान में उड़ेगी। आसमानी गिद्ध, उसे नोच डालेंगे, उसे लपकने के लिए तैयार रहेंगे। बाहरी दुनिया भी इतनी सरल नहीं ,सहानुभूति और कांधा देने के बहाने ज़ज्बातों से खेलने लगते हैं।
कहने को नारी स्वत्रन्त्र है किन्तु किसी को भी यह बर्दाश्त नहीं होगा ,वो खुलकर क्यों हंस रही है ? आज़ाद क्यों है ?उसे क़ैद कर लेना चाहते हैं ,उसे क़ैद करने के लिए पहले उसका हमदर्द बनकर उसके समीप आते हैं और फिर से उसे अपनी गलत भावनाओं के तहत अपनी बातों के जाल में फंसा लेते हैं और फिर से किसी न किसी बंधन में बांधने का प्रयास करते हैं। या फिर उस आज़ादी से वही नारी बौरा जाती है। बहक भी सकती है या फिर अपनी सज्जनता के कारण कहीं फंस जाती है। ऐसी स्वतंत्रता से भी क्या लाभ ?
नारी जागरूक है ,सशक्त होने का प्रयास तो करती है, फिर भी उसे किसी न किसी सहारे की आवश्यकता तो पड़ ही जाती है ,तब वो किसी का सहारा, यदि वह पुरुष है , अपनी फितरत नहीं छोड़ेगा। तब वो कहां जाएगी ? अनजान लोगों की दुनिया में कहां भटकेगी ? तब वह उस पिंजरे की दीवार से बाहर निकलने का विचार ही त्याग देती है ,प्रयास भी नहीं करती। वह अपने को वहीं सुरक्षित महसूस करती है।
यही हालात 'ज़ीनत ' के साथ ही तो हुए थी, हालांकि वह ज्यादा कुछ बोल नहीं पाती है उसके कुछ शब्द स्पष्ट नहीं होते हैं लेकिन जो भी उसने कहा, उसके आधार पर भूमि को लगा।' नारी जीवन आसान नहीं है।इस' पुरुष प्रधान 'समाज में ,और जिन लोगों में वो रहती थी। वहां तो औरत को मात्र भोग्या ही माना जाता है। फिर चाहे वह पढ़ी- लिखी हो या फिर अनपढ़ !
'ज़ीनत' अनपढ़ ही थी किंतु एक अच्छे खानदान से थी। उसके ख़ानदान में बेटियां पढ़ती नहीं ,ससुराल में जाकर शौहर के घर की' ज़ीनत ' बनती हैं इसीलिए तो उसका नाम 'ज़ीनत' रखा गया था।
आज वो रंग-बिरंगे, चमकीले कपड़े पहनकर, अपनी पुरानी हवेली में, उछल कूद कर रही थी। अम्मी, देखो !मैं कैसी लग रही हूं ?
माशा अल्लाह ! मेरी बिटिया तो बहुत ही खूबसूरत लग रही है , अपनी'ज़ीनत ' की बलायें लेते हुए उसकी अम्मी ने कहा।
लाइए ! मेरी' ईदी' दीजिए !
तुम्हारे अब्बू अभी नमाज़ पढ़कर आते ही होंगे , तब उन्हीं से' ईदी 'मिलेगी ।
नहीं ,मैं अब्बू से ही नहीं ,भाईजान और मामू से भी ईदी लूंगी, आज तो मुझे कई लोगों से' ईदी' मिलेगी ,खुश होते हुए बोली और मेरे पास बहुत सारे तोहफ़े होंगे। दस बरस की' ज़ीनत 'अभी ठीक से उसने अपने जीवन में कदम भी नहीं रखा, उसे पता ही नहीं ,भविष्य में क्या होने वाला है ? उसके अम्मी -अब्बू उसे बड़ा प्यार करते हैं। दो भाइयों की अकेली बहन थी। पैसे की कोई कमी नहीं है। उसके अब्बू ने ईद पर खूब ख़र्चा किया है,सभी के नए कपड़े ,घर में बहुत सारी शीर ,मिठाइयाँ बनी हैं। किसी भी ख़ुशी के मौक़े पर 'ज़ीनत 'बहुत खुश होती है। उस दिन घर में बहुत सारे मेहमान आते हैं ,घर में रौनक हो जाती है।
अपने अम्मी -अब्बू की ' नन्हीं सी जान ''ज़ीनत' को वो बहुत लाड़ करते हैं, किंतु उसको कभी पढ़ने नहीं भेजा। उनके यहां बेटियां नहीं पढ़ती, बेटे भी जरूरत के लायक ही पढ़ते हैं। उनके लिए तो बस'ज़ीनत ' थोड़ी और सयानी हो जाए और उसका' निकाह 'करके उसको , उसकी ससुराल भेज दिया जाए ,यही बहुत है किन्तु उसकी अम्मी उसे घर के कामकाज़ के लिए उससे कहती, किन्तु उसके अब्बू कहते -ये खाना क्यों बनाएगी ?क्या यह ऐसे घर जायगी ?जहाँ' ख़ानसामा' भी न हो ,इसका निक़ाह किसी ऊँचे ख़ानदान में होगा। उसे लाड़ लड़ाते हुए ,उसके अब्बू कहते।
घर में बहुत दिनों के बाद ,उसकी' फूफी जान 'रुकैया घर में पधारी हैं। उनके आते ही 'ज़ीनत ''की अम्मी तुरंत ही 'बावर्चीख़ाने ''की तरफ दौड़ी और' ख़ानसामे से 'उनके नाश्ते का बंदोबस्त करने के लिए कहकर आईं। 'ज़ीनत 'की फूफी' रुकैया 'बड़े अदब और क़ायदे से रहने वाली औरत हैं।बैठी हुई , 'ज़ीनत' की हरक़तों को देख रहीं थीं।
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