Khoobsurat [part 132]

रोहिणी बगीचे में ,अपने बेटे को टहला रही थी ,आज उससे मिलने कहें ,या फिर उस बगीचे में टहलने के लिए ,अभी कल्पित नहीं आया है। अभी रोहिणी को वहां आये हुए ,आधा घंटा भी नहीं बीता था। तभी किसी ने उसे पीछे से पुकारा ,जब उसने घूमकर देखा ,तो रोहिणी की आँखें फैल गयीं, ह्रदयगति  तीव्र हो गयी और अचानक ही उसके हाथ काँपने लगे, तुरंत ही  पीछे हटी और उसने अपनी नजरें हटा लीं। 

तुम्हें क्या हुआ ,क्या तुम ठीक हो ? उसके थोड़ा समीप आकर कल्पित ने पूछा।


 रोहिणी, कल्पित की तरफ नहीं देख रही थी ,उससे बचने का प्रयास कर रही थी। तब उसकी तरफ बिना देखे ही ,उसने पूछा - क्या आज कहीं जा रहे हो ? कहते हुए ,अपने बच्चे के करीब आ गयी। कल्पित ने देखा और महसूस किया ,आज तक तो ये अपने बच्चे को बग़ीचे में लाकर, लापरवाही से फोन चलाती थी या फिर मेरे साथ बातें करते हुए टहलती थी। आज इसे क्या हुआ ?अपने बच्चे के समीप जाकर बैठ गयी। 

नहीं , कहीं नहीं जा रहा हूँ ,क्यों तुम्हें ऐसा क्यों लगा ?

तुम्हारे कपड़े !!

क्यों ? मेरे कपड़ों को क्या हुआ ?रोहिणी के कहने पर उसने अपने कपड़ों को देखा, सफेद कमीज़ है, और ''लाल टाई ''तब उसे ध्यान आया,कुणाल ने भी तो बताया था -'ये लाल रंग से डरकर भाग रही थी। 'कल्पित मुस्कुराया और बोला -  आज तो' लाल रंग की टाई ''लगाई हुई है। मन ही मन सोचा - कहीं यह लाल टाई के कारण तो मुझसे दूर नहीं भाग रही है।

 तब बोला -आज एक साक्षात्कार था , वहीं से आ रहा हूं , वही कपड़े पहनकर इधर आ गया। क्यों, क्या मेरे कपड़े अच्छे नहीं लग रहे हैं ?

नहीं, अच्छे हैं , कहते हुए वो बोली  - अब मैं चलती हूं ,तुम भी थके होंगे।  

अरे ! इतनी जल्दी, अभी तो मैं आया हूं। 

आप अभी आए हैं, किंतु मैं तो यहाँ बहुत देर से थी,वो उससे बचने का प्रयास कर रही थी।  

वैसे यह तो बताइए !मेरे कपड़े आपको कैसे लग रहे हैं, जहां मैं इंटरव्यू देने गया था, उसके हिसाब से ठीक लग रहे हैं या नहीं ..... क्या मैं उन लोगों को प्रभावित कर पाया हूँगा या नहीं ?

आपके कपड़े सही हैं, बस यह टाइ ! यह  इंटरव्यू के लिए नहीं है। 

ओह ! अच्छा, कहते हुए , कल्पित ने तुरंत ही अपनी टाई उतारी और पेंट की जेब में रख ली। टाई के पेंट की जेब में रखते ही , रोहिणी ने पूछा -  और बताओ ! तुम्हारा इंटरव्यू कैसा गया ? क्या तुम्हारी कोई नौकरी नहीं  है? मैं तो सोच रही थी कि तुम नौकरी  करते होंगे ,मैं भी न.... तुमसे इतने दिनों से मिल रही हूँ ,किन्तु कभी पूछा ही नहीं ,कि तुम क्या काम करते हो ? 

ऐसी कोई बात नहीं ,नौकरी तो है, लेकिन अभी कम ही पैसे मिलते हैं ,अभी मेरी फोटोग्राफी का खर्चा ही पूरा नहीं हो पाता कहीं और अच्छी सी नौकरी लग जाए इसीलिए वेकेंसी देखी और चला गया। आप सही कह रहीं हैं ,'हम लोग इतने दिनों से आपस में मिल रहे हैं किन्तु एक दूसरे से कभी व्यक्तिगत बातें नहीं कीं।' 

वो कुछ कदम ही वापस जाने के लिए आगे बढ़ी थी ,किन्तु अब कल्पित समीप आकर बैठ गयी और बोली -जब तुम इतना कह  ही रहे हो , तो बैठ जाती हूं। तुम सही कह रहे हो ,हमने कभी एक -दूसरे के विषय में जानने का प्रयास नहीं किया ,किन्तु मैं जानना भी नहीं चाहती थी।'' हम जिनको जान जाते हैं ,उनसे रिश्ता बनाने का प्रयास करते हैं और जानने के प्रयास में ,कई बार वो रिश्ता टूट भी जाता है,जिनके समीप रहकर हम अपने अंदर ख़ुशी महसूस करते हैं ,क्या यही बहुत नहीं है ? 

'' रिश्ता बनाते ही ,नजदीकियाँ बढ़ती हैं ,या फिर कई बार अधिकार भी जतलाने लगते हैं कभी ड़र लगता है ,कभी क्रोध आता है। एक अनजान रिश्ता !न ही तुम मेरे विषय में ज्यादा कुछ जानते हो और न ही मैं तुम्हारे विषय में जानती हूँ। बस एक दूसरे के साथ रहकर ,एक दूसरे से बातें करके प्रसन्न रहते हैं। इस रिश्ते को नाम क्यों देना है ? न ही मैं तुमसे कोई अपेक्षा रखती हूँ और न ही तुम मुझ पर किसी बात का दबाब बना सकते हो। हमारे मध्य एक लाइन है ,जिसको न ही मैं तोडना चाहती हूँ और मुझे लगता है ,न ही तुम तोडना चाहोगे।'' 

बाप रे ! आज तो तुमने बड़ा लम्बा भाषण दे दिया,मुस्कुराते हुए कल्पित ने रोहिणी से कहा -तुम बुरा तो नहीं मानोगी ,एक बात कहूँ ,रोहिणी ने हाँ में गर्दन हिलाई ,तब वो बोला -''तुममें ,कुछ बात तो है ,एक नन्हीं सी  'खूबसूरत ' नाजुक़ सी तितली ,जो अनेक रंग लिए तुम्हारे अंदर समाई है , उसे कैद क्यों किया हुआ है ?उसे उड़ने क्यों नहीं देतीं ?''

कल्पित का सवाल सुनकर रोहिणी एकदम से गंभीर हो गयी और बातों का रुख़ बदलते हुए पूछा -  और सुनाओ ! जीवन में क्या चल रहा है ?

अरे !कहते हुए  कल्पित ने अपने सिर पर हाथ मारा ,जैसे उसे कोई भूली हुई बड़ी बात स्मरण हो आई हो ,मैं तो भूल ही गया ,मैं, तुमसे एक सलाह लेना चाहता था ,

 कैसी सलाह ?

मेरे बॉस की' शादी की सालगिरह' है।  मुझे ,उन्हें उपहार में क्या देना चाहिए ?

रोहिणी कुछ सोचने लगी और फिर बोली -यह तो तुम्हारे बजट पर निर्भर करता है और जितना बजट होगा वह आपकी नौकरी के आधार पर निर्भर करता है। आमदनी जितनी है, उसी हिसाब से ख़र्चा करना।

 यह तो तुमने, मुझे अच्छी बात बताई फिर भी, आजकल कोई भी चीज इतनी सस्ती नहीं है, मैं सोच रहा हूं ? क्यों ना मैं, उन्हें एक' गुलाब के फूलों का एक गुच्छा ''ही  दे दूँ ?

यह क्या बात हुई ? कोई कपड़ा भी दे सकते हो,जैसे उनकी पत्नी के लिए साड़ी या फिर सूट दे सकते हो। 

ये '' शादी की सालगिरह''है ,महोदया ! उनकी बीवी का जन्मदिन नहीं ,इसीलिए तो मैं तुमसे सलाह लेना चाहता था कोई ऐसी चीज बताओ ! जिसे देखकर दोनों ही प्रसन्न हों  ! दोनों को लगे, कि मेरे लिए है। साड़ी, सूट ,आभूषण यह सब तो उनकी पत्नी के होंगे।

तब रोहिणी कोई भी ऐसी वस्तु सोचने का प्रयास करने लगी ,जिससे दोनों को प्रसन्नता मिले। 

 अच्छा, क्या तुम मेरी एक सहायता करोगी ? मेरे साथ बाजार चलकर, कुछ खरीददारी करवा देना। 

कल्पित के इतना कहते ही रोहिणी सोच में पड़ गई ,उसने अब तक घर में किसी को कुछ नहीं बताया था कि वह एक अनजान लड़के से, बग़ीचे में मिलती है, उससे बात करती है और अब यदि वह उसके साथ बाहर जाती है, तब वो [कल्याणी जी ] पूछेंगीं - क्यों जा रही है,कहाँ जा रही है ? सम्पूर्ण  खरीददारी तो अब तक  कल्याणी जी  ही करती आई हैं। मुझे बहुत दिनों से कभी बाजार ही नहीं जाने देतीं हैं। 

यदि' मैं' कल्पित के साथ जाती हूँ ,तो इसकी खरीददारी भी हो जाएगी और  इस तरह कल्पित के साथ, मेरा  घूमना भी हो जाएगा किन्तु  मुझे घर जाकर क्या जवाब देना होगा ? कहने को तो ये मेरे लिए अनजान है ,क्या मैं इस पर विश्वास कर सकती हूँ ? सोचते हुए ,उसकी तरफ देखती है ,ऐसा लगता तो नहीं है।  उन लोगों से क्या पूछ कर जाऊंगी ,कह दूंगी- बच्चे के लिए कुछ सामान लाने जा रही हूँ  और बच्चा भी बाहर की हवा खा लेगा ,अभी तक बैठी हुई रोहिणी यही सब सोच रही थी। 


laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

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