Khoobsurat [part 133]

कल्पित ने आज अचानक रोहिणी से पूछा -क्या तुम मेरे साथ बाज़ार चलकर, मेरे साथ ,मेरे बॉस के  '' विवाह की  वर्षगांठ ''पर मुझे उनके लिए उपहार लेने में सहायता करोगी। कल्पित के यह कहने पर रोहिणी सोचने लगी - कि मैं घर पर क्या जबाब दूंगी ?अभी तक तो उसने यह बात भी घरवालों से छुपाई हुई है कि वो बग़ीचे में किसी अजनबी से बात करती है। 

तभी हाथ से चुटकी बजाते हुए कल्पित ने पूछा- कहां खो गई ? क्या तुम मेरी सहायता करने के लिए तैयार हो या नहीं। 


कर तो सकती हूं, किंतु सोच रही हूं ,घर में क्या जवाब दूंगी ? किसके साथ जा रही हूं और क्यों जा रही हूं ?

क्या तुम्हारी मम्मी इतनी सख़्त  हैं ? बेटी को बंद करके रखना चाहती हैं। कल्पित जानता था कि रोहिणी को कल्याणी जी ने अपनी बेटी नहीं बताया है, रिश्तेदार की बेटी बताया है किंतु यहां पर उसके सामने रोहिणी कल्याणी जी को रोहिणी की मां कह रहा है। तब उसने एक बार भी इस बात का विरोध नहीं किया। भावुक होते हुए कल्पित बोला - अरे तुम उनकी बेटी हो, कोई चोर डाकू नहीं हो, इस तरह तो तुम्हारी स्वतंत्रता ही समाप्त हो जाएगी। तुमने ऐसा क्या किया है ?जो वो, तुम पर नज़र रखतीं हैं ,रोहिणी की तरफ देखते हुए पूछा। 

नहीं, ऐसी कोई बात नहीं है ,वो भला मुझ पर नजर क्यों रखेंगी ?बात को संभालते हुए उसने कहा - दरअसल बात यह है , यह भी, अभी छोटा है ,अपने बेटे को गोद में लेते हुए बोली - मुझे अपने सामने न देख कर यह रोने लगता है। मैं यदि इसे घर पर छोड़कर चली जाऊंगी तो यह रोएगा और तब मम्मी को मुझे बताना पड़ेगा, कि मैं बाहर जा रही हूं। 

अरे ! यह क्या बात हुई ? तब ऐसा करते हैं न..... इस बच्चे को भी अपने साथ लेकर चलते  हैं, इसका भी घूमना हो जाएगा और हमारी खरीददारी भी हो जाएगी । बाकी तुम्हें जो उचित लगे , वो कर सकती हो  ! मैं  तुम्हारी परेशानी समझ सकता हूँ , मैं तुमसे कोई जबरदस्ती नहीं करूंगा वरना कल को तुम्हारी  मम्मी नाराज हो गई तो मैं क्या जवाब दे पाऊंगा ?

निर्लिप्त भाव से ,कल्पित ने ऐसे कहा ,ताकि रोहिणी को ये न लगे कि वो मुझ पर जाने के लिए दबाब बना रहा है या जबरन ही उसे अपने साथ ले जाना चाहता है। यह निर्णय उसने रोहिणी की इच्छा पर छोड़ दिया। 

तब रोहिणी कहती है , मैं बाजार जाऊंगी, और अपने बच्चे के लिए, कुछ सामान लाने के बहाने, और इसे बाहर घूमाने के बहाने आ जाऊंगी। 

तुम जैसा उचित समझो ! तब मैं कल तुम्हें यही बगीचे में मिलूंगा, गाड़ी लिए प्रतीक्षा करूंगा।

 रोहिणी, कल्पित से वादा करके आ तो गई ,'कि मैं कल तुम्हें ,यहीं  बगीचे के बाहर मिलूँगी लेकिन फिर वह सोचने लगी - अभी मैंने , कल्पित को कुछ ही दिनों से जाना है। क्या मेरा ,उसके साथ इस तरह बाजार में जाना उचित रहेगा ?अभी मैं यह भी नहीं जानती , कि यह क्या करता है ? शादीशुदा है या कुंवारा है। क्या मैं इस पर विश्वास कर सकती हूं।

 उस समय तो उसने आवेश में आकर कह दिया था -कि मैं तुम्हारे साथ चलूंगी किंतु अब वह सोचने पर मजबूर हो गई थी -'क्या मुझे उसके साथ जाना चाहिए ?' फिर सोचा-अब मैं एक बच्चे की मां हूं कोई बच्ची नहीं हूँ , अपना भला -बुरा समझ सकती हूं।  क्या मुझे ,कल्पित बहका कर कहीं ले जाएगा ?मुझे अपने आप पर विश्वास है। 

 यदि मुझे लगेगा कि इसका इरादा सही नहीं है, तो मैं स्वयं भी रिक्शा करके आ सकती हूं। बाजार में इतने लोग होते हैं , कुछ भी गलत लगा तो मैं शोर मचा दूंगी। अपने आप को उसने पूरी तरह से हर परिस्थिति के लिए तैयार किया किंतु अपनी बाहर जाने की लालसा को त्याग न सकी।

 उसे लग रहा था -अब कल्पित के साथ जाने का अच्छा मौका मुझे हाथ लगा है , तो मैं इस मौके को, छोड़ नहीं सकती। कल्याणी देवी तो अकेले कहीं जाने नहीं देंगीं , वो तो मुझे बाहर जाने देना ही नहीं चाहतीं हैं।

अब उसने निर्णय किया, कि वो घर में किसी को कुछ नहीं बताएगी , बच्चे  को बगीचे में घुमाने के बहाने ,प्रतिदिन की तरह घर से निकलेगी ,तब मैं ,कल्पित के साथ बाहर घूम कर भी आ जाऊंगी और किसी को कुछ पता भी नहीं चलेगा। मन ही मन उसने निश्चय  कर लिया था। कल  बहुत दिनों के पश्चात वह बाहर घूम कर आएगी। 

रोहिणी ने एक अच्छा सा सूट पहना , उसने कोई साड़ी नहीं पहनी, अपने वस्त्रों से, अपने व्यवहार से, वह यही जतलाना चाहती थी ,कि वह बगीचे में जा रही है , वरना विशेषरूप से तैयार होने पर, शायद कल्याणी जी को उस पर शक हो जाता। नियत समय पर, वह बगीचे के बाहर खड़ी होकर, कल्पित की प्रतीक्षा कर रही थी। तभी एक गाड़ी उसके समीप आकर रूकती है , और उसमें से एक मुस्कुराता हुआ ,जाना -पहचाना  चेहरा उसे नजर आता है।  आज वही चेहरा उसे बहुत अच्छा लग रहा है। आज उसके कारण बहुत दिनों के पश्चात,उस कैदख़ाने से बाहर जा रही थी। 

क्या तुम्हारे पास गाड़ी भी है ?तुमने कभी बताया ,नहीं !

नहीं ,ये मेरी गाड़ी नहीं है ,मेरी कम आमदनी में क्या गाड़ी ली जा सकती है ,बेचारा बनते हुए कल्पित ने जबाब दिया -ये तो मेरे एक दोस्त की गाड़ी है ,कुछ देर के लिए मांगकर लाया हूँ। 

आज तुम मेरे साथ पहली बार जा रही हो ,अच्छा ,बताओ ! तुम्हें  खाने में क्या पसंद है ,क्या खाओगी ? कल्पित ने पूछा और तुरंत ही जवाब दिया -महिलाओं को तो अधिकतर' गोलगप्पे' ही पसंद होते हैं , क्या तुम्हें भी गोलगप्पे पसंद हैं  ?

'गोलगप्पे' की बात सुनकर, रोहिणी के मुंह में पानी आ गया और बोली  -बहुत ! तभी उसके सशंकित मन ने उसे चेताया , उसे पता तो होना चाहिए, वह इसके साथ, कहां जा रही है ?

तब वो बोली -मैं तुम्हारे साथ चलने के लिए तैयार तो हो गई किंतु एक बार भी यह नहीं पूछा, कि हम खरीदारी करने कहां जा रहे हैं ?

तुम बताओ ! तुम  तो इसी  शहर की लगती हो , मुझे यहाँ के बाजार  की कोई ज़्यादा जानकारी नहीं है।अब  हमें कहां चलना चाहिए ?

 उसकी इस बात पर मुस्कुराते हुए, रोहिणी बोली -'मेघा मार्ट ''चलते हैं , वहां पर बच्चों के , बड़ों की ,सभी की जरूरतों का सामान मिल जाता है।

 ठीक है, कहते हुए कल्पित ने गाड़ी रोकी , गाड़ी से उतरा और बोला - अभी मैं एक फोन करके आता हूं। 

कल्पित जब आया, तब रोहिणी ने पूछा - फोन तो तुम यहां भी कर सकते थे ? क्या अपनी बीवी को छुपकर फोन कर रहे थे ? हंसते हुए रोहिणी बोली। 

आप भी अच्छा मज़ाक कर लेतीं हैं ? अभी तो मेरा विवाह भी नहीं हुआ है। वह तो मैं अपने दोस्त से पूछ रहा था, कि उनको और भाभी जी को कौन रंग पसंद है ? आदमी के पसंद की चीज लेने से ही ,तभी उसको प्रसन्नता मिलती है ,तब हमें भी अच्छा लगेगा ,कि हमारा परिश्रम व्यर्थ नहीं गया, कहते हुए उसने गाड़ी को  आगे बढ़ा  दिया। रोहिणी आज खुली सड़कों पर  खुली सांस ले रही थी, हालांकि उसके अंदर एक अपराध बोध भी था,' कि वह कल्याणी जी से  बोलकर ही नहीं आई,' तब वह कल्पित की तरफ देखती है , इंसान तो यह ठीक लगता है, मुझे धोखा तो नहीं देगा ,तभी दूसरा विचार उसे विचलित कर जाता है , कहीं मैं फंस तो नहीं जाऊंगी ,बार-बार उसका मन उसे चेता रहा था। 

laxmi

मेरठ ज़िले में जन्मी ,मैं 'लक्ष्मी त्यागी ' [हिंदी साहित्य ]से स्नातकोत्तर 'करने के पश्चात ,'बी.एड 'की डिग्री प्राप्त करने के पश्चात 'गैर सरकारी संस्था 'में शिक्षण प्रारम्भ किया। गायन ,नृत्य ,चित्रकारी और लेखन में प्रारम्भ से ही रूचि रही। विवाह के एक वर्ष पश्चात नौकरी त्यागकर ,परिवार की ज़िम्मेदारियाँ संभाली। घर में ही नृत्य ,चित्रकारी ,क्राफ्ट इत्यादि कोर्सों के लिए'' शिक्षण संस्थान ''खोलकर शिक्षण प्रारम्भ किया। समय -समय पर लेखन कार्य भी चलता रहा।अट्ठारह वर्ष सिखाने के पश्चात ,लेखन कार्य में जुट गयी। समाज के प्रति ,रिश्तों के प्रति जब भी मन उद्वेलित हो उठता ,तब -तब कोई कहानी ,किसी लेख अथवा कविता का जन्म हुआ इन कहानियों में जीवन के ,रिश्तों के अनेक रंग देखने को मिलेंगे। आधुनिकता की दौड़ में किस तरह का बदलाव आ रहा है ?सही /गलत सोचने पर मजबूर करता है। सरल और स्पष्ट शब्दों में कुछ कहती हैं ,ये कहानियाँ।

Post a Comment (0)
Previous Post Next Post