भूमि ने देखा,'ज़ीनत'को चोट लगी है ,उसकी पिटाई हुई है ,यह देखकर उसे दुःख हुआ और बोली -तुम अब घर वापस चली जाओ और आराम करो !
किंतु वह बोली - मैं काम कर दूंगी , भूमि समझ गई थी, इसे तो खाना बनाना भी नहीं आता, यह भूखी भी होगी, जिन घरों में यह खा लेती थी, अब उन घरों में, इसके प्रति जैसे सभी दुश्मन हो गये हैं । भूमि ने फिर उससे कुछ नहीं कहा ,काम करने दिया और चुपचाप उसके लिए खाने के लिए कुछ बना दिया। उसके मन में अनेक विचार घुमड़ रहे थे ,आख़िर लोग कितने कठोर हो गए हैं ? इतनी ठंड में इसको मारा ,न जाने क्यों मारा होगा ?अभी इससे पूछती हूँ तो शायद फिर से रोने लगे ,उसका दुख ही बढ़ेगा , यह सोचकर उससे कुछ नहीं पूछा और न ही कुछ बात की।
तब भूमि ने यह बात अपने पति सुदीप को बताई -मौहल्ले के सभी लोग एक हो गए हैं और इसको कल शाम को खन्ना जी ने तो पीटा है, मुझे तो पता ही नहीं चला।
वो ऐसा क्यों करेंगे ?जरूर इसने ही कुछ किया होगा ,सुदीप ने कहा -आजकल मैं देख रहा हूँ ,तुम इस पर कुछ ज्यादा ही ध्यान देने लगी हो। इससे ज्यादा मतलब मत रखो ! काम से काम रखो !
तभी उसके बेटे ने बताया - ये, खन्ना आंटी को कुछ कह रही थी ,तभी अंदर से अंकल आये और इसकी टांगों में दो डंडे मारे ,मैं छत पर टहल रहा था ,तभी मैंने देखा था।
तूने, मुझे पहले क्यों नहीं बताया ?बेटे को डाँटते हुए भूमि बोली।
क्या बताता ?आप बेकार में परेशान होतीं ,आप क्या छुड़ाने जातीं ?
सुदीप ने भूमि की तरफ देखा और बोले -देखा ! ये भी कुछ कम नहीं है ,तुम इससे ज्यादा हमदर्दी मत रखो !
भोजन करके ज़ीनत बोली -आंटी ! मैं ऊपर धूप में लेट जाऊं।
हाँ ,लेट जाना ,किन्तु तुम अपनी दवाई लेकर आई या नहीं ,पैसे चाहिए तो मुझे बता देना।
नहीं ,ग्यारह बजे जाउंगी ,जहाँ मुफ़्त में दवाई मिलती है।
तब तक क्या दर्द ही सहन करती रहोगी ? यहीं से कोई दवाई ले आतीं,तब तक वो सीढ़ियों से ऊपर छत पर पहुंच गयी।
इसके जाने के कुछ देर पश्चात ही, मिसेज़ गुप्ता का फोन आ गया और उन्होंने पूछा -आप क्या मोेहल्ले से बाहर चलती हो ? क्या तुम्हारे यहां आज भी, वह काम करने आई थी।
भूमि बताना तो नहीं चाहती थी किंतु उनका घर भूमि के करीब ही था। वहां से आते-जाते सब दिख जाता था इसलिए वह झूठ भी नहीं बोल सकती थी ,भूमि बोली - हां आई तो है, किंतु वह तो बड़ी परेशान है,बेचारी !रो रही थी। न जाने किसने, उसे बहुत मारा है ?
अरे !काहें की बेचारी !पता नहीं तुम्हें, इससे इतनी हमदर्दी क्यों है ?वो तो इसकी ज़बान भगवान ने पहले ही ठीक नहीं दी है ,इस ज़बान से भी न जाने कितनी गंदी -गंदी गालियां देती है ?वो तो आधी समझ ही नहीं आती ,समझ आ जाये तो और ज्यादा पिटे। इसे हमारे पड़ोसी खन्ना जी ने ही तो मारा है ,उनके यहां भी तो काम करती थी और वो लोग बाहर घूम रहे थे ,उनको भी देखकर गंदी -गंदी गालियां दे रही थी। उनके पति को बर्दाश्त नहीं हुआ, और पीछे से आकर उस पर डंडे बरसाए ,तब जाकर चुप हुई।
दो -चार डंडे पड़ते ही, उसकी अक़्ल ठिकाने आ गयी और रोने लगी ,भइया !भइया !अब नहीं करूंगी ,ऐसे लोगों को ये ही भाषा समझ आती है। अब हम सब ने यह तय कर लिया है ,कि इसको अब इस मोहल्ले में आने नहीं देंगे और तुम भी उसे, अपने यहां बुलाने से इनकार कर दो ! जिनके यहाँ काम करती थी ,उन सभी ने मना कर दिया ,अब सिर्फ तुम्हारे यहाँ ही आ रही है। जब यह भूखी मरेगी, तब इसको अक़्ल आएगी। हम सबने सोच लिया है इसे इस मोहल्ले में नहीं आने देंगे वरना कुछ भी हादसा होता है ,तो आप ही इसकी ज़िम्मेदार होंगी। पुलिस वालों ने भी कहा है - 'आप इससे, इस तरह घर में काम नहीं करवा सकते।'
भूमि के मन में, परेशानी चल रही थी, क्या वह इन लोगों का कहना माने और इनमें शामिल हो जाए या फिर उस लड़की से इस हादसे के विषय में पूछे ! आखिर हुआ क्या था ? ऐसे समय में भूमि को वो अकेली खड़ी नजर आ रही थी। कहाँ तो ये सभी के घरों में काम करती थी और आज अकेली है ,क्या इन लोगों को बर्दाश्त नहीं हुआ कि ये मेरे घर क्यों काम कर रही है ?अब तक तो सब ठीक चल रहा था। न जाने ,अचानक क्या हो गया ?ऐसे में वो, स्वयं को मौहल्ले की गद्दार समझ रही थी। गद्दार या इंसानियत यह तो समय ही बताएगा।
ये सभी एक हैं किन्तु इस लड़की की व्यथा को कोई सुनना या समझना ही नहीं चाहता ,आख़िर इसके साथ हुआ क्या था ?जो ये ऐसा व्यवहार कर रही है। इंसानियत के नाते मुझे इसका साथ देना ही होगा फिर चाहे मौहल्ले वाले कुछ भी कहें।''अक़्सर भीड़ में ऐसा ही होता है ,एक प्रभावशाली व्यक्ति पर सभी विश्वास करते हैं किन्तु सच्चाई क्या है ?ये जानने का प्रयास नहीं करते।'' इस समय' ज़ीनत' भूमि को ऐसी ही नजर आ रही थी।
मेरे यहां आकर तो यह बिल्कुल नरम व्यवहार करती है फिर उनके साथ ऐसा क्या हुआ ? जो यह इतनी क्रोधित हो रही है। कुछ बात तो है किंतु इसका वह रूप देखकर भूमि की एकाएक हिम्मत नहीं हो रही थी कि वह उसके 'जख्मों को फिर से हरा कर दे।' मिसेज गुप्ता ने साथ ही चेतावनी भी दी थी, कि पुलिस वालों ने कहा है- यदि इसको बिना वेरिफिकेशन के किसी ने भी अपने घर में रखा तो वह उसका स्वयं जिम्मेदार होगा अब यह तुम सोच लो! कि मोहल्ले से बाहर चलोगी या मोहल्ले के साथ रहोगी।ये कितनी गंदी रहती है ,न जाने कहाँ -कहाँ मुँह मारती होगी ?किसी पर भी कुछ भी इल्ज़ाम लगा देती है।
भूमि शांत रही, उसके पास अभी कोई जवाब नहीं था ,सोच रही थी ,जब इनके घर आती थी ,तब क्या साफ रहती थी ? उसने सोच लिया था यदि ज़ीनत मेरे घर आती है तो मैं उसे रोकूंगी नहीं, और नहीं आती है तो कोई बात नहीं। अगले दिन भी वह आई थी, बहुत ठंड थी, कोहरा पड़ रहा था। भूमि को तो इस बात का दुख था, कि इस ठंड में उसकी चोट भी अकड़ गई होगी।
न जाने क्यों ? भूमि को ,उससे एक मां जैसी ममता उमड़ आई थी। बेचारी ठंड में कहां जाएगी ? यही सोचकर, उसे चुपचाप चाय नाश्ता दिया और उसे समझाया -अब किसी को मत छेड़ना, किसी से कुछ मत कहना, चुपचाप इस मोहल्ले से बाहर निकल जाना। जीनत ने भी एक छोटे बच्चों की तरह उसकी हाँ में हां मिलाई। यहां मोहल्ले के सभी लोग एक हो गए हैं , तुम्हें यहां नहीं आने देंगे इसीलिए समझदारी से काम लो !
कुछ देर पश्चात ही मिसेज गुप्ता का फिर से फोन आया -यह क्या हो रहा है आपके यहाँ वह रोज आ रही है ?
मैं मानती हूं ,उसने गलती की है, उसने गलती क्यों की है ?इसका कारण मैं नहीं जानती किंतु मैं इतना अवश्य जानती हूं कि मैं उसे इंसानियत के नाते बुला लेती हूं। मैं बुलाती भी नहीं हूँ ,वो स्वयं ही आ जाती है ,बस मुझसे मना नहीं होता। अब तक वह, सभी के घर में आकर कुछ ना कुछ खा लेती थी, किंतु अब वह कहां जाएगी ?
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